श्वेताश्वतर ऋषि का आत्मज्ञान :अज्ञान से ब्रह्मज्ञान तक की यात्रा
भातीय दर्शन के आकाश में उपनिषद नक्षत्रों की तरह हैं,और उन में श्वेताश्वतर उपनिषद का प्रकाश विशेष है |यह केवल ज्ञान का ग्रन्थ नहीं ,बल्कि ज्ञान-योग और भक्ति का संगम है | इस के रचियता और द्रष्टा है – मह्रिषी श्वेताश्वतर
कौन थे श्वेताश्वतर ऋषि ?
नाम ही रहस्य खोलता है |श्वेत का अर्थ शुद्ध,सफेद, और अश्वतर का अर्थ है -इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखने वाला ,कुछ आख्यानों में श्वेताश्व को सफेद घोड़े वाला और श्वेताश्वतर को सफेद खच्चर का स्वामी भी कहा गया है |श्वेताश्वतर ऋषि के बारे में कहा गया है कि उन्होंने घोर तपस्या और दैवी कृपा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया और फिर अपने शिष्यों ,जो परम वैरागी और आत्माश्रमी थे ,उन्हें इस का उपदेश दिया | यह यजुर्वेद की श्वेताश्वतर शाखा का मंत्रोपनिषद है ,जिस का आदि शंकराचार्य ने ब्रह्मसूत्र भाष्य में भाष्य किया है |
इस उपनिषद की विशेषता यह है कि यह सब से पहले निर्गुण ब्रह्म को रूद्र यानी शिव के नाम से पुकारता है |और उसे शैव दर्शन की सब से प्राचीन व्यवस्थित व्याख्या माना जाता है |
2. आत्म ज्ञान की प्रारम्भिक जिज्ञासा
श्वेताश्वतर उपनिषद का आरम्भ ही उन शाश्वत प्रश्नों से होता है ,जो हर चिंतनशील मनुष्य के मन में उठते है | किं कारणं ब्रह्म कुत: स्म जाता,जीवाम कें क्व च सम्प्रतिष्ठा | ब्रह्म क्या है?हम कहाँ से जन्म लेते हैं ?किस के द्वारा जीते हैं ?और किस में स्थित हैं? काल ,स्वभाव,नियति ,यदुच्छा,पंच महाभूत,पुरुष-इन में से जगत का कारण कौन है ?
ऋषि कहते हैं ,इन पर केवल तर्क से नहीं ,ध्यान योग और आत्म चिन्तन से विचार करना चाहिए |यही आत्म ज्ञान की पहली सीढ़ी है – कारण को बाहर नहीं ,अन्दर खोजना |
3 -श्वेताश्वतर ऋषि के आत्मज्ञान के सात सूत्र
सूत्र १ – आत्मा को भीतर देखो |
उपनिषद स्पष्ट कहता है -ईश्वर को जानना है तो बाहर मन्दिर मूर्ती में नहीं,अपनी ही आत्मा को देखो |तिलों में तेल की तरह,दहीं में घी की तरह ,नदी के स्त्रोत में जल की तरह,आरणी में अग्नि की तरह-वह आत्मा अपने ही ह्रदय में स्थित है |उसे सत्य और तपस्या से देखा जा सकता है |यह आत्मा इन्द्रियों से नहीं,बल्कि शुद्ध मन से जानी जाती है |
सूत्र 2 – दो पक्षियों का रूपक :जीव और आत्मा का भेद –
श्वेताश्वतर उपनिषद में आत्मा के स्वरूप को समझाने के लिए एक अत्यंत सुन्दर रूपक दिया गया है | जिस का उल्लेख अन्य उपनिषदों में भी है | शरीर रुपी एक ही वृक्ष पर दो सुन्दर पक्षी बैठे हैं |एक पक्षी जो जीव है ,वह वृक्ष के मीठे और कडवे फलों को चाव से खाता है ,सुख दुःख भोगता है | दूसरा पक्षी जो आत्मा है ,वह कुछ नहीं खाता ,वह केवल साक्षी भाव से शांत देखता रहता है | जीव है जो कर्ता भोक्ता बनता है और आत्मा है जो अकर्ता,अभोक्ता,नित्य साक्षी है | जब जीव दूसरे पक्षी को पहचान लेता है ,तभी उस का शोक समाप्त होता है | यही आत्मज्ञान है,”मैं खाने वाला नहीं ,देखने वाला हूँ |”
सूत्र 3-आत्मा का स्वरूप -वह स्त्री नहीं,पुरुष नहीं
पांचवें अध्याय के १० वें मन्त्र में ऋषि एक क्रन्तिकारी घोषणा करते हैं-
नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसक: |यद्य्च्छरीरमादते तेने तेने स युज्यते || अर्थात यह आत्मा न स्त्री है ,न पुरुष नाहीं तों नपुंसक है |वह जिस जिस शरीर को धारण करती है ,उसी उसी के साथ जुडी प्रतीत होती है |आत्मा लिंग ,जाति,आयु,नाम रूप से परे है |यह ज्ञान ही समस्त भेदभाव और अहंकार को समाप्त कर देता है |
सूत्र ४-माया प्रकृति और रूद्र का ज्ञान
श्वेताश्वतर ऋषि सांख्य के पुरुष और प्रकृति के सिधान्त को स्वीकार करते हैं ,पर उसे आगे ले जाते हैं | वे कहते हैं ,प्रकृति माया है और उस माया का स्वामी मायावी महेश्वर -रूद्र है | एक ही जाल को वह अनेक रूपों में फैलाता है |जीव इस माया के बंधन में बंधा है | जब जीव यह जान लेता है कि माया जड है और उस का स्वामी चेतन रूद्र ही परमात्मा है ,तो वह मुक्त हो जाता है |आत्मज्ञान केवल आत्मा को जानना नही बल्कि आत्मा ,प्रकृति और उस के स्वामी तीनों के संबंध को जानना है |
सूत्र ५- ज्ञान योग और भक्ति का त्रिवेणी संगम
यह उपनिषद अद्वैत ,वेदान्त से पहले का सेतु है | उस में तीनों मार्ग एक साथ मिलते हैं |
ज्ञान मार्ग- तत त्वम असि -वह ब्रह्म तू ही है ,,ब्रह्म और आत्मा की अभिन्नता , दोनों एक ही हैं |
योग मार्ग – ऋषि अध्यात्म योग शब्द का प्रयोग करते हैं ,वे कहते हैं ,जैसे रथ को वश में करना हो तो पहले घोड़ों को वश में करो ,वैसे ही मन और इन्द्रियों को योग से वश में करके आत्मा में स्थिर करो |यम,नियम,आसन, प्राणायाम,प्रत्याहार, और ध्यान से जब मन निर्मल होता है ,तब आत्मज्ञान दीपक की तरह प्रकाशित होता है |
भक्ति मार्ग -श्वेताश्वतर उपनिषद पहला उपनिषद है जो स्पष्ट रूप से भक्ति की बात करता है | जिस की परमात्मा में परा भक्ति है और जैसी परमात्मा में वैसी ही गुरु में ,उस महात्मा को ही ये तत्व प्रकाशित होते हैं |ज्ञान बिना प्रेम के शुष्क है और प्रेम बिना ज्ञान के अँधा |
सूत्र ६-आत्मज्ञान का फल-शोक से मुक्ति
उपनिषद में कहा गया है – तथैव बिम्बं मृद्योपलिप्त तेजोमयं भ्राजते तत सुधातम | तद्वात्मतत्व प्रसमीक्ष्य दे हीं एक: कृतार्थोभवते वीतशोक:||
जैसे मिट्टी से लिपटा हुआ सोने का बिम्ब साफ करने पर चमक उठता है ,वैसे ही देह जब आत्मतत्व को देख लेता है ,तब वह कृतार्थ और शोक रहित हो जाता है |आत्मज्ञानी व्यक्ति न अतीत के लिए रोता है .न भविष्य से डरता है | वह जानता है -अजं ध्रुव सर्वतत्वेविशुद्धं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपापै: || उस अजन्मा ,नित्य,शुद्ध देव को जान कर वह सब पापों से मुक्त हो जाता है |
आज के युग में श्वेताश्वतर का आत्मज्ञान क्यों प्रासंगिक है ?
आज हम सूचना के युग में हैं ,पर आत्म विस्मृति के युग में भी हैं | हम बाहर सब कुछ जानना चाहते हैं ,पर भीतर कौन है ,यह नही जानते |श्वेताश्वतर ऋषि का ज्ञान हमें तीन व्यबहारिक सीख देता है –
१ – साक्षी भाव का अभ्यास -दिन भर में 10 मिनट निकाल कर केवल देखने वाले बनें | विचार आ रहे हैं ,जाने दो,भाव आ रहे हैं ,जाने दो | मैं विचार नहीं ,विचारों का द्रष्टा हूँ |यही दो पक्षियों की साधना है |
2- देह से तादात्म्य तोड़ना -यह क्रोध,अपमान,अहंकार आये तो याद करें – मैं शरीर नहीं ,यह भूमिका नहीं ,मैं वह लिंग -रहित ,शुद्ध चेतना हूँ ,जो इस शरीर में है |
3 – भक्ति युक्त ज्ञान – केवल किताबी ज्ञान से अहंकार बढ़ता है | ज्ञान के साथ समर्पण जोड़ें | अपने कर्म ,अपनी जिज्ञासा को उस एक रूद्र ,उस एक चेतना को अर्पित कर दें |
उपसंहार -श्वेताश्वतर ऋषि का आत्मज्ञान किसी एक सम्प्रदाय का सिधांत नहीं ,बल्कि एक जीवन अनुभव है | वे कहते हैं ,आत्मा कहीं दूर आकाश में नहीं ,वह यहीं है ,इसी हृदयगुहा में | उसे खोजने के लिए हिमालय जा ने की आवश्यकता नहीं ,केवल अन्तर्मुखी होने की आवश्यता है |जिस दिन मनुष्य यह जान लेता है कि भोक्ता और साक्षी दो अलग हैं और वह साक्षी ही मैं हूँ ,उसी दिन उस के जीवन का सारा शोक ,सारा भय ,साड़ी दौड़ समाप्त हो जाती है |यही मोक्ष है ,यही आत्मज्ञान का अन्तिम् फल है और यही श्वेताश्वतर ऋषि का मानवता को सब से बड़ी देन है |
लेखक-मदन लाल शर्मा
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