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फ्रायड की वैचारिक शक्ति

प्रसिद्ध चिन्तक फ्रायड ने अपनी जीवनी में लिखा है कि एक बार वे अपनी पत्नी व् छोटे से बच्चे के साथ बगीचे में घूमने गए | देर शाम तक वे अपनी पत्नी के साथ बातचीत करते रहे और टहलते रहे | जब गेट बंद होने का समय आया तो उन की पत्नी को याद आया कि उन का बच्चा जाने कहाँ छूट गया है |वह घबरा उठी | फ्रायड ने कहा , “घबराओ मत | मुझे यह बताओ कि तुम ने उसे कहीं जाने से मना किया था ? अगर मना किया था तो समझो कि पूरी पूरी उम्मीद है कि वह वहीँ गया होगा |”

पत्नी ने कहा ,”हाँ ,मना किया था और कहा था कि फव्वारे पर मत पहुंच जाना ,”अंततः दोनों उस फव्वारे की तरफ गए और जब बेटे को फव्वारे के पानी में पैर लटकाए देखा तो फ्रायड की पत्नी हैरान हो गई | उस ने पति से पूछा ,”तुम्हे कैसे पता चला कि हमारा बेटा यहीं होगा ?

फ्रायड ने कहा ,”यह कोई आश्चर्य की कोई बात नहीं है | मन को जहाँ जाने से रोका जाता है ,वह वहीँ जाने के लिए बाध्य करता है |”

फ्रायड ने आगे लिखा है कि मनुष्य इस छोटे से सूत्र का पता आज तक नहीं लगा पाया | हमारे धर्म ,नीतियाँ और समाज जितना ही दमन पर जोर दे रहे हैं ,हम परमात्मा से उतने ही दूर होते जा रहे हैं | दमन से मुक्ति ही परमात्मा के घर तक पहुंचने का एक मात्र साधन हो सकता है |

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