सप्तमोSध्याय (प्रथम:स्कन्ध:)

अश्वथामा द्वारा द्रौपदी के पुत्रों का मारा जाना और अर्जुन द्वारा अश्वथामा का मानमर्दन – जिस समय महाभारत युद्ध में कौरव और पांडव दोनों पक्षों के बहुत से वीर वीरगति को प्राप्त हो चुके थे और भीमसेन की गदा के प्रहार से दुर्योधन की टांग टूट चुकी थी ,तब अश्वथामा ने आपने स्वामी दुर्योधन का प्रिय कार्य समझ कर दौपदी के सोते हुए पुत्रों के सिर काट कर उसे भेंट किये,यह घटना दुर्योधन को भी अप्रिय लगी ,क्यों कि इस प्रकार की घटना की सभी निंदा करते हैं | उन बालकों की माता दौपदी अपने पुत्रों का निधन सुन कर अत्यंत दुखी हो गयी | अर्जुन ने उसे सांत्वना देते हुए कहा मैं तुम्हारे आंसू तब पोंछूंगा ,जब उस आततायी का सिर अपने बाणों से काट कर तुम्हें भेंट करूंगा और पूत्रों की अंत्येष्टि क्रिया के बाद तुम उस पर पैर रख कर स्नान करोगी | अर्जुन की बातों से दौपदी को सांत्वना मिली और अर्जुन अपने सारथि श्रीकृष्ण की सलाह से कबच धारण कर और अपने गाण्डीवधनुष को लेकर रथ पर सवार हुए तथा गुरु पुत्र अश्वथामा के पीछे दौड़ पड़े |

बच्चों की हत्या से अश्वथामा का भी मन दुखी था ,जब उस ने दूर से देखा कि अर्जुन मेरी और आ रहा है तब वह अपने प्राणों की रक्षा के लिए इधर उधर भागने लगा | जब उस ने देखा कि उस के घोड़े थक गये हैं और मैं अकेला हूँ तो उस ने अपने बचाव का एक मात्र साधन ब्रह्मास्त्र ही समझा वह उसे चलाना तो जानता था लेकिन लौटाना नहीं आता था | लेकिन फिर भी उस ने उस का प्रयोग कर दिया | उस शस्त्र से सब दिशाओं में एक प्रचंड तेज फ़ैल गया | अर्जुन ने जब देखा कि अब मेरे ही प्राणों पर ही आ बनी है ,तब उन्होंने श्रीकृष्ण से प्रार्थना की |

तुम सचिदानन्द स्वरूप परमात्मा हो ,तुम्हारी शक्ति अनन्त है |तुम भक्तों को अभय देने वाले हो | जो संसार की धधकती हुई आग में जल रहे हैं ,उन जीवों को उस से उबारने वाले एकमात्र तुम्हीं हो | तुम प्रकृति से परे रहने वाले आदि पुरुष साक्षात परमेश्वर हो |अपनी स्वरूप शक्ति त्रिगुणमयी माया को दूर भगा कर अपने अद्वितीय स्वरूप में स्थित हो |वही तुम अपने प्रभाव से माया मोहित जीवों के लिए धर्मआदि रूप कल्याण का विधान करते हो | तुम्हारा यह अवतार पृथ्वी का भार हरण करने के लिए और तुम्हारे अनन्य प्रेमी भक्तजनों के निरन्नतर स्मरण ध्यान करने के लिए है | स्वयं प्रकाश स्वरूप श्री कृष्ण ,यह भयंकर तेज सब और से मेरी और आ रहा है |यह क्या है ,कहाँ से ,क्यों आ रहा है – इस का मुझे बिलकुल भी पता नहीं है |

श्रीकृष्ण ने कहा -अर्जुन यह अश्वथामा द्वारा छोड़ा गया ब्रह्मास्त्र है ,वह इसे चलाना तो जानता है पर इसे लौटाना नहीं जानता | किसी भी दुसरे अस्त्र में इसे दवाने की शक्ति नहीं है | तुम ब्रह्मास्त्र की बिद्या को भलीभांति जानते हो इसे ब्रह्मास्त्र के तेज से ही इस ब्रह्मास्त्र की प्रचंड आग को बुझा दो | भगवान् की बात सुन कर अर्जुन ने आचमन किया तथा भगवान की परिक्रमा करके ब्रह्मास्त्र के निवारण हेतु ब्रह्मास्त्र का अनुसधान किया | उन दोनों अस्त्रों के टकराने से तेज चारों दिशाओं में फ़ैल गया | तीनों लोकों को जलाने वाली अग्नि से प्रजा जलने लगी यह देख भगवान कृष्ण से अनुमति ले कर अर्जुन ने उन दोनों को ही लौटा लिया | अर्जुन की आँखें क्रोध से लाल लाल हो रही थी उन्होंने अश्वथामा को पकड़ लिया | अश्वथामा को पकड़ कर जब उसे शिविर की तरफ ले जा रहे थे तब श्रीकृष्ण ने कुपित हो कर कहा -अर्जुन इस को छोड़ना मत इस नराधम को मार ही डालो ,इस ने रात में सोये हुए निरपराध बालकों की हत्या की है | धर्मवेता पुरुष असावधान ,मतवाले,पागल,सोये हुए,बालक,स्त्री,शरणागत ,रथहीन और भयभीत शत्रु को कभी नहीं मारते | परन्तु जो दुष्ट क्रूर पुरुष दूसरों को मार कर अपने प्राणों का पोषण करता है ,उस का तो वध ही कर देना कल्याणकारी है | क्यों की ऐसी आदत को ले कर जो जीता है तो और भी पाप करता है और उन पापों के कारण वह नरकगामी होता है | फिर मेरे सामने ही तुम ने द्रौपदी से प्रतिज्ञा की थी कि जिस ने तुम्हारे पुत्रों का वध किया है ,उस का सिर उतार कर लाऊंगा | इस लिये इसे मार ही डालो | भगवान ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए ही इस प्रकार प्रेरणा की, परन्तु अर्जुन का हृदय महान था | अश्वथामा ने उन के पुत्रों की हत्या की थी ,फिर भी अर्जुन के मन में गुरुपुत्र को मारने की इच्छा नहीं हुई |

इस के बाद अपने मित्र और सारथि श्रीकृष्ण के साथ वे अपने शिविर में पहुंचे ,वहां उन्होंने अश्वथामा को द्रौपदी को सौंप दिया | द्रौपदी ने देखा कि अश्वथामा को बुरी तरह बाँध कर लाया गया है ,निन्दित कार्य करने के कारण उस का सिर नीचे झुका हुआ था | अपना अनिष्ट करने वाले गुरुपुत्र अश्वथामा को इस प्रकार अपमानित देख कर द्रोंपदी का कोमल हृदय दया से भर गया और उस ने अश्वथामा को नमस्कार किया | गुरुपुत्र को इस प्रकार लाना उसे सहन नहीं हुआ | उस ने कहा – छोड़ दो,छोड़ दो ,यह ब्राह्मण है , हम लोगों के लिए पूज्यनीय है | जिन की कृपा से आप ने रहस्य के साथ सारे धनुर्वेद और प्रयोग तथा उपसंहार के साथ सम्पूर्ण शास्त्रों और अस्त्रों का ज्ञान प्राप्त किया है ,वे आप के आचार्य ही के रूप में आप के सामने खड़े हैं | उन की पत्नी अपने वीर पुत्र की ममता से ही अपने पति का अनुगमन नहीं कर सकी ,वे अभी जीवित हैं | आर्य पुत्र ,आप तो धर्म को जानने वाले हो | जिस गुरुवंश की नित्य पूजा और वन्दना करनी चाहिए ,उसी को व्यथा पहुंचाना आप के योग्य कार्य नहीं है | जैसे मैं अपने बच्चों के मारे जाने से दुखी हो रही हूँ और मेरी आँखों से आंसू निकल रहे हैं ,वैसे ही इन की माता गौतमी न रोये | जो राजा अपने कुकृत्यों से ब्राह्मण कुल को कुपित कर देते हैं ,वह कुपित ब्राह्मण कुल उन राजाओं को सपरिवार शोकाग्नि में डाल कर शीघ्र ही भस्म कर देता है |

द्रोपदी की बात धर्म और न्याय के अनुकूल थी ,उस में कपट नहीं था ,करुणा और ममता थी ,राजा उधिष्ठर ने उस का समर्थन किया साथ ही नकुल,सहदेव ,सात्यकी ,अर्जुन,स्वयं भगवान श्रीकृष्ण और वहां उपस्थित सभी नर नारियों ने भी द्रोपदी का समर्थन किया | उस समय क्रोधित हो कर भीमसेन ने कहा – ” जिस ने सोते हुए बच्चों को न अपने लिए और न अपने स्वामी के लिए ,बल्कि व्यर्थ ही मार डाला ,उस का तो वध ही उतम है”| भगवान श्रीकृष्ण ने द्रोपदी और भीमसेन की बात सुन कर अर्जुन की और देख कर हंसते हुए कहा |

“पतित ब्राह्मण का भी वध नहीं करना चाहिए और आततायी को मार डालना ही चाहिए “-शास्त्रों में मैंने यह दोनों ही बातें कहीं हैं | इसलिए मेरी दोनों आज्ञायों का पालन करो | तुन ने द्रोपदी को सांत्वना देते समय जो प्रतिज्ञा की थी ,उसे भी सत्य करो ,साथ ही भीमसेन ,द्रोपदी और मुझे जो प्रिय हो,वह भी करो | अर्जुन भगवान के हृदय की बात ताड़ गए और उन्होंने अपनी तलवार से अश्वथामा के सिर की मणि उस के बालों के साथ उतार ली | बालकों की हत्या करने से वह श्रीहीन तो पहले ही हो गया था ,अब मणि और ब्रह्म तेज से रहित हो गया | इस के बाद उन्होंने उस के बंधन खोल दिए और उसे छोड़ दिया | मूंड देना,धन छीन लेना और स्थान से बाहर निकाल देना -यही ब्राह्मण धर्म का वध है | उन के लिए इस से भिन्न शारीरिक वध का बिधान नहीं है | पुत्रों के वध से सभी द्रोपदी और पांडव शोकातुर हो रहे थे |अब उन्होंने अपने मरे हुए भाई बन्धुओं की दाह आदि अंत्येष्टि क्रिया की |

इति -प्रथम:स्कन्ध सप्तमोSध्याय (श्री मद्भागवत )

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