ययाति का गृह त्याग
जैसे शरीरधारियों की छ: इन्द्रियाँ होती हैं वैसे ही नहुष के छ: पुत्र थे उन के नाम यति ,ययाति ,संयाति,आयती,वियति और कृति |नहुष अपने बड़े बेटे तो राज्य देना चाहते थे परन्तु उस ने स्वीकार नहीं किया क्यों की वह राज्य पाने का परिणाम जानता था | राज्य एक ऐसी वस्तु है कि जो उस के दाव पैच और प्रबन्ध आदि में भीतर प्रवेश कर जाता है वह अपने आत्मस्वरूप को नहीं समझ सकता | इसलिए ययाति राजा के पद बैठे | वह स्वयं शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और दैत्य राज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा को पत्नी के रूप में स्वीकार कर के पृथ्वी की रक्षा करने लगा |
देवयानी के दो पुत्र हुए -यदु और तुर्वसु तथा शर्मिष्ठा के तीन पुत्र हुए -द्रुह्यु,अनु और पुरु | जब देवयानी को मालूम हुआ की शर्मिष्ठा के भी मेरे पति के द्वारा गर्भ रहा है तो वह क्रोध से बेसुध हो कर अपने पिता के घर चली गयी | कामी ययाति ने काफी अनुनय-विनय की लेकिन वह न मानी | शुक्राचार्य ने क्रोध में ययाति को श्राप दे दिया और कहा कि जा तेरे शरीर में बुढापा आ जाय ,जो मनुष्यों को कुरूप कर देता है |ययाति ने कहा – ब्रह्मन, आप की पुत्री के साथ विषय भोग करते करते मेरी तृप्ति नहीं हुई है ,इस श्राप से तो आप की पुत्री का ही अनिष्ट होगा | इस पर शुक्राचार्य ने कहा -अच्छा जाओ ,जो प्रसन्नता से तुम्हें अपनी जवानी दे दे ,उस से अपना बुढापा बदल लो |
राजधानी आ कर ययाति ने अपने बड़े पुत्र यदु से कहा बेटा तुम अपनी जवानी मुझे दे दो और अपने नाना का दिया हुआ यह बुढापा ले लो | यदु ने कहा -पिता जी ,बिना समय के ही प्राप्त हुआ आप का बुढापा ले कर तो मैं जीना भी नहीं चाहता ,क्यों की कोई भी मनुष्य जबतक विषय सुख का अनुभव नहीं कर लेता ,तबतक उसे उस से वैराग्य नहीं होता | इसी प्रकार तुर्वसु,द्रुह्यु ,अनु ने भी पिता की आज्ञा अस्वीकार कर दी | तब ययाति ने अपने छोटे बेटे किन्तु गुणों में बड़े अपने बेटे पूरू को बुला कर पूछा और कहा -बेटा अपने बड़े भाइयों के समान तुम्हें तो मेरी बात नहीं टालनी चाहिए | पूरू ने कहा – पिता जी, पिता की कृपा से मनुष्य को परम पद की प्राप्ति होती है | वास्तव में पुत्र का शरीर पिता का ही दिया होता है ,ऐसी अवस्था में ऐसा कौन है ,जो इस संसार में पिता के उपकारों का बदला चुका सके |उत्तम पुत्र तो वह है जो पिता के मन की बात बिना कहे ही कह दे | कहने पर श्रद्धा के साथ आज्ञा पालन करनेवाले पुत्र को मध्यम कहते हैं | जो आज्ञा प्राप्त होने पर भी अश्रद्धा से उस का पालन करे ,वह अधम पुत्र है | इस प्रकार कह कर पिता का बुढापा स्वीकार कर लिया | राजा ययाति भी उस की जवानी ले कर पूर्ववत विषयों का सेवन करने लगा |
राजा ययाति इस प्रकार स्त्री के वश में हो कर विषयों उपभोग करते रहे |एक दिन जब अपने अध्:पतन पर दृष्टि गयी तब उन्हें बड़ा वैराग्य हुआ और उन्होंने अपनी प्रिय पत्नी देवयानी से एक कहानी कही -भृगु नन्दिनी ,तुम यह कथा सुनो ,एक था बकरा ,वह वन में अकेला ही अपने को प्रिय लगने वाली वस्तुएं ढूढता हुआ घूम रहा था |उस ने देखा कि अपने कर्म वश एक बकरी कूएँ में गिर पड़ी है | वह बकरा बड़ा कामी था ,वह सोचने लगा कि इस बकरी को किस प्रकार कूएँ से निकाला जाये | उस ने अपने सींग से कूएँ के पास की धरती खोद डाली और रास्ता तैयार कर लिया | जब वह सुन्दरी बकरी बाहर निकली ,तो उस ने उस बकरे से ही प्रेम करना चाहा | वह दाढ़ी-मूंछ मंडित बकरा हृष्टपुष्ट ,जवान ,बकरियों को सुख देने वाला ,बिहार कुशल और बहुत प्यारा था | जब दूसरी बकरियों ने देखा कि कूएं में गिरी बकरी ने उसे अपना प्रेमपात्र चुन लिया है ,तब उन्होंने भी उसी को अपना पति बना लिया | वे तो पहले ही पति की तलाश में थीं | उस बकरे के सिर पर कामरूप पिशाच सवार था | वह अकेला ही बहुत सी बकरियों के साथ विहार करने लगा और अपनी सुध बुध खो बैठा | जब उस की कूएं से निकली हुई प्रियतमा बकरी ने देखा कि मेरा पति तो अपनी दूसरी प्रियतमा बकरी से बिहार कर रहा है ,तो उसे बकरे की करतूत सहन नहीं हुई | उस ने देखा कि यह तो बड़ा कामी है ,इस के प्रेम का कोई भरोसा नहीं है और यह मित्र के रूप में शत्रु का काम कर रहा है |अत: वह बकरी उस इन्द्रियलोलुप बकरे को छोड़ कर बड़े दुःख से अपने पालने वाले के पास चली गयी | वह दीन कामी बकरा उसे मनाने के लिए मैं-मैं करता हुआ उस के पीछे पीछे चला | परन्तु उसे मार्ग में मना न सका |उस बकरी का स्वामी एक ब्राह्मण था | उस ने क्रोध में आ कर बकरे के लटकते हुए अंडकोष को काट दिया | परन्तु फिर उस बकरी का ही भला करने के लिये फिर से उसे जोड़ दिया | इस प्रकार अंडकोष जुड़ जाने पर वह बकरा फिर कूएं से निकली हुई बकरी के साथ बहुत दिनों तक विषय भोग करता रहा ,परन्तु आज तक उसे संतोष न हुआ| सुन्दरी मेरी भी यही दशा है |तुम्हारे प्रेमपाश में बन्ध कर मैं भी अत्यंत दीन हो गया हूँ ,तुम्हारी माया से मोहित हो कर मैं अपने आप को भी भूल गया हूँ | \
प्रिय,पृथ्वी में जितने भी धान्य(चावल,जों आदि),सुवर्ण,पशु और स्त्रियाँ हैं -वे सब के सब मिल कर भी उस पुरुष के मन को संतुष्ट नहीं कर सकते ,जो कामनाओं के कारण जर्जर हो रहा है |विषयों के भोगने से भोगवासना कभी शांत नहीं हो सकती ,वल्कि जैसे घी की आहुति डालने पर आग और भडक उठती है ,वैसे ही भोगवासनाएं भी भोगों से प्रकट हो जाती हैं |जब मनुष्य किसी भी प्राणी और किसी भी वस्तु के साथ रागद्वेष का भाव नहीं रखता ,तब वह समदर्शी हो जाता है तथा उस के लिये सभी दिशाएँ सुखमयी बन जाती हैं | विषयों की तृष्णा ही दुखों का उद्गम स्थान है |मंदबुद्धि लोग कठिनाइयों से उस का त्याग कर सकते है |शरीर बूढा हो जाता है पर तृष्णा नित्य नवीन ही होती जाती है |अत: जो अपना कल्याण चाहता है ,उसे शीघ्र से शीघ्र इस तृष्णा (भोग वासना) का त्याग कर देना चाहिये | और तो क्या -अपनी माँ,बहिन और कन्या के साथ भी अकेले एक आसन पर सटकर नहीं बैठना चाहिये |इन्द्रियां इतनी बलबान हैं कि वे बड़े बड़े विद्वानों को भी विचलित कर देतीं हैं | विषयों का बार बार सेवन करते करते मेरे एक हजार वर्ष पूरे हो गये ,फिर भी क्षण प्रति क्षण उन भोगों की लालसा बढती ही जा रही है |इसलिए मैं अब भोगों की वासना तृष्णा का परित्याग करके अपना अंत:करण परमात्मा के प्रति समर्पित कर दूंगा और शीत -उष्ण ,सुख दुःख आदि के भावों से ऊपर उठ कर अहंकार से मुक्त हो हरिनों के साथ वन में विचरूँगा |लोक परलोक दोनों के ही भोग असत हैं ,ऐसा समझ कर न तो उन का चिन्तन करना चाहिये और न भोग ही समझना चाहिये कि उन के चिन्तन से ही जन्म-मृत्यु रूप संसार की प्राप्ति होती है और उन के भोग से तो आत्मनाश ही हो जाता है | वास्तव में इन के रहस्य को जान कर इन से अलग रहने वाला ही आत्मज्ञानी है |
ययाति ने अपनी पत्नी से इस प्रकार कह कर पूरू की जवानी उसे लौटा दी और उस ने अपना बुढापा ले लिया | उन के मन में अब विषयों की वासना नहीं रह गई थी ,इस के बाद उन्होंने दक्षिण -पूर्व दिशा में द्रुह्यु ,दक्षिण में यदु,पश्चिम में तुर्वसु और उत्तर में अनु को राज्य दे दिया |पूरू को अपने राज्य का अभिषेक कर के सभी भाइयों को उस के अधीन कर दिया | जैसे पंख निकल आने पर पक्षी अपना घोंसला छोड़ देता है वैसे ही उन्होंने एक क्षण में ही सब कुछ छोड़ दिया |
जब देवयानी ने यह गाथा सुनी तो उस ने समझा कि ये मुझे निवृतिमार्ग के लिये प्रोत्साहित कर रहे हैं |क्यों कि स्त्री पुरुष में परस्पर प्रेम के कारण विरह होने पर विकलता होती है ,यह सोच कर ही उन्होंने यह बात कही होगी | स्वजन सम्बन्धियों का होना ईश्वर के अधीन है | एक स्थान पर इकठे होना वैसे ही है जैसे मुसाफिर खाने में इकट्ठे होना है| ऐसा समझ कर देवयानी ने सब पदार्थों की आसक्ति त्याग दी और अपने मन को समस्त जगत के रचयिता जो परम शांत और अनन्त तत्व है में विलीन हो गई | इति
