कुब्जा के वचन उद्धव के प्रति

सुनियो एक संदेसो ऊधो गोकुल को जात |

ता पाछे तुम कहियो उनसों एक हमारी बात ||

माता पिता को हेत जानी के कान्ह मधुपुरी आए |

नाहिंन स्याम तिहारे प्रीतम ,न जसुदा के जाए ||

समुझौ बूझौ अपने मन में तुम जो कहा भलौ कीन्हों |

कह बालक ,तुम मत्त ग्वालिनी सबै आप बस कीन्हों ||

और जसोदा माखन -काजै बहुतक त्रास दिखाई |

तुमहिं सबै भिली दांवरि दीन्हों रच दया नहिं आई ||

अरू वृषभानसुता जो कीन्हों सो तुम सब जिय जानो |

याही लाज तजी ब्रज मोहन अब काहै दुख मानो ||

सूरदास यह सुनि सुनि बातें स्याम रहे सिर नाई |

इत कुब्जा उत प्रेम ग्वालिनी कहन न कछु बनिआई ||

हे उद्धव ,तुम ब्रज को जा रहे हो अत: वहां के लिए मेरा भी एक संदेश सुनते जाओ |जब आप अपना संदेश दे लें तो उस के बाद एक हमारी बात भी गोपियों से कहना | वह यह कि श्रीकृष्ण अपने माता पिता देवकी और वसुदेव का प्रेम देख कर मथुरा आये हैं | न तो वे गोपियों के प्रियतम हैं और न यशोदा के पुत्र हैं |तुम सब अपने मन में ही सोच समझ लो कि तुम ने श्रीकृष्ण के गोकुल में रहने पर उन के साथ क्या क्या भला किया था |कहाँ तो छोटी सी आयु के श्रीकृष्ण और कहाँ तुम मतवाली ग्वालिने ? आप सब ने उन्हें अपने वश में कर लिया था | यशोदा ने तो माखन के कारण उन्हें बहुत ही दुःख दिया था | तुम सब ने श्रीकृष्ण को बाँधने के लिए रस्सी दी थी उस समय तुम को उस पर तनिक भी दया नहीं आई ? वृषभानु की पुत्री राधा ने जो कुछ किया है वह तो तुम सब अपने मन में अच्छी तरह जानती ही हो |इसी शर्म के मारे तो श्रीकृष्ण जी ने ब्रज को छोड़ दिया | अब आप दुःख क्यों महसूस करती हो ? आप की करतूतों से ही तो श्रीकृष्ण गोकुल को छोड़ कर मथुरा आए हैं | सूरदास कहते हैं कि कुब्जा की इस तरह की बातें सुन सुन करके श्रीकृष्ण सिर झुकाए हुए स्थिर थे क्यों कि इधर तो उन के प्रेम की पात्र कुब्जा थी और उधर उन के प्रेम की संगिनी गोपियाँ थी अत: उन से कुछ बात बन नहीं रही थी कि क्या कहें और क्या न कहें ?

उपरोक्त संदेश कुब्जा जो कंस की दासी थी |वह शरीर से कुबड़ी थी | श्रीकृष्ण के स्पर्श के उस का कुबड़ापन दूर हो गया | वह एक सुन्दर स्त्री बन गयी | तभी से वह श्रीकृष्ण की सेवा में रहने लगी | उस को जब पता चला कि उद्धव जी गोपियों के पास जा रहे हैं तो उस ने भी अपना संदेश गोपियों के लिए दिया |

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