मैं कौन हूँ

हम मैं से उस का अर्थ अपने शरीर से लेते हैं लेकिन मैं शरीर नहीं हूँ कभी सोच कर देखो |मैं कौन हूँ ,जानने के

लिए पढ़ें मेरी आगे आने वाली पोस्ट : मैं कौन हूँ क्या कहते हैं हमारे शास्त्र |

सृष्टी से पहले केवल मैं ही मैं था और सृष्टी की निवृति के बाद भी मैं ही मैं रहूँगा | मेरे अतिरिक्त न कोई स्थूल

था न सूक्ष्म न तो दोनों का कारण अज्ञान | जहाँ यह सृष्टि नहीं है ,वहां मैं ही मैं हूँ और सृष्टि के रूप मैं जो कुछ

भी दिखाई दे रहा या प्रतीत हो रहा है वह भी मैं हूँ और इस के अतिरिक्त जो कुछ भी बच रहा है वह भी मैं ही हूँ |

वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मा में दो चंद्रमाओं की तरह

मिथ्या प्रतीत हो रही है या विद्यमान होने पर भी आकाश में तारों के समूह में राहू की तरह मेरी भी प्रतीति नहीं

होती इसे मेरी माया समझना चाहिए | जैसे प्राणियो के पंचभूत रचित छोटे बड़े शरीरों में आकाशादि पंचमहाभूत

उन शरीरों के कार्य रूप से निर्मित होने के कारण प्रवेश करते भी हैं और पहले से ही उन स्थानों और रूपों में कारण

रूप से विद्यमान रहने के कारण प्रवेश नहीं भी करते ,वैसे ही उन प्राणियो के शरीर की दृष्टि से मैं उन में आत्मा

के रूप में प्रवेश किये हुए हूँ और आत्मदृष्टि से अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होने के कारण उन में प्रविष्ट

नहीं भी हूँ |यह ब्रह्म( भगवान) नहीं यह ब्रह्म नहीं इस प्रकार निषेध की पद्धति से और यह ब्रह्म है यह ब्रह्म है

इस अन्वय की पद्धति से यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित हैं वे

ही वास्तविक तत्व हैं ,जो आत्मा अथवा परमात्मा तत्व जानना चाहते हैं उन्हें केवल इतना ही जानने की

आवश्यकता है |

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