आत्मदर्शन ही सच्चा धर्म है
सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने सभी देवताओं के बीच सब से पहले ब्रह्मदेव अर्थात ब्रह्मा की सृष्टि की और उस के बाद वह चराचर सृष्टि में प्रवृत हुआ | इस प्रकार सृष्टि के मूल में परमात्मा या चैतन्य तत्व है ,उसी को एक सत कहा गया है | वह सत या परब्रह्म तत्व निराकार और अव्यय है |ज्ञानेद्रियों या कर्मेंन्द्रियों द्वारा उसे कोई नहीं जान सकता |वह सर्वोपाधिरहित ,वर्णभेद रहित ,सूक्ष्म ,अक्षय अनादिसिद्ध होकर भी सभी प्राणियों के बीच अंतरात्मा के रूप में व्याप्त है |वह स्वयंप्रकाशरूप हो कर मनुष्य के ह्रदय में अंगुष्ठ मात्र प्रमाण ज्योति स्वरूप से स्थित हो कर भूत,भविष्य और वर्तमान पर शासन करने वाला स्वतंत्र शासक है -ऐसा कठोपनिषद में कहा गया है | वह परमात्मा सर्वकर्ता होते हुए भी अकर्ता है | उसे सर्वथा प्रकट रूप में जानना सामन्य बुद्धि की सामर्थ से परे है |परमेश्वर की कृपा से जिन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हो ,वे महात्मा ही ज्ञान दृष्टि से उसे जान सकते हैं |विशुद्ध अंत:करण मनुष्य सभी भोगों से विरक्त हो कर निर्मल ह्रदय से निरन्तर परमेश्वर का ध्यान कर सकता है और उसी के स्वरूप में लीन हो सकता है |
यह परब्रह्म तत्व सृष्टि के समस्त चेतन,अचेतन वस्तु मात्र में चैतन्य रूप से प्रकाशरूप से व्याप्त है |सृष्टी की सभी वस्तुएं चित और जड के मिश्रण से उत्पन्न हैं ,फिर भी कुछ में आत्म तत्व अधिक तो कुछ में चेतनाश अधिक दिखाई देता है |मानव प्राणी में जितना आत्म तत्व दीखता है ,पशु पक्षी में उस से कम ,उस सभी से कम वनस्पति कोटि में और मिट्टी,पत्थर आदि में कम आत्म तत्व दिखाई देता है | मानव में भी यह चिदंश यानि आत्मतत्व न्यूनाधिक मात्रामें दिखता ही है | किन्तु यह भेद आत्मा का न हो कर सात्विक ,राजस ,तामस प्रकृति के भेद से है | सब जगह व्यापक आत्म तत्व स्वच्छ दर्पण में सूर्य प्रतिबिम्ब की तरह सात्विक -प्रकृति के अंत-करण में स्पष्ट प्रतिफलित होता है |जंग लगे लोहे में सूर्य का प्रतिबिम्ब प्रतिफलित नहीं होता ,यह जैसे सूर्य का दोष नहीं,इसी प्रकार राजस -तामस क्षेत्र में आत्म,ज्योति का प्रकाश कम दीखता है |
गुरु द्वारा दिया ज्ञान केवल ज्ञानवान शिष्य ही ग्रहण करता है ,मूर्ख उस ज्ञान से वंचित रह जाता है |इस तरह आत्म-तत्व के प्रतिबिम्ब को यथावत रूप में ग्रहण करना मानव की प्रकृति पर ही निर्भर करता है | इस से स्पष्ट हो तो जाता है कि आत्म तत्व या परमेश्वर सर्व व्यापक है | यह ज्ञान होना ही वास्तविक आत्मज्ञान है |सर्वभूतों में समान भावना ही मोक्ष का साधन है |पर वह सम बुद्धि हो कैसे ? शास्त्रों में बताया गया है कि सृष्टि की उत्पति परमेश्वर की मर्जी पर ही निर्भर है ,इसलिए परमेश्वर सब प्राणियों में निरपवाद रूप में व्याप्त है और आत्मा परमात्मा का ही अंश है | समं सर्वेषु भूतेशु तिष्ठंत परमेशरम |
सभी भूतों में आत्मा समान ही है |भूत प्राणी मात्र का सामन्य मृत्यु से या प्रलय से विनाश देखा जा सकता है ,परन्तु आत्म तत्व का कभी विनाश नहीं होता | जिसे यह ज्ञान हो जाए ,कहना होगा कि उसे ही वास्तविक ज्ञान हुआ है |ऐसे सम बुद्धि मानव को सब भूतों में सदैव ईश्वर ही दिखाई पड़ता है अत: वह मोक्ष धाम में पहुंच जाता है |सर्वत्र सम आत्मा का दर्शन होने से वह सब को अपनी तरह ही समझता है | फलत: उस से किसी वाचिक या मानसिक हिंसा नहीं हो सकती ,दूसरों का दु:ख अपना दु:ख और दूसरों की हिंसा ही अपनी हिंसा है | इतनी एकता रग रग में व्याप्त हो जाने पर मानव जैसे अपने दु:ख और हिंसा को टालता है ,वह समदर्शी आत्म ज्ञानी भी वैसे ही पर-दु:ख पर हिंसा से हमेशा बचता है |ऐसे समदर्शी के लिए मोक्ष दूर की वस्तु हो ही नहीं सकता ?
मेरा ,पड़ोसी का या किसी अन्य प्राणी का शरीर भिन्न हो सकता है लेकिन उन में निवास करने बाला आत्मा तो एक ही है | जैसे एक ही सूर्य का भिन्न भिन्न बिम्बग्राही पदार्थों में प्रतिबिम्ब पड़ने पर भी वस्तुतःसूर्य एक ही होता है |एक ही स्वर्ण के भिन्न भिन्न अलंकार बनाने पर भी वस्तुतः स्वर्ण एक ही होता है ,ठीक इसी प्रकार कार्य कारण ब्रह्म -ब्रह्मांड का सम्बन्ध समझना चाहिए | इसी तरह प्रत्येक देह का आत्मा एक ही परमात्मा का अंश है |भिन्न भिन्न शरीरों में भिन्न भिन्न दिखाई देने वाला यह आत्मा मूलत: एक ही है | एक ही विश्व रूप परमात्मा के सब अवयव हैं | इस रहस्य को ठीक ठीक समझ कर सब के प्रति आत्म भाव रखने वाला ही ज्ञानवान है |
यह आत्मा परमात्मा का अंश होने के कारण देह के साथ मरता नहीं ,यह अनादि है ,अमर है |परमात्मा के गुणों का वर्णन जैसे असम्भव है वैसे ही आत्मा का गुण वर्णन कठिन है | अतएव वह निर्गुण है ,नित्य और शाश्वत है | उस में उत्पति या प्रलय का भाव नहीं ,वह अजर अमर है | इस प्रकार के गुणों वाले आत्मा को परमानन्द स्वरूप कहा जाता है |
संसार में ईश्वर की पूजा का कोई साधन है तो वह है आत्म पूजा | भगवान् की पूजा करनी है तो सृष्टि के प्राणी मात्र में समदृष्टि रखिये | अपने मन का मेल ,कपट समूल नष्ट कर और हमेशा यह बुद्धि रख कर कि हम सभी एक ही परमात्मा की संताने है ,प्रत्येक प्राणी की सेवा करनी चाहिए | यही सनातन धर्म है | किसी भी प्राणी को तन,बचन ,मन से कष्ट पहुंचाना धर्म नहीं है | सब में एक ही आत्मा है शरीर जाति धर्म अलग हो सकते हैं लेकिन आत्मा परमात्मा का अंश तो एक ही है ,तो फिर हम अलग कैसे हुए ?
