ईर्ष्या
किसी को अपने से अधिक उन्नत ,सम्पन्न या सुखी देख कर मन में होने वाले कष्ट या जलन जिस के साथ उस व्यक्ति को वैभव सुख आदि से वंचित कर के स्वयं उस का स्थान लेने की इच्छा लगी रहती है उसे ईर्ष्या या जलन कहा जाता है | यह एक मानसिक विकार है जिस से विवेकशील,बुद्धिमान व्यक्ति ,शास्त्रों के ज्ञाता और विद्वान ऋषि मुनि भी नहीं बच पाए साधारण जन का तो कहना ही क्या | ऐसी ही कुछ कथाएं महाभारत में भी आती हैं जो व्यास जी ने युधिष्ठर को जब वह भीष्म पितामह को जलांजलि देने के बाद शोकमग्न हो गये थे तब उन्हें शांत करने के लिए सुनाई थीं |
कोई चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो कितना ही विवेकशील क्यों न हो ,ईर्ष्या उस का पतन कर देती है | ईर्ष्या से लोग अपमानित हो जाते हैं | बृहस्पति देवताओं के आचार्य थे ,वेदों शास्त्रों के ज्ञाता थे बहुत विद्वान थे पर उन को भी इर्श्यावश अपमानित होने पड़ा था | बृहस्पति के एक भाई थे जिन का नाम सवर्त था वे बड़े विद्वान और सज्जन थे | इस कारण बृहस्पति को उन से ईर्ष्या होने लगी | सज्जनों से लोग उन की सज्जनता के कारण भी जलते हैं | यह बात सच है | अपनी ईर्ष्या के कारण बृहस्पति ने संवर्त को कई तरह की तकलीफें दी ,यहाँ तक की संवर्त तंग आ कर घर से भाग गया और पागलों की तरह गाँव गाँव भटकने लगा |
उन्हीं दिनों इक्ष्वाकु -वंश के मरुत नाम के राजा ने महादेव जी को अपनी कठोर तपस्या से प्रसन्न करके उनके वरदान से हिमालय की किसी चोटीपर से सोने की राशि प्राप्त कर ली और उस को ले कर एक महायग्य करने का आयोजन किया | उस ने देवगुरु बृहस्पति से यग्य करने की प्रार्थना की | लेकिन बृहस्पति को भय हुआ कि इतना भारी यग्य करके राजा मरुत कहीं देवराज इंद्र से अधिक यश न प्राप्त कर ले | इस कारण उन्होंने मरुत को यग्य कराने से इनकार कर दिया |
राजा मरुत इस से नाराज तो हुए पर उन को बृहस्पति के भाई संवर्त का पता लग गया और उन्होंने उस से यग्य की पुरोहिताई करने की प्रार्थना की | पहले तो बृहस्पति के भय के कारण इनकार किया पर राजा के बहुत आग्रह करने पर राजी हो गए | बृहस्पति को जब यह मालूम हुआ कि संवर्त राजा मरुत का यग्य करने वाले हैं ,तो उन की ईर्ष्या और बढ़ गई | ईर्ष्या की आग उन के मन में इस प्रकार प्रबल हो उठी कि वे उस से दिन प्रतिदिन दुर्बल होने लगे | उन की देह की कांति फीकी पड़ गई और उन की दशा दयनीय हो गई | आचार्य की यह दशा देख कर देवराज इंद्र बहुत चिंतित हुए | उन्होंने बृहस्पति को बुलाया और उन का आदर सत्कार करके कुशल पूछा और बोले -” आचार्य ,आप दुबले क्यों हो रहे हो ? नींद तो आती है ना| सेवक लोग आपकी सेवा टहल तो ठीक से करते हैं न ? देवता लोग आप का यथोचित आदर तो करते हैं न ? कहीं किसी से कोई अपराध तो नहीं हुआ ?
बृहस्पति ने उतर दिया-देवराज ,कोमल शय्या पर सोया करता हूँ | सेवक लोग प्रेमपूर्वक सेवा टहल कर रहे हैं | देवताओं के व्यबहार में भी कोई अन्तर नहीं आया है | बस वे इतना ही कह पाए थे ,आगे उन से कुछ नहीं बोला गया |दु:ख के कारण उन का गला रूंध गया| देवगुरु का यह हाल् देख कर देवराज का जी भर आया | स्नेहपूर्वक पूछा -“गुरुदेव ,क्या बात है जो आप इतने व्यथित हो रहे हैं ?आप का रंग फीका पड़ गया है और आप दुबले भी बहुत हो गये हैं |आखिर बात क्या है|”
देवराज के बहुत आग्रह करने पर बृहस्पति ने कहा -” मेरा भाई संवर्त राजा मरुत के महायग्य की पुरोहिताई करने वाला है | यह मुझ से सहन नहीं हो पा रहा है | यही कारण है कि मैं दु:खी और दुबला हो रहा हूँ |” यह सुन कर देवराज अचम्भे में आ गये | वे वोले -ब्राह्मण श्रेष्ठ ,आप को तो सारी इच्छित वस्तुएं प्राप्त हैं |आप हम देवताओं के पुरोहित और मंत्री हैं | आप इतने बुद्धिमान हैं कि आप की सलाह का सभी देवता मान करते हैं | तो फिर बेचारा संवर्त आप का बिगाड़ ही क्या सकता है ? आप व्यर्थ ही उस से क्यों दु:खी हो रहे हैं ?”
इंद्र ने मानों अपने अतीत को भुला दिया था और स्वयं बृहस्पति को ईर्ष्या न करने का उपदेश देने लगा | बृहस्पति ने उन को उन की भूली हुई बातों का स्मरण करा कर कहा ” देवराज अपने किसी शत्रु की बढती देखकर तुम कभी चैन से सोये हो |” अपनी स्थिति से मेरी स्थिति की कल्पना करो | मेरी भी वही बात है | तुम्हारा अब यह कर्तव्य है कि किसी तरह संवर्त की बढती रोको और मेरी रक्षा करो |”
यह सुन कर इंद्र ने अग्नि को बुला कर कह दिया कि राजा मरुत के यहाँ जा कर किसी तरह उस का यग्य रोकने का प्रयत्न करें | आज्ञा पा अग्निदेव मृत्यु लोक को रवाना हुए | जब स्वयं ही अग्नि देव क्रोधित हो जाएँ तो फिर पूछना ही क्या | रास्ते में भयानक गर्जना से पृथ्वी को कंपाते हुए अग्निदेव प्रबल वेग से चले और राजा मरुत के आगे देवरूप में जा खड़े हुए | अग्निदेव को अपने यहा आया देख कर राजा मरुत के आनंद की सीमा न रही ,वह दैवी अतिथि का सत्कार करने दौड़ा | ” कोई है ? जल्दी ले लाओ आसन,अर्ध्य पाद्य और गाय ,शीग्रता करो ? राजा ने परिचरों को आज्ञा दे कर कहा | सत्कार और पूजा होजाने पर अग्निदेव ने अपने आने का कारण बताया और बोले -” राजन संवर्त को अपने यहांसे हटा दो |यदि चाहो तो बृहस्पति को पुरोहिताई करने को राजी कर दूंगा |संवर्त भी वहीं उपस्थित थे |अग्नि देव की बात सुन कर वह क्रोध में आगये | नियमपूर्वक ब्रह्मचर्य व्रत पालन करने के कारण संवर्त की शक्ति और तेज बृद्धि पर थे |
वह अग्नि से बोले -” देखो अग्नि देव ,आप ऐसी बातें न करें ,मैं आप को साबधान किये देता हूँ | मुझे अगर क्रोध आ गया तो आप को मैं अपनी दृष्टि से ही जला कर भस्म कर दूंगा | ब्रह्मचर्य में तो वह शक्ति है जिस से आग भी भस्म हो सकती है | संवर्त की बातें सुनते ही अग्निदेव भय से पीपल के पते की तरह कांपते वापस इंद्र भवन को लौट आये और देवराज को सारा हाल सुनाया | लेकिन देवराज को उन की बातों पर जरा भी विश्वास नहीं हुआ | वह बोले ” यह कैसी अजीब बात बता रहे हैं अग्निदेव ,अरे तुम तो स्वयं दूसरों को जलाने वाले हो ,कोई तुम्हे कैसे जला सकता है ? अग्नि ने ताना देते हुए कहा -“ऐसा न कहिये देवराज दूर क्यों जाते हो ,ब्रह्म तेज अवं ब्रह्मचर्य की शक्ति से तो आप भी परिचित नहीं हैं |”
देवराज को ब्राह्मणों का अपमान करने के कारण जो कष्ट उठाने पड़े थे अग्निदेव का उन की और ही इशारा था |इंद्र समझ गए और अग्नि से निराश हो कर उन्होंने एक गन्धर्व को बुला कर आज्ञा दी कि मरुत के पास जा कर मेरा यह संदेश सुनाओ कि यदि वह संवर्त का साथ न छोड़ेगा तो मैं उस का शत्रु बन जाऊँगा |” आज्ञा पा गन्धर्व मरुत राजा के पास गया और इंद्र का संदेशा कह सुनाया | पर मरुत राजा उस की बात सुन कर सहमत नहीं हुआ | वह बोला-“अपने मित्र से छल करना पाप है | मैं इस समय संवर्त का साथ नहीं छोड़ सकता |”
गन्धर्व ने कहा -” राजन ,जब इंद्र अपने बज्र का प्रहार करेंगे तो तुम कैसे बचोगे ?” गन्धर्व की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि आकाश में इंद्र के बज्र की कडक आवाज सुनाई देने लगी | उसे सुन कर राजा मरुत का दिल देहल गया | उस ने समझा कि इंद्र ने हमला कर दिया | वह संवर्त के पास गया और उन्हीं की शरण ली |
संवर्त ने राजा से कहा” डरो मत और अपनी तपस्या की शक्ति का प्रयोग कर दिया |बस वही इंद्र जो आक्रमणकारी बन कर आये थे नम्रतापूर्वक आकर राजा के यग्य में सम्मिलित हुए और सानन्द हवि ग्रहण कर चले गये | बृहस्पति ने ईर्ष्या वश जो प्रयत्न किए थे सब इस तरह बेकार हो गये और ब्रह्मचर्य की जीत हुई |
ईर्ष्या एक ऐसा पाप है जो बड़े से बड़ों को भी लग जाता है | आज संसार में हर कोई दुसरे से यही तो कर रहा है | एक लकीर जो लम्बी है उसे छोटी करने के लिए उस से लम्बी लकीर नहीं बन पा रही तो उसी को छोटा करने के लिए उसे मिटाया जा रहा है | मेरे कहने का आशय आप समझ गये होंगे यह भारत की राजनीती में भी हो रहा है और हर घर में भी |
