सीता के जन्म की कहानी

सर्व प्रथम सीता के जन्म की कहानी रामायण में ही वर्णित है ,जहाँ उस का पृथ्वी से उत्पन्न होने का उल्लेख मिलता है जो की जनक द्वारा पृथ्वी पर हल चलाते समय हल के फलक से पृथ्वी से निकली |वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड के एक प्रसंग के अनुसार ऋषि कुशध्वज की पुत्री वेदवती सीता हुई |

‘आनन्द रामायण ‘ के अनुसार ‘राजा पदमाक्ष ने लक्ष्मी और विष्णु की घौर तपस्या कर के लक्ष्मी को पुत्री के रूप में प्राप्त करने का वर प्राप्त किया |तदनुसार विष्णु द्वारा पदमाक्ष को दिए मातुलुंग फल से उस के एक कन्या उत्पन्न हुई | जिस का नाम पदमा रखा गया | राजा ने जब वह विवाह के योग्य हुई , तब उस का स्वयंवर किया ,स्वयंवर में राजा ने यह शर्त रखी कि जो अपने शरीर को आकाश के समान नीला कर लेगा उस को यह कन्या दूंगा ,लेकिन ऐसा कोई नहीं कर पाया | कन्या को सुंदर देख कर लोगों ने उस का बलात अपहरण करने की सोची ,जिस का प्रतिकार करने पर राजा से लोगों का युद्ध हुआ और उस में राजा पदमाक्ष मारा गया और पदमा अग्नि में कूद कर अंतर्ध्यान हो गई | एक समय पदमा अग्नि से निकल कर बाहर बैठी थी ,उसे उस समय विमान से जाते हुए रावण ने देखा और कामातुर हो उसे पकड़ने को दौड़ा |तभी कन्या अग्नि में समा गई | रावण ने अग्नि पर पानी डाल कर बुझा दिया और अग्नि से निकले पांच रत्नों को सन्दूक में रख कर ले गया और लंका में देवालय में रख दिया जहाँ रावण की आज्ञा से जब खेती बोई गई तो उस में एक सुंदर कन्या निकली | उस को पदमाक्ष का वंश नष्ट करने वाली जानकर मन्दोदरी ने उसे पेटी सहित किसी दुसरे राज्य में फेंकने की आज्ञा दी परन्तु उस कन्या ने रावण से कहा कि तेरे कुल का नाश करने के लिए तेरे राज्य में फिर एक बार अवश्य आउंगी || पेटी को रावण के दूतों ने विदेह के राज्य में गाड दिया |वहां किसी ब्राह्मण के हल चलाने पर सन्दूक निकली जिस में एक कन्या थी | हल की फाल से जन्म होने के कारण इस कन्या का नाम सीता पड़ा जिसे राजा विदेह ने पुत्री की तरह पाला |

“अदभुत रामायण” के अनुसार सीता पृथ्वी से उत्पन्न हुई थी ,पर वह मन्दोदरी के गर्भ से उत्पन्न हुई कन्या थी | यह कन्या मुनिओं के रक्त से उदभूत थी | एक समय ब्रम्हा की तपस्या कर उन से रावण ने यह वर प्राप्त किया कि मैं कभी न मरूं| जब मैं अपनी पुत्री से विषय की कामना करूं उसी स्थिति में मृत्यु को प्राप्त होऊं | इस प्रकार का वर प्राप्त कर वह उद्दण्ड हो गया ऋषियों के शरीर से कर रूप में थोडा थोडा रक्त इकट्ठा किया तथा यह रक्त रावण ने लक्ष्मी को पुत्री के रूप में प्राप्त करने हेतु यग्य कर रहे रित्समद द्वारा मन्त्रों से दीक्षित दूध और दर्भ से भरे हुए कलश में भर दिया | उस कलश को रावण अपने घर ले गया | क्रोध में मरने के लिए विष से भी भयंकर इस रक्त को मन्दोदरी ने पी लिया ,जिस से वह गर्भवती हो गई | मन्दोदरी पति समागम के बिना गर्भवती हो गई थी ,अत: उस ने पाप से बचने के लिए कुरुक्षेत्र में इस गर्भ का त्याग किया | इस स्थान पर यग्य की इच्छा से जनक ने सोने का हल चलाया ,जिस से सीता का जन्म हुआ | भागवत के अनुसार महाराजा सीरध्वज के यग्य के लिए धरती जोतने पर हल के फाल से सीता का जन्म हुआ | सन्दर्भ -पुराण कथा कोष ,बाल्मीकि रामायण वाल कांड ,उत्तर कांड आनन्द-रामायण सार ३१ ,अदभुत-रामायण सर्ग ६ .

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