श्री मद्भागवत की महिमा
ध्यायत्श्चरनाम्भोजं भावनिर्जितसा |
औत्कन्ठ्याक्षुकलाक्षस्य हरदयासीन्में शनैर्हरि: | |
प्रेमातिभरनिर्मिन्नपुलकाग्डोSतिनिर्वृत: |
आनन्दसम्प्लवे लीनो नापश्यमुभ्यं मुने ||
रूपं भगवतो यत्नमन:कान्तं शुचापहम |
अपश्यन सहसोतस्ये वैक्लव्याद दुर्मना इव ||
श्री मद्भागवत की महिमा के बारे में क्या लिखूं इस के बारे में मैंने पहले ही “मैं कोन हूँ ” में कह दी गई है | उस के बराबर कौन कह सकता है \उन चार श्लोकों को कितनी ही बार पढ़ चुकने के बाद भी जब उन का स्मरण होता है ,मन में अद्भुत भाव पैदा होते हैं | कोई अनुवाद उन श्लोकों की गम्भीरता और मधुरता को पा नहीं सकता | उन चारों श्लोकों से मन निर्मल करके फिर इस प्रकार भगवान् का ध्यान करना चाहिए |
मुझ को श्रीमद्भागवत में अत्यंत प्रेम है | मेरा विश्वास और अनुभव है कि इस के पढने और सुनने से मनुष्य को ईश्वर का सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है ,और उन के चरणकमलों में अचल भक्ति होती है | इस के पढने से मनुष्य को दृढ निश्चय हो जाता है कि इस संसार को रचने और पालन करने वाली कोई सर्व व्यापक शक्ति है –
एक अनंत त्रिकाल सच चेतन ,शक्ति दिखात |
सिरजत ,पालत,हरत ,जग,महिमा वरनि न जात ||
इसी एक शक्ति को लोग ईश्वर,ब्रह्म,परमात्मा इत्यादि अनेक नामों से पुकारते हैं |भागवत के पहले ही श्लोक में वेदव्यास जी ने ईश्वर के स्वरूप का वर्णन किया है कि “जिस से इस संसार की सृष्टि ,पालन और संहार होते हैं ,जो त्रिकाल में सत्य है अर्थात जो सदा रहा भी,है भी और रहेगा भी -और जो अपने प्रकाश से अन्धकार को सदा दूर रखता है,उस परम सत्य का हम ध्यान करते हैं |” उसी स्थान में श्रीमद्भागवत का स्वरूप भी इस प्रकार से संक्षेप में बर्णित है कि इस भागवत में जो दूसरों की बढती देख कर डाह नहीं करते ,ऐसे साधुजनों का सब प्रकार के स्वार्थ से रहित परम धर्म और वह जानने के योग्य ज्ञान बर्णित है जो वास्तव में सब कल्याण का देनेवाला और आधिभौतिक ,आधिदैविक और आध्यात्मिक ,इन तीनों प्रकार के ताप को मिटाने वाला है | जिन्होंने पुन्य के कर्म कर रखे हैं और जो श्रद्धा से भागवत पढ़ते और सुनते हैं ,वे इस का सेवन कर के समय से ही अपनी भक्ति से ईश्वर को अपने हृदय में अविचल रूप से स्थापित कर लेते हैं |
ईश्वर का ज्ञान और उन में भक्ति का परम साधन यह दो पदार्थ जब किसी प्राणी को प्राप्त हो गए तो कोन सा पदार्थ रह गया ,जिस के लिए मनुष्य कामना करे और यह दोनों पदार्थ श्रीमद्भागवत से पूरी मात्रा में प्राप्त होते हैं |इसलिए यह पवित्र ग्रन्थ मनुष्य मात्र का उपकारी है | जब तक मनुष्य भागवत को पढ़े नहीं और उस की इस में श्रद्धा न हो ,तब तक वह समझ नहीं सकता कि ज्ञान-भक्ति -वैराग्य का यह कितना विशाल समुद्र है | भागवत पढने से उस को यह विमल ज्ञान हो जाता है कि एक ही परमात्मा प्राणी प्राणी में बैठा हुआ है और जब उस को यह ज्ञान हो जाता है ,तब वह अधर्म करने का मन नहीं करता क्यों कि दूसरों को चोट पहुंचाना अपने को चोट पहुँचाने के समान हो जाता है | इस का ज्ञान होने से मनुष्य सत्य धर्म में स्थिर हो जाता है ,स्वभाव ही से दया धर्म का पालन करने लगता है और किसी अहिंसक प्राणी के उपर बार करने की इच्छा नहीं करता | मनुष्यों में परस्पर प्रेम और प्राणी मात्र के प्रति दया का भाव स्थापित करने के लिए इस से बढ़ करकोई साधन नहीं |वर्तमान समय में ,जब संसार के बहुत अधिक भागों में भयंकर युद्ध छिड़ा हुआ है ,मनुष्य मात्र को इस पवित्र धर्म का उपदेश अत्यंत कल्याणकारी होगा | जो भगवत भक्त हैं और जो श्रीमद्भागवत के महत्व को जानते हैं ,उन का कर्तव्य है कि मनुष्य के लोक और परलोक दोनों के बनाने वाले इस पवित्र ग्रन्थ का प्रचार करें |
यह श्रीमद्भागवत अत्यंत गोपनीय रहस्यात्मक पुराण है | यह भगवत स्वरूप का अनुभव करने वाला और समस्त वेदों का सार है | संसार में फंसे हुए जो लोग इस घोर अज्ञान अन्धकार को पार जाना चाहते हैं .उन के लिए आध्यात्मिक तत्वों को प्रकाशित करने वाला यह एक अद्वितीय दीपक है |
जिज्ञासु लोग जो श्रीमद्भागवत रुपी अमृत का पान करना चाहते हैं ,मेरी इस वेबसाइट http://thegodweknow.com को follow करते रहें | जो लोग यश,धर्म और बिजय के लिए तथा पापक्षय एवं मोक्ष की प्राप्ति केलिए धर्मात्मा मनुष्य को सदा ही मेरे भागवत शास्त्र का पाठ करना चाहिए | इस का पाठ आयु,आरोग्य और पुष्टि को देने वाला है तथा मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है |
मदन -आगे प्रथम स्कन्ध: प्रथमोSध्याय: /द्वितीयोSध्याय
