अष्टांगयोग की विधि
योग के लक्षण जिस के द्वारा चित शुद्ध और प्रसन्न हो कर परमात्मा के मार्ग में प्रवृत हो जाता है | यथा शक्ति शास्त्र सम्मत स्वधर्म का पालन करना और शास्त्र विरुद्ध आचरण का परित्याग करना ,भाग्य से जो कुछ मिल जाये उसी से संतुष्ट रहना आत्मज्ञानियों के सम्पर्क में रहना ,विषयवासनाओं को बढ़ाने वाले कर्मों से दूर रहना ,संसार के बंधन से छुड़ाने वाले धर्म से प्रेम करना | पवित्र और अल्प आहार करना ,निरन्तर एकांत और निर्भय स्थान में रहना | मन वाणी और शरीर से किसी जीव को न सताना ,सत्य बोलना ,चोरी न करना ,आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का संग्रह न करना ,ब्रम्हचर्य का पालन करना ,तपस्या करना (धर्म पालन के लिए कष्ट सहना ) बाहर अंदर से पवित्र रहना ,शास्त्रों का अध्ययन करना ,भगवान की पूजा करना,वाणी पर संयम रखना ,उत्तम आसनों का अभ्यास कर के स्थिरता पूर्वक बैठना ,धीरे धीरे प्राणायाम के द्वारा श्वास को जीतना ,इन्द्रियों को मन के द्वारा विषयीं से हटा कर अपने हृदय में ले जाना | मूलाधार आदि किसी एक केंद्र में मन के सहित प्राणों को स्थिर करना ,निरन्तर भगवान की लीलाओं का चिन्तन और चित को समाहित करना | इन से तथा व्रत दानादि दुसरे साधनों से भी सावधानी के साथ प्राणों को जीत कर बुद्धि के द्वारा अपने कुमार्गगामी दुष्ट चित को धीरे धीरे एकाग्र करें,परमात्मा के ध्यान में लगायें |
पहले आसन करें फिर प्राणायाम के अभ्यास के लिए साफ़ जगह में कुश- मृगचर्म आदि का आसन बिछावें |उस पर शरीर को सीधा और स्थिर रखते हुए सुखपूर्वक बैठ कर अभ्यास करें |आरम्भ में पूरक,कुम्भक और रेचक क्रम से अथवा इस के विपरित रेचक,कुम्भक और पूरक कर के प्राण के मार्ग का शोधन करें ,जिस से चित स्थिर और निश्चल हो जाए | जिस प्रकार वायु और अग्नि से तपाया हुआ सोना अपनी अशुद्धि को त्याग देता है ,उसी प्रकार जो योगी प्राण वायु को जीत लेता है उस का मन बहुत जल्दी शुद्ध हो जाता है |अत योगी को उचित है कि प्राणायाम से वातपित जनित दोषों को ,धारणा से पापों को ,प्रत्याहार से विषयों के सम्बन्ध को और ध्यान से भगवद विमुख करने वाले रागद्वेष आदि दुर्गुणों को दूर करे | जब योग का अभ्यास करते करते चित निर्मल और एकाग्र हो जाये ,तब नासिका के अग्र भाग में दृष्टि जमा कर इस प्रकार अपने इष्ट देव की मूर्ति का ध्यान करें |
इष्टदेव का मुखमंडल आनंद से प्रफुल्ल है,नेत्र कमल कोश के समान हैं,शरीर नीलकमल के समान श्याम है ,हाथों में शंख ,चक्र और गदा धारण किये हैं | शरीर पर पीला वस्त्र लहरा रहा है ,वक्ष स्थल में श्री वत्स चिन्ह है ,और गले में कोस्तुभ मणि झिलमिला रही है |वनमाला चरणों तक लटकी हुई है ,जिस के चारों और भौरें सुगंध से मतवाले हो कर मधुर गुंजार कर रहे हैं ,अंग अंग में बहुमूल्य हार,कंकण,किरीट,भुजबन्ध और नूपुर आदि आभूषण विराजमान हैं | कमर में करघनी की लड़ियाँ उन की शोभा बढ़ा रही हैं ,भक्तों के ह्रदय कमल ही उन के आसन हैं ,उन का दर्शनीय श्याम सुंदर स्वरूप अत्यंत शांत एवं मन और नयनों को आनन्दित करनेवाला है |उन की अति सुन्दर किशोर अवस्था है ,वे भक्तों पर कृपा करने के लिए आतुर हो रहे हैं ,बड़ी मनोहर झांकी है | भगवान सब लोकों में बंदनीय हैं | इस प्रकार श्रीनारायण देव का सम्पूर्ण अंगों सहित तबतक ध्यान करें ,जबतक चित वहां से हटे नहीं | भगवान की लीलाएं बड़ी ही दर्शनीय हैं ,अत अपनी रूचि अनुसार खड़े हुए,चलते हुए, बैठे हुए,अन्तर्यामी रूप में स्थित हुए उन के स्वरूप का विशुद्ध भावयुक्त चिन्तन करें |इस प्रकार योगी जब यह अच्छी तरह देख ले कि भगवादिग्रह में चित स्थिर हो गया है ,तब वह उन के समस्त अंगों में लगे हुए चित को विशेष रूप से एक एक अंग में लगावे |
भगवान के चरणकमलों का ध्यान करना चाहिए |वे वज्र,अंकुश,ध्वजा,और कमल के मंगलमय चिन्हों से युक्त हैं |इन्हीं के धोवन से नदियों में श्रेष्ठ श्री गंगा जी प्रकट हुई थी ,जिन के पवित्र जल को मस्तक पर धारण करने के कारण स्वयं श्री महादेव जी और भी मंगलमय हो गए | भगवान के इन चरणों का चिरकाल तक चिन्तन करें|भवभयहारी अजन्मा श्रीहरिकी दोनों पिंडलियों एवं घुटनों का ध्यान करें ,जांघों का ध्यान करें जो अलसी के फूल के समान नीलवर्ण और बल की निधि हैं तथा गरुड की पीठ पर शोभायमान हैं |सम्पूर्ण लोकों के आश्रय स्थान भगवान के उदर में स्थित नाभि सरोवर का ध्यान करें ,इसी से ब्रह्मा जी का आधार भूत सर्वलोकमयकमल प्रकट हुआ है | इस के पश्चात पुरुषोतम भगवान के वक्ष स्थल का ध्यान करें ,जो महालक्ष्मी जी का निवस स्थान और लोगों के मन एवं नेत्रों को आनंद देने वाला है | फिर सम्पूर्ण लोकों के बंदनीय भगवान के गले का चिन्तन करें ,जो मानो कौस्तुभ मणि को भी सुशोभित करने के लिये ही उसे धारण करता है |
समस्त लोकपालों की आश्रयभूता भगवान की चारों भुजाओं का ध्यान करें,जिन में धारण किये हुए कंकण आदि आभूषण समुद्र मंथन के समय मन्दराचल की रगडसे और भी उजले हो गये हैं |इसी प्रकार जिस के तेजको सहन नहीं किया जा सके ,उस सहस्त्र धारों बाले सुदर्शन चक्र का तथा उन के कर कमलों में राज हंस के समान विराजमान शंख का चिन्तन करें | भक्तों पर कृपा करने के लिए ही यहाँ साकार रूप धारण करने वाले श्रीहरिके मुख कमल का ध्यान करें जो झिलमिलाते हुए मकराकृत कुण्डलों के हिलने से अतिशय प्रकाशमान स्वच्छ कपोलों के कारण बड़ा ही मनोहर जान पड़ता है |इस के अतिरिक्त भगवान के नेत्रों का चिन्तन ,उन की प्रेमभरी मुसकान , उन के खिलखिला कर हंसने का ध्यान तथा इस प्रकार ध्यान में तन्मय हो कर उन के सिबा किसी अन्य पदार्थ को देखने की इच्छा न करें |
इस प्रकार ध्यान के अभ्यास से साधक का श्रीहरि में प्रेम हो जाता है ,उस का हृदय भक्ति में लीन हो जाता है ,शरीर में आनन्दातिरेक के कारण रोमांच होने लगता है ,उत्कंठा जनित प्रेमाश्रुओं की धारामें वह बारम्बार अपने शरीर को नहलाता है और फिर मछली पकड़ने के कांटे के समान श्रीहरिको अपनी और आकर्षित करने के साधन रूप अपने चित को भी धीरे धीरे ध्येय वस्तु से हटा लेता है | जैसे तेल के समाप्त होने पर दीपशिखा अपने कारण रूप तेजस तत्व में लीन हो जाती है ,वैसे ही आश्रय ,बिषय और राग से रहित होकर मन शांत -ब्रह्माकार हो जाता है | इस अवस्था के प्राप्त होने पर जीव गुणप्रवाहरूप देहादि उपाधि के निवृत हो जाने के कारण ध्याता,ध्येय आदि बिभाग से रहित एक अखंड परमात्मा को ही सर्वत्र देखता है |
योगाभ्यास से प्राप्त हुई चित की इस अविद्या रहित लयरूप निवृति से अपनी सुखदुख रहित ब्रम्ह रूप महिमा में स्थित हो कर परमात्मतत्व का साक्षात्कार कर लेने पर वह योगी जिस दुःख सुख के भोक्तत्त्व पहले अज्ञान वश अपने स्वरूप में देखता था ,उसे अब अविद्या कृत अहंकार में ही देखता है | जिस प्रकार मदिरा के मद से मतवाले को अपनी कमर में लपेटे वस्त्र के रहने या गिरने की कुछ भी सुध नहीं रहती उसी प्रकार चरमावस्था को प्राप्त हुए सिद्ध पुरुष को भी अपनी देह के उठने बैठने कहीं जाने या आने का कोई ज्ञान नहीं रहता क्यों की वह अपने परमानन्दमय स्वरूप में स्थित है |उस का शरीर तो पूर्वजन्म के संस्कारों के अधीन है ,अत् जब तक उस का प्रारब्ध शेष है तब तक वह इन्द्रिओं सहित जीवित है ,किन्तु जिसे समाधि पर्यन्त योग की स्थिति प्राप्त हो गई है और जिस ने परमात्मतत्व को भी जान लिया है ,वह सिद्ध पुरुष इस शरीर को स्वप्न में प्रतीत होने वाले शरीरों के समान फिर स्वीकार नहीं करता |
जिस प्रकार स्नेह के कारण पुत्र और धन आदि में भी जीवों की आत्म बुद्धि रहती है ,किन्तु अगर विचार करने से ही वे अलग दिखाई देते हैं ,उसी प्रकार जिसे हम अपनी आत्मा मान रहे हैं वह तो केवल शरीर आदि से अलग साक्षी पुरुष अलग है | जिस प्रकार जलती हुई लकड़ी से ,चिनगारीसे,स्वयं अग्नि से ही प्रकट हुए धुए से तथा जलती हुई लकड़ी से भी अग्नि वास्तव में अलग है -उसी प्रकार भूत,इन्द्रिय और अंतकरणसे उन की साक्षी आत्मा अलग है ,तथा जीव कहलाने वाले उस आत्मा से भी ब्रह्म अलग है और प्रकृति से उस के संचालक पुरुषोतम अलग हैं |जिस प्रकार सभी प्राणी पंचभूत मात्र हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण जीवों में आत्मा को और आत्मा में सम्पूर्ण जीवों को अलग अलग देखें | जिस प्रकार एक ही अग्नि अपने अलग अलग आश्रयोंमें उन की विभिन्नता के कारण भिन्न भिन्न आकार का दिखाई देता है उसी प्रकार देव-मनुष्य आदि शरीरों में रहने वाला एक ही आत्मा अपने आश्रयों के गुण भेद के कारण भिन्न भिन्न प्रकार का दिखाई देता है | अत भगवान का भक्त जीव के स्वरूप को छिपा देने वाली कार्यकारणरूप से परिणाम को प्राप्त हुई भगवान की इस माया को भगवान् की कृपा से ही जीत कर अपने वास्तविक स्वरूप -ब्रह्मरूप में स्थित होता है | इति –
