पंचद्शोSध्याय -प्रथम:स्कन्ध:(श्रीमद्भागवत)

श्रीकृष्ण विरह व्यथित पांडवों का परीक्षित को राज्य दे कर स्वर्ग सिधारना -भगवान के प्यारे सखा अर्जुन एक तो पहले ही श्रीकृष्ण के विरह से व्यथित हो रहे थे दूसरा युधिष्ठर ने उन की विषादग्रस्त मुद्रा देख कर शंका करते हुए प्रश्नों की झड़ी लगा दी | अर्जुन तो पहले ही श्रीकृष्ण के ध्यान में डूबे हुए थे ,बड़े भाई के प्रश्नों का उतर न दे पाये,बड़े कष्ट से अपने विचारों का वेग रोक कर युधिष्ठर से कहा |

मुझे भगवान श्रीकृष्ण ने ठग लिया है ,मेरे जिस पराक्रम से देवता भी आश्चर्य में डूब जाते थे उसे श्रीकृष्ण ने छिन लिया है |उन्हीं के प्रभाव से मैंने द्रोंपदी को प्राप्त किया था |उन की सानिध्य से मैने समस्त देवताओं के साथ इंद्र को जीत कर अग्निदेव को उन की तृप्ति के लिए खाण्डव वन का दान दिया था | दस हजार हाथियों की शक्ति और बल से सम्पन्न आप के इन छोटे भाई भीमसेन ने उन्हीं की शक्ति से जरासंध का वध किया था | वनवास के समय दुर्योधन के षड्यंत्र से दस हजार शिष्यों के साथ बिठा कर भोजन करने वाले ऋषि दुर्वासा ने हमें संकट में डाल दिया था उस समय उन्होंने द्रोंपदी के पात्र में बचे हुए साग की एक पती का ही भोग लगा कर हमारी र क्षा की थी | उन के ऐसा करते ही मुनि मंडली को ऐसा लगा कि मानों उन की बात ही क्या , सारी त्रिलोकी ही तृप्त हो गयी हैं | उन के प्रताप से ही मैंने भगवान शंकर का पाशुपत नामक अस्त्र प्राप्त किया था ,साथ ही दुसरे लोकपालों ने भी प्रसन्न हो कर अपने अपने अस्त्र मुझे दिए थे | महाराज यह सब जिन की कृपा से हुआ ,उन्हीं पुरुषोतम भगवान ने मुझे आज ठग किया |

महाराज, कोरवों की सेना भीष्म द्रोण आदि अजेय अपार समुद्र के समान थी ,परन्तु उन का आश्रय ले कर अकेले ही रथ पर सवार हो कर पार किया | उन्हीं की सहायता से विराट का सारा गौ धन वापिस ले लिया था और साथ ही उन के मणिमय मुकुट तथा अंगों के अलंकार छिन लिए थे | कोरवों की सेना भीष्म,द्रोण, कर्ण,शल्य जैसे योद्धाओं से शोभायमान थी उन के चलाए हुये कभी न चूकने वाले अस्त्र चलाए थे ,परन्तु जैसे हिरण्यकशिपु आदि दैत्यों के अस्त्र शस्त्र भगवदभक्त प्रहलाद का स्पर्श नहीं करते थे ,वैसे ही उन के शस्त्रास्त्र मुझे छू तक नहीं सके | यह सब श्रीकृष्ण की छत्र छाया में रहने का प्रभाव था | श्रेष्ठ पुरुष संसार से मुक्त होने के लिए जिन के चरण कमलों का सेवन करते हैं उन भगवान को मुझ दुर्बुद्धि ने सारथि तक बना डाला | जो मेरे सखा ,प्रिय मित्र ,मेरे हृदय थे ,उन्हीं पुरुषोतम भगवान से मैं रहित हो गया हूँ | भगवान की पत्नियों को द्वारका से ला रहा था लेकिन रास्ते में गोपियों ने मुझे अबला की तरह हरा दिया मेरा वही गाण्डीव ,वही रथ, वही अस्त्र शस्त्र थे लकिन मैं कुछ नहीं कर सका | जिस के सामने बड़े बड़े राजा लोग सिर झुकाते थे श्रीकृष्ण के बिना ये सब एक ही क्षण में शून्य हो गया -ठीक उसी प्रकार जैसे भस्म में डाली हुयी आहूति ,कपट भरी सेवाऔर उसर में बोया हुआ बीज व्यर्थ जाता है |

राजन,आप ने द्वारकावासी अपने जिन सम्बन्धियों की बात पूछी ,वे ब्राह्मणों के शाप वश मोहग्रस्त हो गये और मदिरा पान से मदोन्मत हो कर अपरिचितों की भान्तिआपस में ही एक दुसरे से भीड़ गयेऔर घूसों से मार पीट कर के सब के सब नष्ट हो गये| उन में से केवल पांच ही बचे हैं | वास्तव में यह भगवान की ही लीला है कि संसार के प्राणी परस्पर एक दुसरे को पालन पोषण भी करते हैं और एक दुसरे को मार भी डालते हैं | राजन, जिस प्रकार जलचरों में बड़े जन्तु छोटों को,बलबान दुर्बलों को एवं बड़े भी परस्पर एक दुसरे को खा जाते हैं | उसी प्रकार बड़े और बलबान यदुवंशियों द्वारा भगवान ने दूसरे राजाओं का संहार करवाया ,उस के बाद यदुवंशियों द्वारा ही एक से दूसरे यदुवंशी का नाश करवाया और पूर्ण रूपसे पृथ्वी का भार उतार दिया | जो जैसा कर्म करता है उसे वैसा ही फल मिलता है ,भगवान सब का हिसाब बराबर रखते हैं |

इस प्रकार प्रगाढ़ प्रेमसे श्रीकृष्ण के चरण कमलों का चिन्तन करते करते अर्जुन की चितवृति निर्मल और प्रशांत हो गई| भक्तिके वेग से उन के हृदय को मथकर उन में से सब विकारों को बाहर निकाल दिया ,उन्हें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिया हुआ गीता ज्ञान स्मरण हो आया ,जो की कुछ समय के लिए बिस्मृत हो गया था |ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति से माया का आवरण भंग हो कर गुणातीत अवस्था प्राप्त हो गयी | द्वैत का संदेह निवृत हो गया |सूक्ष्म शरीर भंग हुआ | वे शौक एवं जन्म और मृत्यु के चक्र से सर्वथा मुक्त हो गये|

भगवान् का स्वधाम गमन और यदुवंश का संहार का वृतान्त सुन कर युधिष्ठर ने भी स्वर्गारोहण का निश्चय किया | कुंती ने भी अर्जुन के मुख से यदुवंशियों का नाश और भगवान के स्वधाम गमन की बात सुन कर इस जन्म और मृत्यु रूप संसार से मुंह मोड़ लिया |भगवान श्रीकृष्ण ने भी लोक दृष्टि में जिस यादव शरीर से पृथ्वी का भार दूर किया था ,उसे त्याग दिया | जिन की मधुर लीलाएं श्रवण करने योग्य हैं ,उन भगवान श्रीकृष्ण ने जब अपने मनुष्य के से शरीर से इस पृथ्वी का परित्याग कर दिया ,उसी दिन विचार हीन लोगों को फंसाने वाला कलियुग आ धमका |महाराज युधिष्ठर से कलियुग का आना छिपा नहीं था वह देख रहे थे कि देश में ,नगरों में ,घरों में प्राणियों में लोभ,असत्य,छल,हिंसा ,आदि अधर्मों की बढ़ोतरी हो गयी है तब उन्होंने महाप्रस्थान का निश्चय किया | उन्होंने अपने पौत्र परीक्षत का राज्य अभिषेक किया | इस के बाद युधिष्ठर ने प्रजापत्य यज्ञ करके आहवनीय आदि अग्नियों को अपने में लीन कर दिया अर्थात गृहस्थाश्रम के धर्म से मुक्त हो कर उन्होंने सन्यास ग्रहण किया |

युधिष्ठर ने अपने सब व्स्त्राभुश्नादी वहीं छोड़ दिये,एवं ममता,मोह और अहंकार रहित हो कर सब बंधन काट डाले,उन्होंने दृढ भावनाओं से वाणी से मन को ,मन को प्राण से ,प्राण को अपान से और अपान को उस की क्रिया के साथ मृत्यु में तथा मृत्यु को पंच भूतमय शरीर में लीन कर लिया इस प्रकार शरीर को मृत्यु रूप अनुभव करके उन्होंने उसे त्रिगुण में मिला दिया ,त्रिगुण को मूल प्रकृति में ,सर्व कारण रूपा प्रकृति को आत्मा में और आत्मा को अविनाशी ब्रह्म में विलीन कर लिया |उन्हें यह अनुभव होने लगा कि यह सम्पूर्ण दृश्य प्रपंच ब्रह्म स्वरूप है इस के बाद उन्होंने शरीर पर चीर वस्त्र धारण कर लिया | फिर वह बहरे की तरह बिना किसी की बात सुने ,घर से निकल पड़े | हृदय में उस ब्रह्म का ध्यान करते हुये,जिस को प्राप्त कर फिर लौटना नहीं होता उतर दिशा की और यात्रा पर चल पड़े | उन के छोटे भाई भीम,अर्जुन,नकुल और सहदेव भी उन के पीछे हो लिये | उन्होंने जीवन के सभी लाभ भलीभांति प्राप्त कर लिए थे ,इसलिए यह निश्चय कर के कि भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमल ही हमारे परम पुरुषार्थ हैं,उन्होंने हृदय में धारण कर लिया | उस समय उन्हें लेने के लियेआये हुए पितरों के साथ वे अपने लोक यमलोक को चले गये |

द्रोंपदी ने देखा कि अब पांडव लोग निरपेक्ष हो गये हैं ,तब वे अनन्य प्रेम से भगवान श्रीकृष्ण का चिन्तन करके उन्हें प्राप्त हो गयी| पांडवों के इस महाप्रयाण की इस मंगलमयी कथा को जो सुनता है या पढ़ता है ,वह निश्चय ही भगवान की भक्ति और मोक्ष प्राप्त करता है |

इति-पंचदशोSध्याय

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