दध्यड आथर्वण ( ऋषि दधीचि )
महान तत्ववेता दध्यड के ,दधिची एवं दधीच नामान्तर थे |वे अथर्वकुल में उत्पन्न हुए थे | कई स्थानों में उन्हें अथर्वन का पुत्र कहा गया है | इसी कारण इन्हें आथर्वण पैतृक नाम प्राप्त हुआ है | अथर्व कुल में उत्पन्न दधीच ऋषि को अश्वमुख प्राप्त हुआ था | इंद्र ने दधीच को प्रवगर्यविद्या और मधुविद्या नामक दो विद्याएँ सिखाई थी | यह विद्या सीखते समय इंद्र ने इन्हें सावधान किया था तथा कहा था कि ” यह विद्याएँ तुम किसी और को सिखाओगे तो तुम्हारा मस्तक काट दिया जायेगा |
कुछ समय बाद अश्वनी कुमारों ने यह विद्या सिखने की इच्छा प्रकट की | अश्वनी कुमार सुप्रसिद्ध चिकित्सक थे दध्यड ऋषि ने इंद्र की दी हुई चेतावनी उन्हें बता दी |अश्वनी कुमार यह जानते हुए भी कि इंद्र अपना दंड दिए बिना नहीं मानेगा अत: उन्होंने एक उपाय खोज लिया | चिकित्सक तो वह थे ही |उन्होंने ऋषि के सिर को पहले काट दिया और उस के धड पर अश्व का सिर लगा दिया | दध्यड ऋषि ने तब अश्व मुख से मधु बिद्या दोनों अश्वनी कुमारों को सिखा दी | इंद्र को जब पता चला तो उस ने प्रतिज्ञा के अनुसार ऋषि का सिर धड से अलग कर दिया ,अश्वनी कुमार चिकित्सक तो थे ही उन्होंने पुन: ऋषि दध्यड का सिर उन के धड से जोड़ दिया |फलस्वरूप वे पुन: पहले की तरह हो गए |
मधु बिद्या – दध्यड ऋषि का तत्व ज्ञान मधु बिद्या के नाम से प्रसिद्ध है | उन्होंने त्वाष्ट मधु का उपदेश दिया |त्वष्टा सूर्य को कहते हैं , उस से सम्बन्धित मधु को त्वाष्ट मधु कहते हैं | अर्थात जो परमात्मन सम्बन्धी रहस्यमय मधु विज्ञान था उस का भी उपदेश दिया |
सृष्टि की रचना करते हुए परमात्मा ने दो पैरों वाले शरीरों की तथा चार पैर वाले शरीरों की रचना की | जिस प्रकार पक्षी अपने बनाए हुए घोंसले में अंदर जा कर बैठ जाता है वैसे ही वह परमात्मा रुपी पक्षी लिंग शरीर के रूप में इन शरीरों में प्रविष्ट हो गया है | वही इन शरीरों में शयन करने के कारण पुरिशय है अर्थात पुरुष है | संसार की कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जिस में पुरुष का वास न हो अर्थात पुरुष सभी वस्तुओं में व्याप्त है | वही पुरुष बाहर है और वही अंदर है ,समस्त वस्तुओं का सम्बन्ध आत्मा से है और आत्मा द्वारा एक दूसरे से है | इस आधार पर ऋषि दध्यड ने वस्तुओं के आपस में एक दूसरे पर आश्रित होने के सिधांत का प्रतिपादन किया |
वह परम तत्व रूप रूप के प्रतिरूप हो गया | अर्थात परम तत्व एक ही है परन्तु जिस जिस शरीर में प्रवेश करता है उस उस का नाम रूप धारण करता है | सम्पूर्ण प्राणी जगत में एक ही आत्मा सूत्र रूप में बंधी है | जैसे माता पिता के अनुरूप पुत्र उत्पन्न होता है वैसे ही चार पैर वालों से चार पैर वाला और दो पैर वालों से दो पैर वाले की उत्पति होती है ,ऐसा सम्भव नहीं है कि चार पैर वालों से दो पैर वाले और दो पैर वालों से चार पैर वाले उत्पन्न हो | अब प्रश्न उठता है कि परम तत्व प्रति रूप को प्राप्त क्यों करता है | वह इस आत्मा के स्वरूप को प्रकट करने के लिए ही प्रतिरूप होता है | क्यों कि यदि नाम रूपों की अभिव्यक्ति न होती तो आत्मा का तो आत्मा का निरुपाधिक परमार्थ रूप प्रकट नहीं हो सकता था | अत: जब आत्मा रूप रूप में प्रतिरूप है तभी उस की नामरूपात्मक अभिव्यक्ति होती है |
इन्द्रोमायाभि: पुरुरूप ईयते-वेद में भी वर्णित है कि इंद्र माया से अनेकरूप हो जाता है | वह परम तत्व एक ही है | मायोपाधिक् हो कर अनेक रूपों को धारण करता है | उस के इस यथार्त-परमार्थ स्वरूप को हरने वाले या अपनी और आकर्षित करने वाले इन्द्रिय्ररुपी अश्व दस हैं ५ ज्ञान इंद्रियां +५ कर्मेन्द्रियाँ व्यष्टि रूप से ,लेकिन समष्टि रूप से सहस्त्र और अनन्त हैं |क्यों कि परमात्मा ने इन इन्द्रियों को बाह्यमुखी बनाया है ,वे हमेशा सांसारिक भोग पदार्थों की और आकर्षित रहती हैं | अत: वह नाम और रूपों से अनेक रूप में भासित होता है |परन्तु यह आत्मा तो एक है वही ब्रह्म है | वह यह ब्रह्म अपूर्व अर्थात जिस के पहले कोई माजूद न हो,अनपर अर्थात जिस के बाद कोई न हो ,अनन्तर अर्थात जिस के अंदर कोई न हो ,अवाह्य् अर्थात जिस के बाहर कोई न हो ऐसा है |अयमात्मा ब्रह्म “यह आत्मा ब्रह्म है ,प्रत्येक प्राणी इस तत्व को अपने अंदर अनुभव करता है |
दध्यड ऋषि ने जिस मधु बिद्या का उपदेश अश्वनी कुमारों को दिया था उसी मधु बिद्या के ऋषि याज्ञवल्क्य भी वेता थे | उन्होंने इस मधु बिद्या का आध्यात्म ज्ञान की जिज्ञासु अपनी पत्नी मैत्रेयी को उपदेश दिया था कि यह दध्यड ऋषि द्वारा प्रोक्त मधु बिद्या है | दध्यड ने अश्विनी कुमारों से कहा था कि यह बिद्या मनुष्य जाति के कल्याण के लिए है | जैसे घने अँधेरे में बिजली के कडकने के बाद घनघोर बारिस होती है वैसे ही अबिद्या के अन्धकार में मधु विद्या के इस उग्र उपदेश के बाद मानव जाति की अंतरात्मा में शांति की वर्षा होगी | अत: इसी उद्देश्य को ध्यान में रख कर यह ज्ञान अश्वनी कुमारों को दिया था |
दध्यड अद्वितीय तत्व अयमात्मा ब्रह्म के अनेक रूपों का वर्णन करते है | यह मायिक शक्ति से एकेक रूप हो जाता है | परन्तु परम तत्व और अनेक तत्व एक के ही अलग अलग रूप हैं | एक ही आत्मा के सूत्र में बंधे होने के कारण समस्त वस्तुओं की एक दूसरे पर निर्भरता है |
सारांश में कहा जा सकता है की मधु बिद्या ही ब्रह्म विद्या है |यह पृथ्वी समस्त भूतों की मधु है |सब भूत इस पृथ्वी के मधु है | ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणियों (भूतों) का मधु है | जैसे मधु का छता अनेक मधुकरों द्वारा बनाया जाता है उसी प्रकार यह पृथ्वी समस्त भूतों द्वारा तैयार की गई है | समस्त पृथ्वी में जो व्याप्त है वह तेजोमय अमृत स्वरूप पुरुष है | यही समष्टि रूप ब्रह्मांड का आत्मा है | जो पिंड शरीर में व्याप्त है वह भी यही अमृत रूप आत्मा है | अत: आत्मा ही अमृत है |ब्रह्मेदं सर्वमं ” यही ब्रह्म है ,यही सर्व है | आप अग्नि,वायु, सूर्य,दिक्,चन्द्रमा ,विद्युत् ,मेघ,आकाश ,धर्म,सत्य,मानवता क्रमश: समस्त भूतों का सार है और समस्त भूत पदार्थ इन के सार हैं | क्यों कि वे एक ही आत्मतत्व से परस्पर समन्धित हैं |
इति
