वामदेव

मह्रिषी वामदेव गोतम ऋषि के पुत्र थे | ऐसा माना जाता है कि उन्हें माता के गर्भ में रहते हुए ही आत्मानुभूति ,आत्म साक्षात्कार हुआ था | इस से यह पता चलता है कि आत्मानुभूति के लिए किसी आश्रम की जरूरत नहीं होती यह तो गर्भ में भी सम्भव है , इस के लिए दृढ संकल्प और निश्चय की आवश्यकता है | उन्हें पुनर्जन्म की कल्पना के विषय में विशेष अभिरुचि थी |वे पूर्वजन्म में अपने आप को मनु तथा सूर्य होना कहते थे | उन्हें गर्भ में ही यह स्पष्ट हो गया था कि उन के अन्दर की चेतना ही आत्मा है | इसीलिए वे आत्मा के पाँचों कोशों की रचना,इन्द्रियों के विकास और उन की क्षमताओं की उत्पति को देख सके जिन्हें प्राप्त करके मानवीय पूर्णता विकसित होती है | वामदेव ऋषि आत्म-साक्षात्कार होने पर अपने शरीर ,मन और बुद्धि से सारे सम्बन्ध तोड़ कर ,सब कामनाओं को प्राप्त कर अमर हो गये ,मानो ब्रह्म को जान कर ब्रह्म हो गए |:ब्रह्मविद ब्रह्मैव भवति “|

इस से यह निष्कर्ष निकलता है कि प्रथमत:ब्रह्म साक्षात्कार के लिए संकल्प महत्वपूर्ण है ,मानव जीवन में आश्रम बिशेष की कोई जरूरत नहीं होती | क्यों कि वामदेव ने अपनी माता के गर्भ में ही आत्म साक्षात्कार किया था | दूसरा मानव जीवन में ही ब्रह्म ज्ञान और साक्षात्कार संभव है | तीसरे मानव जीवन प्राप्त करने से पूर्व उसे सैकड़ों मानवेतर योनियों में जन्म लेना पड़ता है | जिन में ऐसे कष्ट झेलने पड़ते है जैसे लोहे के बने कमरे में कैद होने पर झेलने पड़ते हैं | लेकिन हर बार वामदेव ऋषि उन जन्मों से उन की कर्मजाल की बेड़ियों को तोड़ कर उपर उठते रहे | उन्होंने अपने बंधन को जाल के समान बताया है | वे पुनर्जन्म के सिधान्त को मानने वालों के पुरोधा थे | उन्होंने अपने अनेक पूर्व जन्मों का न केवल कथन किया बल्कि देवताओं के भी सभी जन्मों को देखा है | पुनर्जन्म से सम्बन्धित उन का तत्व ज्ञान जन्मत्रैयी के नाम से सुप्रसिद्ध है |

ऋषि वामदेव का तत्व चितन –

प्रथम जन्म -वामदेव ऋषि के अनुसार पुरुष में ही पहला गर्भ होता है ,क्यों की वीर्य ही भोजन के सार तत्व से बनता है | वीर्य -रेतस पुरुषके अंग अंग के तेज और पौरुष का ही सार है | जीवन तत्व वीर्य में ही रहता है | इसलिए कहा गया है कि” हम अपने ही में अपने को धारण किये रहते हैं | पुरुष के अंगों के तेज से ही गर्भ होता है | पुरुष पहले वीर्य रक्षा द्वारा अपने में अपने को धारण करता है और जब उसे स्त्री में सिंचित करता है तब मानों वह स्वयं को ही सिंचित करता है | इस प्रकार पुरुष अपने को ही उत्पन्न करता है ,यही उस का प्रथम जन्म है | अत: वीर्य रूप में पहले पुरुष ही गर्भ धारण करता है | वह इस वीर्य गर्भ को स्त्री में स्थापित करता है | अत: वीर्य गर्भ दान पुरुष का पहला जन्म है |

दूसरा जन्म – वह वीर्य स्त्री में जा कर उस का अपना ही रूप हो जाता है ,जैसे अपना ही अंग हो यह उस का | यद्यपि यह उसे पुरुष से प्राप्त होने के कारण विजातीय द्रव्य होता है परन्तु स्त्री का आत्मवत हो जाने पर उसे कष्ट नहीं होता | स्त्री ,वीर्य रूप पुरुष की आत्मा को अपने अन्दर सुरक्षित रख कर उस का पालन पोषण करती है | इसलिए गर्भ का पालन पोषण करने वाली स्त्री भी पालन पोषण करने योग्य होती है | स्त्री पुरुष को ही गर्भ में धारण करती है | इस प्रकार जब बालक का जन्म होता है तो वह पुरुष का अपना ही जन्म होता है | इसलिए कहा गया है कि पिता ही पुत्र रूप में उत्पन्न होता है “पिता एवं पुत्र्रूपेण जायते |”पिता तो स्वयं बीज रूप वीर्य है | पिता का यही तत्व वीर्य बन कर पहले गर्भ में जन्म लेता है फिर माता के पेट में विकसित हो कर बालक रूप में जन्म लेता है | बालक रूप में उस का जन्म ही उस का दूसरा जन्म है |

तृतीय जन्म – पुत्र इस जन्म में पिता का प्रतिनिधि बन जाता है | इस संसार में अपने पुन्य कर्मों को भोग कर ,आयु क्षीण होने पर मृत्यु उपरान्त इस संसार को छोड़ देता है | इस लोक से जाते ही वह फिर उत्पन्न हो जाता है यही “पुनर्जन्म पुरुष का तीसरा जन्म है”|

मृत्यु उपरान्त जीवन के बिषय में उपनिषद युग में एक जिज्ञासा बनी हुई थी | परन्तु वामदेव ऋषि ने पुनर्जन्म को मनुष्यों का तीसरा जन्म बता कर यह सिद्ध कर दिया कि मृत्यु के बाद मनुष्य का इस संसार में पुन: जन्म अवश्यंभावी है |परन्तु वह आत्मसाक्षात्कार करके इस आवागमन के चक्र से भी मुक्त हो सकता है ,जैसे रहस्यवादी वामदेव स्वयं मुक्त हो गये थे |

सन्दर्भ -जन्मत्रयी मीमांसा

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