Srimad Bhagwat Ashtavkra Geeta

इच्छाओं के बंधन टूटे तो आत्मा को मिला परम आनन्दइच्छाओं के बंधन टूटे तो आत्मा को मिला परम आनन्द

श्लोक – कायकृत्यासह:पूर्व ततो वाग्विस्तरासह : | अत चिन्तासहस्तस्माद एकमेवाहमास्थित: || १|| सामान्य अर्थ – जनक कहते हैं -पहले मैं शारीरिक कर्मों से ऊब गया {...}

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देवहूति को तत्वज्ञान एवं मोक्ष पद की प्राप्तिदेवहूति को तत्वज्ञान एवं मोक्ष पद की प्राप्ति

भूमिका श्रीमद्भागवत पुराण के तृतीय स्कन्ध का तेतीस्वां अध्याय भारतीय अध्यात्म परम्परा में माँ के मोक्ष का अद्वितीय अध्याय है |इस अध्याय का केंद्र -एक {...}

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अष्टावक्र गीता प्रकरण एकादश -ज्ञानाष्ट्क का सारअष्टावक्र गीता प्रकरण एकादश -ज्ञानाष्ट्क का सार

अष्टावक्र गीता कोई क्रमिक साधना पद्धति नहीं है ,यह सीधे सत्य पर चोट है |पहले दस प्रकरणों में अष्टावक्र ने बंधन क्या है,मुक्ति क्या है {...}

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धूम मार्ग और उर्चिरदि मार्ग से जाने वालों की गति का और भक्ति योग की उत्कृष्टता का वर्णनधूम मार्ग और उर्चिरदि मार्ग से जाने वालों की गति का और भक्ति योग की उत्कृष्टता का वर्णन

तृतीय स्कन्ध के इस अध्याय में भगवान कपिल अपनी माता देवहूति को दिए जा रहे सांख्य और भक्ति योग के उपदेश का समापन करते हैं {...}

Srimad Bhagwat Ashtavkra Geeta Religious Theology

इच्छा से मुक्ति ही सच्ची मुक्ति है अष्टावक्र प्रकरण -11इच्छा से मुक्ति ही सच्ची मुक्ति है अष्टावक्र प्रकरण -11

श्लोक- भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी | निर्विकारो गतक्लेश:सूखेनैवोपशाम्यति ||१|| सामान्य अर्थ -जो निश्चय कर लेता है कि संसार में उत्पति और विनाश ,होना और न होना {...}