श्रीकृष्ण:शरण मम

निरखि किन नयना होऊ निहाल |

अति अदभुत आनंद-अम्बुद -सी सोहत सो सुखमा सुविसाल ||१ ||

नीरद-तनु दामिनी-सी दमकत छिन-छिन छवि-कन झरत रसाल |

अंग-अंग मनिगन दुति राजत झिलमिलात जनु उद्दुगन जाल ||2||

नाचत मन-मयूर अति उनमद निरखि इन्द्रधनु-सी वनमाल |

पुनि पुनि अति आनंद उर उमंगत सुनि-सुनि बंसीनाद रसाल ||3||

मुख-मयंक पे मुकुट मनोहर लसत कज्ज जनु कनक-मराल |

मधुर-मधुर मुसकान मनोहर मारत मनहुं मार सर-जाल ||४||

स्याम -स्नेह-सुधा नित वरसत परसत कंपत कुटिल कलिकाल |

सो सुठि सुधा पान करि रूचि सों भजहु निसंक न किमि नंदलाल ||५||

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