अश्वपति कैकेय का तत्व चिन्तन और आज के सन्दर्भ में उस की प्रासंगिकता
भूमिका- भारतीय दर्शन परम्परा में राजा और ऋषि का भेद कभी आत्यन्तिक नहीं रहा | जहां ऋषि राजधर्म की मीमांसा करते थे वहीं कई राजा ब्रह्म विद्या के प्रवर्तक हुए |ऐसा ही एक उज्ज्वल नाम है -कैकेय देश के राजा अश्वपति | उपनिषद काल में जब आत्म तत्व की खोज अपने शिखर पर थी,तब अश्वपति कैकेय ने राजसिंहासन पर बैठ कर भी उस परम सत्य का साक्षात्कार किया था ,जिसे बड़े बड़े तपस्वी वन में खोज रहे थे | उन का चिन्तन न केवल आध्यात्मिक नहीं बल्कि एक समग्र सामाजिक ,राजनितिक और मानवीय दर्शन था | | |
ऐतिहासिक और शास्त्रीय सन्दर्भ-
अश्वपति कैकेय का उल्लेख मुख्यत:छान्दोग्य उपनिषद के पंचम प्रपाठक में मिलता है |कैकय प्रदेश ,जो आज के पंजाब और पाकिस्तान के सीमांत क्षेत्र में माना जाता है ,उस समय विद्या और संस्कृति का एक प्रमुख केंद्र था | कथा प्रसिद्ध है की औपमन्यक,सत्ययज्ञ ,इंद्रद्युम्न,जन,बुडिल और उद्दालक जैसे छ: महान ऋषि आत्मा और ब्रह्म की पिपासा लेकर भटक रहे थे | वे सभी विद्वान थे ,परन्तु उन्हें वैश्वानर आत्मा के रहस्य का पूर्ण ज्ञान नहीं हो पा रहा था ,तब वे एक मत हो कर राजा अश्वपति कैकेय के पास गये क्यों कि उन की ख्याति एक “आत्मवित”राजा के रूप में दूर दूर तक फैली हुई थी |यह घटना स्वयं ,यह सिद्ध करती है कि उस युग में ज्ञान सता का मोहताज नहीं था ,बल्कि सता ज्ञान के सम्मुख नत थी | अश्वपति ने पहले उन की विनम्रता की परीक्षा ली और फिर उन्हें क्रमश: उपदेश दिया |यहीं से उन के तत्व चिन्तन का स्वरूप स्पष्ट होता है | अश्वपति के तत्व चिन्तन के मूल सूत्र ,अश्वपति के दर्शन को चार प्रमुख स्तम्भों पर समझा जा सकता है |
१. वैश्वानर विद्या -समष्टि में व्यष्टि की एकता –
अश्वपति के चिन्तन का केंद्र वैश्वानर आत्मा है |उन्होंने कहा कि यह जो विराट पुरुष है ,जिस का मस्तक द्युलोक है,नेत्र सूर्य हैं,प्राण वायु हैं,मध्यभाग आकाश है ,मूत्र जल है और पृथ्वी चरण हैं -वही वैश्वानर हैं | छ: ऋषियों में से प्रत्येक किसी एक प्रतीक को ही ब्रह्म मान बैठा था |कोई स्वर्ग को,कोई सूर्य को, कोई वायु को | अश्वपति ने समझाया कि खंड सत्य को पूर्ण सत्य मानना ही भ्रम है |वैश्वानर एर्कार्गी नहीं सर्वागीं है ,जैसे शरीर के अंग अलग अलग कार्य करते हुए भी एक ही चेतना से संचालित होते हैं ,वैसे ही सृष्टि के सारे देवता,लोक, और प्राणी एक ही वैश्वानर चेतना के अंग हैं | यह विचार आज के युग में समग्रता के दर्शन या systems thinking के अत्यंत निकट है |वे सिखाते हैं कि मनुष्य को अपने को इस विराट शरीर का एक अंग मान कर देखना चाहिए ,तभी अहंकार का नाश होता है ||
2. आत्मज्ञान पर आधारित राज धर्म –
जब ऋषियों ने उन से पूछा कि उन का राज्य इतना समृद्ध और अपराध मुक्त क्यों है ,तो अश्वपति का उतर उन के तत्व चिन्तन की दूसरी विशेषता को उजागर करता है | उन्होंने छान्दोग्य में कहा है :- |
न में स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपो | नानाहिताग्निर्नाविद्वान न स्वैरी स्वैरिणी कुत: ||
अर्थात-मेरे जन पद में कोई चोर नहीं,कोई कृपण नहीं ,कोई शराबी नहीं,कोई अग्निहोत्र से रहित नहीं,कोई अविद्वान नहीं और व्यभिचारी तो हो ही कैसे सकता है ? यह कोई राजा का अहंकार पूर्ण दावा नहीं था ,बल्कि उन के दर्शन का सामाजिक प्रकटीकरण था |अश्वपति मानते थे कि जब तक प्रजा ओ यह ज्ञान नहीं होगा कि सब में एक ही आत्मा है ,तब तक नैतिकता क़ानून से नहीं आएगी ,उन्होंने राज्य में यज्ञ ,विद्या और अन्न के समान वितरण को अनिवार्य किया | उन के अनुसार राजा का पहला कर्तव्य प्रजा को अशिक्षा से मुक्त करना है ,क्यों कि दरिद्रता और अपराध का मूल कारण अज्ञान ही है | यह रामराज्य की कल्पना से भी कई शताब्दी पूर्व का एक कल्याणकारी राज्य का माडल था |
3-प्राण और अन्न का अभेद
अश्वपति ने वैश्वानर विद्या में अन्न और प्राण के संबंध को अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से समझाया |उन्होंने कहा कि मनुष्य जो भोजन करता है ,वह वैश्वानर की आहूति है |प्राण ही वह अग्नि है जो अन्न को पचाती है |इसलिए भोजन केवल शरीर की क्रिया नहीं ,एक यज्ञ है |जो व्यक्ति इस भाव से भोजन करता है कि वह विराट वैश्वानर को तृप्त कर रहा है ,उस का भोजन शुद्ध होता है और विचार शुद्ध होते हैं |इसी से आगे चल कर आयुर्वेद और योग में “आहार शुद्धो सत्व शुद्धि” का सिद्धांत विकसित हुआ |अश्वपति का यह चिन्तन मनुष्य को भोगवादी से यज्ञवादी बनाता है |
४-विनम्रता और जिज्ञासु के प्रति सम्मान –
एक चक्रवर्ती राजा होते हुए भी अश्वपति ने ब्राह्मण ऋषियों को शिष्य की तरह नहीं ,बल्कि सम्मान के साथ ज्ञान दिया |उन्होंने यह नहीं कहा कि मैं राजा हूँ ,तुम मेरे अधीन हो ,बल्कि उन्होंने कहा ,भगवन आप सभी इस विद्या के योग्य हैं | उन का मानना था कि ज्ञान का अधिकारी वही है जिस में जिज्ञासा है ,चाहे वह राजा हो या ऋषि |यही कारण है कि उपनिषदों में उन्हें राजर्षि कहा गया है |
वर्तमान युग में अश्वपति के चिन्तन की प्रासंगिकता –
आज जब मनुष्य टुकड़ों में बंटा हुआ है -धर्म,जाति,राष्ट्र और विचार धाराओं में – अश्वपति का वैश्वानर सिधान्त हमें जोड़ने का कार्य करता है |ग्लोबल वार्मिंग ,युद्ध और मानसिक तनाव का मूल कारण यही खंड दृष्टि है |हम पृथ्वी को जड संसाधन मानते हैं ,वायु को गैस और सूर्य को केवल ऊर्जा का स्त्रोत |अश्वपति कहते हैं इन्हें विराट के अंगो के रूप में देखो ,तो शोषण की जगह सम्मान जन्म लेगा दूसरा ,उन का राजधर्म आज के प्रशासन के लिए एक दर्पण है |एक राज्य की सफलता केवल जी डी पी से नहीं ,बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि वहां कितने लोग पढ़े लिखे ,संयमी और आत्म निर्भर हैं |शिक्षा और चरित्र के बिना समृद्धि टिकाऊ नहीं हो सकती |तीसरे उन का अन्न ब्रह्म का सिद्धान्त आज की भौतिकवादी जीवन शैली में माइंड फुल इटिंग और आध्यात्मिक परिस्थितिकी का आधार बन सकता है |
निष्कर्ष –
अश्वपति कैकेय केवल एक पौराणिक राजा नहीं ,भारतीय तत्व चिन्तन के एक मौलिक स्तंभ थे |उन्होंने सिद्ध किया कि आत्म ज्ञान गुफा में ही नहीं ,राजमहल में भी संभव है और राजधर्म तभी सार्थक है जब वह ब्रह्म विद्या पर आधारित हो |उन का दर्शन हमें सिखाता है कि सच्चा ज्ञान वह है जो मनुष्य को छोटा नहीं ,विराट बनाता है ,जो उसे समाज से काटता नहीं,बल्कि समष्टि से जोड़ता है | आज आवश्यकता है कि हम अश्वपति कैकेय जैसे राजर्षियों के चिन्तन को केवल पाठ्यपुस्तकों से निकल कर जीवन और नीति में उतारें |तभी एक अपराध मुक्त,अभाव मुक्त ,और अज्ञान मुक्त समाज की उन की कल्पना साकार हो सकेगी |
लेखक-मदन लाल शर्मा
वेबसाइट-http://thegodweknow.com अगले सप्ताह एक और उपनिषदों के ऋषि का तत्व चिन्तन पढ़ते रहें |
