सनातन धर्म का स्वरूप

सनातन का अर्थ है नित्य |वैदिक धर्म का नाम सनातन धर्म अत्यंत उपयुक्त है |अन्य किसी भी भाषा में धर्म वाचक कोई भी शब्द नहीं मिलता |सनातन धर्म इतना विशाल है कि इस में हमारे इस जन्म के ही नहीं ,अपितु पूर्व जन्म और भविष्य जन्म के सभी विषयों और परिणामों का पूर्णतया समावेश हो जाता है | शास्त्रों में धर्म की परिभाषा “धारणात:धर्म” की गई है | अर्थात धर्म वह है ,जो हमें सब तरह के विनाश और अधोगति से बचा कर उन्नति की और ले जाता है | अत: रिलिजन की तरह धर्म शब्द सीमित और संकुचित अर्थ वाला नहीं है | उदाहरणार्थ- वेद केवल पारलोकिक सुख प्राप्ति का मार्ग बता कर ही नहीं रह जाते ,अपितु इस लोक में सम्पूर्ण उन्नति और समृधि के पथ का भी प्रदर्शन करते हैं |जिस प्रकार ईसाई,मुहम्मदी ,जरथुस्त तथा बौद्ध धर्म अपने साथ ही ईसा,मुहम्मद,जरथुस्त तथा बुद्ध के भी बोधक हैं , ,उसी प्रकार सनातन धर्म भी यह बताता है कि यह धर्म उस सनातन अर्थात नित्य तत्व परमात्मा द्वारा ही चलाया गया है ,किसी व्यक्ति के द्वारा नहीं | |

सनातन धर्म को छोड़ कर और सभी धर्मों को दो भागों में बांटा जा सकता है -१.वे धर्म जो पूर्व काल में थे ,पर अब विद्यमान नहीं ,2- वे धर्म जो पूर्व काल में नहीं थे ,पर अब हैं |पर सनातन का अंतर्भाव इन दोनों में से किसी में भी नहीं किया जा सकता ,क्यों कि यह धर्म अन्य धर्मों के जन्म से भी पूर्व विद्यमान था और अब भी मौजूद है |

सनातन धर्म अनादि और अनंत है ,क्यों कि यह सृष्टि की उत्पति के समय से लेकर सृष्टि प्रलय तक यह मौजूद रहता है | यह सनातन इसलिए नहीं है कियह सनातन ईश्वर द्वारा स्थापित है ,अपितु स्वयं भी सनातन या नित्य है |यह प्रलय तक आस्तित्व में रहेगा ,प्रलय के बाद भी यह नष्ट नहीं होने वाला है ,अपितु अदृश्य रूप से तब भी यह मौजूद रहता है | पुन: सृष्टि के साथ ही यह लोगों की रक्षा और उन्नति करने के लिए प्रकट हो जाता है |

इस का अर्थ यह नहीं कि अन्य धर्म झूठे हैं ,इस के विपरित हमारा यह कथन हैं कि सभी धर्म किसी न किसी रूप में उस अन्तिम लक्ष्य तक मनुष्य को पहुंचाते ही हैं पर वे किसी व्यक्ति विशेष द्वारा स्थापित होने के कारण समय के साथ नष्ट भी हो जाता हैं | सनातन धर्म ही एक ऐसा है जो सृष्टि काल में सारी रचना को उन्नति की और प्रेरित करता है ,प्रलय में सूक्ष्म रूप में रहता है और अगले कल्प में पुन: प्रकट हो जाता है |

यह सनातन केवल इस लिए नहीं है कि यह सनातन ईश्वर द्वारा रचित है ,यह सनातन इस लिए भी है कि यह स्वयं अविनश्वर है,अपितु यह सनातन इसलिए है कि इस धर्म में विश्वास रखने वाला तथा इस धर्म में चलने वाला भी सनातन हो जाता है | यह धर्म अपने अनुयायों को भी अमर बना देता है |ग्रीस ,रोम सीरिया, पर्शिया,बेबीलोन,मिश्र ,फिनिशिया तथा दूसरे भी साम्राज्य जिन्हों ने सारी दुनिया को हिला दिया था ,आज पृथ्वी की सतह से समाप्त हो चुके हैं , उन के पास धन बल ,जनबल,सैन्यबल सब था ,पर सनातन नहीं था यही उन के विनाश का कारण बना |

वैदिक धर्म का स्वरूप शास्त्रों में निम्नलिखित रूप से कहा गया है -सर्वथा भय का अभाव ,अंत:करण की स्वच्छता ,तत्व ज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ स्थिति ,सात्विक दान, इन्द्रियों का दमन ,भगवत पूजा ,और अग्निहोत्र उतम कर्मों का आचरण ,वेद शास्त्रों का पठन पाठन -पूर्वक भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन,स्वधर्म पालन के लिए कष्ट सहन ,शरीर और इन्द्रियों के सहित अन्त:करण की सरलता,मन,बाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना ,यथार्थ और प्रिय भाषण ,अपना अपकार,करने वाले पर भी क्रोध न करना ,कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग ,चित की चंचलता का अभाव ,किसी की भी निंदा आदि न करना ,सब भूत प्राणियों में हेतुरहित दया ,इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी आसक्ति का न होना ,कोमलता ,लोक और शास्त्र के विरुद्ध आचरण में लज्जा ,व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव,तेज,क्षमा,धैर्य ,शौच,अर्थात बाहर और भीतर की शुद्धि ,किसी में भी शत्रु भाव का न होना ,अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव -हे अर्जुन ,दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए पुरुष के लक्षण ये हैं |

धैर्य ,क्षमा,मन का निग्रह ,चोरी न करना , बाहर भीतर की शुद्धि ,इन्द्रियों का संयम ,सात्विक बुद्धि,अध्यात्म-बिद्या ,यथार्थ भाषण और क्रोध न करना ,ये धर्म के दस लक्षण हैं | अहिंसा,सत्य भाषण ,चोरी न करना ,ब्रह्मचर्य का पालन और भोग सामग्रियों का संग्रह न करना -यह पांच प्रकार के यम हैं |

बाहर भीतर की पवित्रता ,संतोष ,तप,स्वाध्याय और सर्वस्व ईश्वर के अर्पण करना ,ये पांच प्रकार के नियम हैं | सब का निष्काम भाव से पालन करना ही सच्चा धर्माचरण है |यह ही सार्वभौम धर्म के सर्वोतम लक्षण हैं,इन्हीं से परमपद की प्राप्ति होती है |अतएव जो सच्चे हृदय से मनुष्यमात्र की सेवा करना चाहते हैं ,उन्हें उचित है कि वे उपर्युक्त लक्षणों से युक्त धर्म को ही उन्नति का परम साधन समझ कर स्वयं उस का आचरण करें और अपने दृष्टांत तथा युक्तियों के साथ इस धर्म का महत्व बतला कर मनुष्य मात्र के हृदय में इस के आचरण की तीव्र अभिलाषा उत्पन्न कर दे वास्तव में यही सच्चा धर्म प्रचार है |

यही सच्चा सनातन है ,उपरोक्त के विरुद्ध जो भी है वह सनातन नहीं है ,वह केवल सनातन का दिखावा है | सभी धर्मिक सम्प्रदायों का मूल सनातन ही है |

इति

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