अष्टावक्र गीता प्रकरण एकादश -ज्ञानाष्ट्क का सार

अष्टावक्र गीता कोई क्रमिक साधना पद्धति नहीं है ,यह सीधे सत्य पर चोट है |पहले दस प्रकरणों में अष्टावक्र ने बंधन क्या है,मुक्ति क्या है ,वैराग्य क्या है ,वासना कैसे संसार बनाती है ,तृष्णा ही बंधन है -इस का विवेचन किया है |ग्यारहवां प्रकरण आते आते शिष्य जनक अब जिज्ञासु नहीं रहे ,वे अब बोध के निकट हैं इसलिए इस प्रकरण को ज्ञानाष्ट्क कहा गया है |अष्टक अर्थात आठ ,इस में आठ प्रकार के संकल्प की चर्चा है |इस प्रकरण की सब से बड़ी विशेषता है -इस में एक भी विधि नहीं है ,कोई आसन,प्राणायाम ,जप,तप का आदेश नहीं केवल एक शब्द बार बार आता है -“इति निश्चयी”

अष्टावक्र जी कहते हैं ज्ञान कोई उपलब्धि नहीं जिसे कहीं और बाहर से लाना है ,ज्ञान तो केवल संकल्प का नाम है | जैसे तुम्हारी निश्चय बुद्धि होगी ,वैसे ही तुम्हारी गति होगी | तुम अपने आप को बद्ध मानते हो तो बद्ध हो ,मुक्त मानते हो तो मुक्त हो |बंधन वस्तु नहीं धारणा है |

ज्ञानाष्ट्क के आठ निश्चय अर्थात संकल्प -एक मनोवैज्ञानिक क्रान्ति

इस पूरे प्रकरण को दो भागों में समझा जा सकता है | पहले चार संकल्प संसार के प्रति दृष्टि बदलते हैं और अगले चार संकल्प स्वयं के प्रति दृष्टि बदलते हैं |

पहला संकल्प -विकार स्वभाव का है ,मेरा नहीं | संसार में बनना विगड़ना ,आना जाना ,भाव और अभाव चलता ही रहता है |यह प्रकृति का स्वभाव है |हम भूल से इसे अपना स्वभाव मान लेते हैं |शरीर बुढा होता है तो हम कहते हैं मैं बूढा हो गया ,मन उदास होता है तो हम कहते हैं मैं उदास हूँ |ज्ञानी जानता है कि विकार बाहर हो रहा है ,मेरे अन्दर नहीं ,जैसे आकाश में बादल आते जाते है और आकाश वैसे का वैसा ही रहता है |ऐसा विश्वास होते ही व्यक्ति निर्विकार हो जाता है |उस का क्लेश समाप्त हो जाता है |क्यों कि क्लेश तादात्म्य से उत्पन्न होता है |तादात्म्य टूटा तो क्लेश गया |

दूसरा संकल्प -कर्ता कोई और है |

हम सब के दुःख का मूल कारण-मैं कर्ता हूँ,मैंने किया ,मैं करूंगा |मेरे बिना काम ही नहीं होगा |यह कर्ता भाव ही अहंकार का सब से बड़ा रूप है |ज्ञानाष्ट्क कहता है ,इस सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माता ,संचालक एक ही चेतन तत्व है |तुम कर्ता नहीं निमित मात्र हो ,जब यह निश्चय गहरा होता है तो दो चीजें एक साथ घटती हैं -अन्दर से आशा मिट जाती है और बाहर से आसक्ति मिट जाती है |तो फल की चिंता क्यों ?आसक्ति इसलिए मिट्ती है ,क्यों कि जब सब कुछ उसी एक से हो रहा है तो मेरा तेरा कहाँ रहा ? व्यक्ति शांत हो जाता है ,पर निष्क्रिय नहीं | वह पहले से अधिक कुशलता से कार्य करता है क्यों कि अब बोझ नहीं है |

तीसरा और चौथा संकल्प :जीवन की धूप छाँव दैवाधीन है|

मनुष्य को सब से ज्यादा अशांत दो चीजें करती हैं -आपदा-सम्पदा,और सुख दुःख,जन्म-मृत्यु |हम चाहते हैं सम्पदा रहे,आपदा न आये ,सुख बना रहे ,दुःख न आये |अष्टावक्र कहते हैं ,ये सब समय और नियति के अधीन है |यह अपने समय पर आयेंगे और अपने समय पर जायेगे ,जैसे दिन-रात | इस का अर्थ भाग्यवादी हो जाना नहीं ,इस का अर्थ है जो मेरे वश में नहीं ,उस के लिए शोक न करना और जो मेरे वश में है -अपना निश्चय ,अपना साक्षी भाव -उसे दृढ रखना ,ऐसे निश्चय वाला व्यक्ति तृप्त रहता है |उस की इन्द्रियाँ स्वस्थ रहती हैं ,वह न किसी चीज की अति इच्छा करता है ,न रोता है |वह कर्म करता है ,पर लिप्त नहीं होता ,जैसे कमल पानी में रह कर भी पानी से अलग रहता है | आज की भाषा में कहें तो यह स्ट्रेस मैनेजमेंट का सब से बड़ा सूत्र है |

पांचवां संकल्प -दुःख का जन्म चिंता से होता है |

इस प्रकरण का सब से क्रांतिकारी मनोवैज्ञानिक सूत्र है | अष्टावक्र जी कहते हैं ,दुःख बाहर की घटना से नहीं अन्दर की चिंता से पैदा होता है ,घटना तो हो कर समाप्त हो जाती है ,पर हम उसे मन में बार बार दोहराते हैं ,उस की चिंता करते हैं |चिंता ही दुःख का कारण है | यदि आप ध्यान से देखें तो पायेंगे कि जब मन निर्विचार होता है ,तब दुःख नहीं होता | दुःख तब होता है जब मन सोचने लगता है |इसलिए ज्ञानी चिंता को छोड़ देता है |चिंता गई तो स्पृहा गई,तो दुःख गया |वह सुखी और शांत हो जाता है |यह पलायन नहीं है ,यह जागरूकता है | चिंता को देखना और उस से अपने को अलग जानना |

छठा संकल्प -मैं देह नहीं बोध हूँ |

हमारा सब से पुराना बंधन देहाभिमान है |बचपन से हमें सिखाया गया -मैं शरीर हूँ ,मैं गोरा हूँ ,मैं मोटा हूँ,दुबला हूँ,|इसी से ही सब राग-द्वेष पैदा होते हैं |ज्ञानाष्ट्क कहता है -मैं शरीर नहीं हूँ,शरीर मेरा नहीं है ,मैं तो केवल बोध अर्थात ज्ञान हूँ चेतना हूँ | जैसे ही यह निश्चय दृढ होता है ,व्यक्ति कैवल्य को प्राप्त हो जाता है |कैवल्य अर्थात अकेबलता का अंत ,केवल चेतना बची | तब वह यह हिसाब नहीं रखता कि मैंने क्या किया ,क्या नहीं किया ,क्या पुन्य किया ,क्या पाप किया |कृत और अकृत का बोझ समाप्त हो जाता है |क्यों कि करने वाला शरीर था ,मैं नहीं |यह ज्ञान पश्चाताप और अहंकार दोनों से मुक्त कर देता है

सातवाँ संकल्प -ब्रह्मा से चींटी तक सब में मैं ही हूँ |

यह अद्वैत की पराकाष्ठा है |जब व्यक्ति जान लेता है कि यह समस्त जगत -ब्रह्मा से लेकर तिनके तक -मेरे ही चैतन्य से व्याप्त है ,मैं ही सब में हूँ और सब मुझ में हैं ,तो उस के अन्दर कोई विकल्प नहीं बचता |विकल्प अर्थात उहापोह -यह अच्छा यह बुरा ,यह मेरा ,यह पराया | जब सब में मैं ही हूँ तो किस से राग और किस से द्वेष ?ऐसा व्यक्ति शुद्ध हो जाता है ,शांत हो जाता है |उस के अन्दर प्राप्त और अप्राप्त की उहापोह समाप्त हो जाती है |कुछ पाना नहीं रहा क्यों कि सब कुछ मैं ही हूँ ,कुछ खोना नहीं रहा र्क्यो कि मेरे सिबा कुछ है ही नहीं ,यही सच्ची पूर्णता है |

आठवाँ संकल्प -यह आश्चर्यों से भरा विश्व कुछ भी नहीं है |

अंतिम निश्चय अर्थात संकल्प सब से सूक्ष्म है |यह संसार जो इतना आश्चर्यजनक ,इतना विविध,इतना आकर्षक दिखता है ,तत्व दृष्टि से यह कुछ भी नहीं है | अर्थात इस की स्वतंत्र सता नहीं है |जिसे रस्सी में सांप दिखता है ,सांप दिखता तो है पर है नहीं |रस्सी का कुछ बिगड़ता नहीं ,वैसे ही चेतना में विश्व दिखता है ,पर चेतना का कुछ बनता बिगड़ता नहीं | ऐसा जानने वाला व्यक्ति वासना रहित हो जाता है |वासना तभी तक है जब तक विश्व को सत्य मानते हैं |जब विश्व मिथ्या ,अर्थात परिवर्तनशील और आश्रित दिख गया तो वासना स्वत: मिट जाती है |वह स्फूर्ति मात्र केवल चेतना के प्रकाश मात्र -में स्थित हो जाता है और ऐसी शान्ति को प्राप्त होता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं |

ज्ञानाष्ट्क का व्यबहारिक निष्कर्ष –

इस प्रकरण में अष्टावक्र ने एक बड़ी बार कही है – समाधि के लिए अनुष्ठान करना भी बंधन है | हम अक्सर सोचते हैं मन को रोकना है ,विचारों को रोकना है ,तब शान्ति मिलेगी| अष्टावक्र कहते हैं ,रोकने वाला कौन है ? रोकने की चेष्टा ही अहंकार है | इसलिए ज्ञानाष्ट्क साधना नहीं सिखाता ,निश्चय सिखाता है और निश्चय कोई मेहनत नहीं,केवल स्मरण है | जो तुम हो ,उसे याद कर लेना | आज के जीवन में इस के चार प्रयोग हैं | पहला – जब विकार आये तो जानो स्वभाव है ,मेरा स्वभाव नहीं| दूसरा -जब कर्ता भाव सताए तो जानो करने वाला कोई और है मै साक्षी हूँ |तीसरा- जब सुख दुःख ,लाभ हानी सताए तो जानो यह समय का खेल है |मैं तृप्त हूँ | चौथा -जब चिंता सताए तो जानो चिंता ही दुःख है ,घटना नहीं | जिस ने इन आठ निश्चयों को अपने जीवन में उतार लिया ,उसे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं|वह जहाँ है वहीं मुक्त है | उसे शान्ति के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता ,शांति उस का स्वभाव बन जाती है |

यही ज्ञानाष्ट्क है -आठ निश्चयों का गुच्छा जो एक ही क्षण में बंधन को मिटा देता है | यह हमे सिखाता है कि मुक्ति भविष्य में घटने वाली घटना नहीं,वर्तमान में किया गया निश्चय है ,जैसे रस्सी में सांप का भ्रम ज्ञान से मिटता है,वैसे ही शरीर मे आत्म बुद्धि का भ्रम निश्चय से मिटता है | अष्टावक्र का मार्ग कठिन नहीं ,सरलतम है ,कुछ पाना नहीं,केवल यह जानना है कि बंधन था ही नहीं | जो इसे निश्चय पूर्वक जान लेता है ,वह निर्विकार ,गत क्लेश और सुखेनैव प्रशांत हो जाता है ,वही ज्ञानी है,वही जीवन्मुक्त है |

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