अलोभ धर्म का आदर्श – श्राबस्ती नरेश और ब्राह्मण कुमार
कौशाम्बी के राजपुरोहित का पुत्र था अभिरूप कपिल | आचार्य इन्द्रदत्त के पास अध्ययन करने श्राबस्ती आया हुआ था | आचार्य ने उस के भोजन करने की व्यबस्था नगरसेठ के यहाँ कर दी थी |लेकिन वहां वह भोजन परोसने वाली सेविका के रूप पर मुग्ध हो गया |दोनों में परिचय हुआ | वसंतोत्सव आने पर सेविका ने उस से उत्तम वस्त्र तथा आभूष्ण मांगे |
अभिरूप कपिल के पास तो वहां कुछ था नहीं |सेविका ने बताया -वहां के नरेश का नियम है कि प्रात:काल उन्हें जो अभिवादन करता है ,उसे दो माशे स्वर्ण प्रदान करते हैं |
महाराज को सर्वप्रथम प्रात:कालीन अभिवादन तो राजसदन में रहने वाले सेवक ही कर सकते हैं | अभिरूप कपिल ने एक युक्ति सोची | वह राजसदन में रात्री में प्रविष्ट हो गया ,किन्तु नरेश के शयन कक्ष में प्रविष्ट होने की चेष्टा करते समय प्रहरियों ने पकड़ लिया उसे चोर समझा गया वह प्रात:काल राजसभा में महाराज के सम्मुख उपस्थित किया गया |
महाराज के पूछने पर सब बातें उस ने सच सच कह दीं | उस ब्राह्मण कुमार के सत्य तथा भोलेपन पर संतुष्ट होकर राजा ने कहा -“तुम जो चाहो सो मांगो ,तुम्हें मिलेगा |”
” मैं सोच कर कल मांगूंगा “|अभिरूप कपिल ने कह दिया |उसे एक दिन का समय मिल गया ,घर लौट कर वह सोचने लगा -दो माशे स्वर्ण तो बहुत कम है -सौ मुद्राएँ ? लेकिन वे कितने दिन चलेंगी ? सहस्त्र मुद्राएँ ? नहीं लक्ष मुद्राएँ ? वह सोचता रहा ,किन्तु तृष्णा कहीं संतुष्ट होना जानती है ? उसे आधा राज्य भी अपर्याप्त जान पड़ा | दूसरे दिन महाराज के सम्मुख उपस्थित होने पर उस ने कहा -:आप अपना पूरा राज्य मुझे दे दें |”
श्राबस्ती नरेश नि:सन्तान थे | किसी योग्य व्यक्ति को राज्य दे कर वे वन में तप करने जाने का विचार पिछले कई महीनों से कर रहे थे |यह विप्र कुमार उन्हें योग्य प्रतीत हुआ |अत: उस की मांग सुन कर वे प्रसन्न हो कर बोले – द्विज पुत्र ,तुम ने मेरा उद्धार कर दिया |तृष्णा रुपी सर्पिणीके पाश से सहज छूट गया | कामनाओं का अथाह कूप भरते भरते मेरा तो जीवन ही समाप्त हो चला था | विषयों की तृष्णा रुपी दल दल से प्राणी निकल सके ,यही उस का सौभाग्य है | तुम ने मुझे ऐसा अवसर दिया ,इस का मैं आभार मानता हूँ | यह सिंहासन तुम स्वीकार करो |
अभिरूप कपिल चौंक गया | उस ने उसी समय निश्चय कर के कहा – महाराज,कृपा तो आप ने मुझ पर की |तृष्णा-सर्पिणी ने तो मुझे बाँध ही लिया था | विषय-तृष्णा के दल दल में अब मैं नहीं पडूंगा |मुझे न राज्य चाहिए ,न दो माशा स्वर्ण और न स्त्री |”
वह वहां से चला तो बहुत प्रसन्न,बहुत निर्द्वन्ध था |
