इच्छाओं के बंधन टूटे तो आत्मा को मिला परम आनन्द

श्लोक – कायकृत्यासह:पूर्व ततो वाग्विस्तरासह : | अत चिन्तासहस्तस्माद एकमेवाहमास्थित: || १||

सामान्य अर्थ – जनक कहते हैं -पहले मैं शारीरिक कर्मों से ऊब गया ,फिर वाणी के विस्तार से ऊब गया ,फिर विचारों से भी ऊब गया \इस क्रम से उबते उबते मैं अब अपने स्वरूप में स्थित हो गया हूँ |

विवेचना –

यह श्लोक साधना के क्रमिक त्याग का सूत्र है |अज्ञानी बाहर से अन्दर की तरफ जाता है |पहले स्थूल शरीर की भाग दौड़ से वैराग्य होता है ,मनुष्य समझता है कि कर्मों में सुख नहीं फिर वाणी का वैराग्य आता है -व्यर्थ बोलना ,शास्त्रार्थ ,बाद-विबाद सब बोझ लगता है |मौन प्रिय लगता है |अंत में सब से सूक्ष्म स्तर पर चिन्तन से भी वैराग्य हो जाता है ,क्यों कि चिन्तन भी मन का ही विक्षेप है | जब तक विचार है ,तब तक द्वैत है | जनक कहते हैं ,मैंने विचार का भी त्याग नहीं किया ,बल्कि विचार के प्रति असहिष्णुता हो गई | यह त्याग प्रयास से नहीं ,बोध से हुआ|इसी बोध में स्थित होना ही सहज समाधि है | यह श्लोक आज के अति व्यस्त ,अति वोलने वाले और अति सोचने वाले मनुष्य के लिए मुक्ति का मार्ग बताता है -बाहर से अन्दर लौटना |

जैसे एक यात्री पहले चल कर थक जाता है तो वह चलना छोड़ देता है ,फिर वह बैल गाडी पर बैठा है और रास्ते भर बातों से थक जाता है ,तो मौन हो जाता है | फिर गाडी में बैठे बैठे भी मन में योजनाये बनाते बनाते थक जाता है और आँखें बन्द कर लेट जाता है | ठीक वैसे ही साधक पहले संसार के कर्मों से ,फिर शास्त्र चर्चा से और अंत में भीतर चिन्तन से थक कर अपने आप में विश्राम पाता है | तब उसे कहीं जाना नहीं ,कुछ पाना नहीं ,बस होना ही शेष रह जाता है |

श्लोक- प्रीत्यभावेन शब्दादेर -दृश्यत्वेन चात्मन: | विक्षेपैकाग्रहृदय एकमेवाहमास्थित: ||2||

सामान्य अर्थ – शब्द आदि बिषयों में प्रीति न रहने से और आत्मा के अदृश्य होने से हृदय विक्षेप और एकाग्रता दोनों से रहित हो कर ,मैं अब ऐसे ही अपने स्वरूप में स्थित हूँ |

विवेचना-

इस श्लोकमें स्थितप्रज्ञता के दो कारण बताये गये हैं |पहला – विषयों में रस का अभाव ,जब ज्ञानी को यह स्पष्ट हो जाता है कि सुख विषयों में नहीं,अपने आप में है ,तो शब्द ,स्पर्श,रूप,रस,गंध में आसक्ति स्वत: ही छूट जाती है | यह वैराग्य जबरदस्ती का नहीं,रस क्षय से उत्पन्न है | दूसरा कारण-आत्मा का अदृश्य होना ,आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं है ,उसे देखा नहीं जा सकता इसलिए मन उसे पकड़ नहीं सकता ,पकड़ने की कोशिश ही विक्षेप अर्थात मन का भटकाव है |जो ज्ञानी यह देख लेता है कि जिसे पकड़ना है ,वह पकड़ में आ ही नहीं सकता और जिसे पकड़ रहे हैं उस में सार ही नहीं तो मन न विक्षिप्त रहता है ,न एकाग्र करने की चेष्टा करता है |वह सहज हो जाता है |भटकाव और एकाग्रता दोनों मन की ही अवस्थाएं हैं \ज्ञानी दोनों से परे है ,यही एवमेवाहमस्थित: का रहस्य है-बिना किसी यत्न के स्व स्थिति |

जैसे एक बालक को खिलौनों में बड़ा रस आता है ,पर बड़ा होने पर उन्हीं खिलौनों में रस नहीं रहता \खिलौने सामने हैं ,पर प्रीति नहीं,दूसरी और आकाश को वह पकड़ना चाहे तो पकड़ नहीं सकता क्यों कि आकाश अदृश्य और व्यापक है |ऐसी ही दशा ज्ञानी की है विषय सामने हैं पर उन में प्रीति नहीं रही ,और आत्मा अन्दर है ,पर वह आँखों से दिखती नहीं ,इसलिए उस का मन न तो विषयों की तरह दौड़ता है जो विक्षेप है ,और न आत्मा को पकड़ने के लिए जबरदस्ती एकाग्र होता है |वह मध्य में सहज में स्थित रहता है |

श्लोक- समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यबहार:समाधये | एवं विलोक्य नियमं एवमेवाहमास्थित: ||3||

सामान्य अर्थ – भ्रम और विक्षेप आदि में समाधि के लिए व्यबहार करना पड़ता है ,ऐसा नियम देख कर मैं अब वैसे ही स्थित हो गया हूँ |

विवेचना –

बहुत गहरा मनोवैज्ञानिक श्लोक है |अज्ञानी सोचता है -मन विक्षिप्त है ,इसलिए समाधि का अभ्यास करना पड़ेगा |अष्टावक्र और जनक इस मान्यता को ही बंधन मानते है |जब तक आप मानते हैं कि मैं विक्षिप्त हूँ,तब तक आप समाधि का अभ्यास करेंगे | यह अभ्यास ही नया व्यबहार ,नया कर्म ,नया बंधन बन जाता है |समाधि के लिए किया गया प्रयास भी अध्यास है ,कल्पना है |ज्ञानी इस नियम को देख लेता है कि विक्षेप को मिटाने के लिए किया गया यत्न विक्षेप को ही पुष्ट करता है |जैसे कांटे से काँटा निकालना ,फिर दोनों कांटे फेंक देने होते हैं | जनक कहते हैं ,मैंने यह देखा कि समाधि के लिए समाधि का यत्न करना भी बंधन है |इस लिए मैंने यत्न को ही छोड़ दिया और मैं सहज रूप से स्थित हो गया |यह प्रयास का त्याग है ,पुरुषार्थहीनता नहीं,परम पुरुषार्थ यही है कि कुछ न करना पड़े |

जैसे किसी शांत झील में आप अपनी परछाई साफ देखने के लिए हाथ से पानी को रोकने लगें,तो हाथ डालने से पानी और हिल जाता है |जितना रोकने का यत्न करोगे ,उतनी ही लहरें बढ़ेंगी |बुद्धिमान व्यक्ति हाथ निकाल कर बैठ जाता है और झील स्वत:शांत हो जाती है |मन भी वैसा ही है |समाधि के लिए मन्त्र जपना,श्वास रोकना,विचार दवाना-यह सब हाथ डालने जैसा है | जनक ने यह देख लिया कि यत्न ही विक्षेप है |यत्न छोड़ते ही जो शेष रहा,वही सहज समाधि है,वही स्वरूप स्थिति है |

श्लोक-हेयोपादेयविरहाद एवं हर्षविषादयो:| अभावाददय हे ब्रह्मन एवमेवाह्मास्थित: ||४||

सामान्य अर्थ – हे ब्रह्मन,त्यागने और ग्रहण करने योग्य कुछ भी न रहने से तथा हर्ष और शोक का अभाव हो जाने से ,मैं आज इस प्रकार अपने स्वरूप में स्थित हूँ |

विवेचना –

यह मुक्ति की पराकाष्ठा है |संसार दो शब्दों पर चलता है -हेय और उपादेय ,यह छोड़ना है,यह पकड़ना है |इसी से राग द्वेष ,हर्ष विषाद पैदा होते हैं |प्रिय मिले तो हर्ष,अप्रिय मिले तो शोक|ज्ञानी के लिए जब सब आत्ममय हो गया तो क्या हर्ष और क्या उपादेय ? जब दूसरा बचा ही नहीं तो किसे छोड़ें और किसे पकड़ें ? जनक अष्टावक्र को ,हे ब्रह्मन कह कर सम्बोधित करते हैं -यह गुरु को,ब्रह्म के रूप में देखना है |वे कहते हैं ,आज मेरे लिए हर्ष विषाद दोनों समाप्त हो गए हैं |यह जड़ता नहीं ,अपितु पूर्णता है |सुख दुःख मन की तरंगें हैं ,सागर में नहीं ,जो सागर हो गया,,उस के लिए तरंगों का आना जाना महत्वहीन हो जाता है |यह श्लोक पाठक को सिखाता है कि समता ही समाधि है ,जहाँ चुनाव समाप्त,वहीं ब्रह्म स्थित हो जाता है |

जैसे सोने के आभूषणों को देख कर एक व्यक्ति कहता है -यह हार हेय है,यह चूड़ी उपादेय है ,यह मिल गई तो हर्ष,वह टूट गई तो विषाद |पर सुनार के लिए सब केवल सोना है | वहां न कोई हार हेय है ,न चूड़ी उपादेय |सब रूपों में एक ही तत्व है |उसी प्रकार ज्ञानी के लिए संसार के सारे रूप आत्मा की ही आभूषण हैं | इस लिए उस में न किसी को पाने का हर्ष है ,न खोने का विषाद अर्थात दुःख | वह लाभ हानि ,मान अपमान से परे ,एक रस में स्थित रहता है |यही जीवन मुक्ति है |

श्लोक – आश्रमानाश्रमं ध्यानं चितस्वीकृतवर्जनं | विकल्पं मम वीक्ष्ये-तैरवमेवाहमास्थित: || ५||

सामान्य अर्थ – आश्रम और अनाश्रम,ध्यान करना और चित द्वारा स्वीकृत तथा वर्णित किए गए नियमों को -इन सब को केवल मन के विकल्प मात्र देख कर मैं अपने स्वरूप में स्थित हूँ |

विवेचना –

इस श्लोक में जनक सामाजिक और साधनागत सभी पहचानों को अतिक्रमण करते हैं |आश्रम व्यवस्था ब्रह्मचर्य ,गृहस्थ,वानप्रस्थ,सन्यास-हिन्दू जीवन की आधारशिला रही है ,पर ज्ञानी के लिए यह भी एक मानसिक विकल्प है | मैं गृहस्थ हूँ या सन्यासी,ध्यान कर रहा हूँ या नहीं कर रहा ,यह मन ने ही स्वीकार किया और मन ने ही त्यागा है |आत्मा न आश्रमी है न अनाश्रमी | वह इन लेबलों की साक्षी है | इसी प्रकार शास्त्र और गुरु परम्परा से आये विधि निषेद्ध भी चित स्वीकृत है | एक सम्प्रदाय में जो स्वीकृत है ,दुसरे में वही वर्जित है |जब साधक यह देख लेता है कि नियम मन के खेल हैं ,आत्मा के नहीं ,तो वह मुक्त हो जाता है |यह अराजकता नहीं,परिपक्कता है |नियमों का पालन व्यबहार में होता है ,पर तादात्म्य नहीं रहता |यही एवमेव -अहम-आस्थित: का रहस्य है |

उदाहरण- राहुल एक मल्टीनेशनल कम्पनी में मैनेजर है ऑफिस में वह मैनेजर है ,घर में पिता ,इन्स्टाग्राम में इन्फ़्लुएन्सर और व्हाटसएप ग्रुप में अध्यात्मिक साधक |वह हर लेबल को सच मान कर तनाव में रहता है |आफिस में वोस जैसा व्यबहार न कर पाया तो दुखी ,जिम की फोटो पर लायक न आये तो दुखी ,फिर उस ने समझा -ये सब मन के बनाये विकल्प हैं |आश्रम-अनाश्रम जैसे ही आज के ये रोल हैं |मेरा चित ही इन्हें स्वीकृत और वर्जित करता है | आज मैडिटेशन करना अच्छा है ,कल नहीं किया तो अपराध बोध |ये सब नियम मन के हैं ,मेरे स्वरूप के नहीं | जब से उस ने देखा कि मैं इन भूमिकाओं का साक्षी हूँ ,भूमिका नहीं ,तब से वह आफिस में पूरी दक्षता से काम करता है ,पर घर आते ही मैनेजर का कोट उतार देता है |वह लेबल में फंसता नहीं |यही आज का एवमेव अहम अस्थित: है -संसार में रहते हुए ,भूमिकाओं को खेलते हुए ,उन से चिपके बिना जीना |

श्लोक-कर्मानुष्ठानम ज्ञानाद अथेवोपरमस्तथा | बुध्वा सम्यगिदं तत्वं एवमेवाहमास्थित: ||६||

सामान्य अर्थ – जैसे सकाम भाव से कर्मों का अनुष्ठान करना अज्ञान के कारण है ,वैसे ही कर्मों से जबरदस्ती उपराम हो जाना कर्मों का त्याग कर देना भी अज्ञान के कारण ही है |इस रहस्य को मति भान्ति जान कर मैं अपने आत्म स्वरूप में स्थित हूँ |

विवेचना –

यह श्लोक कर्म योग की सब से सूक्ष्म ग्रन्थि को काटता है |हम दो अतियों में जीते है | एक कहता है – कर्म करो तो मोक्ष मिलेगा ,यज्ञ करो,दान करो,व्रत करो,दूसरा कहता है-कर्म ही बंधन है,सब छोड़ दो,हिमालय चले जाओ | जनक कहते हैं,दोनों अज्ञान हैं ,क्यों?क्यों कि दोनों में करता बचा है |पहले में अहंकार है “मैं कर्म कर रहा हूँ ” दुसरे में अहंकार है ,”मैंने कर्म छोड़ दिया ,मैं त्यागी हूँ,” बंधन कर्म में नहीं ,करता भाव में है |आत्मा न तो कर्म करती है न कर्म छोडती है |वह तो प्रकाश है ,जिस में प्रकृति के गुणों से कर्म होते हुए दीखते हैं |जैसे सूर्य के प्रकाश में लोग काम करते हैं ,सूर्य कुछ नहीं करता |इस तत्व को सम्यक बोध से जान लेने पर प्रवृति और निवृति दोनों का तनाव समाप्त हो जाता है |फिर ज्ञानी राज पात करते हुए भी अकर्मा है और श्मशान नें वैठा अज्ञानी कर्म में ही है |यही जनक की स्थिति है |वे करते हुए भी अकर्मा है इस लिए कहते हैं -एवमेव अहम आस्थित:|

उदाहरण- आज दो तरह के लोग दीखते हैं ,एक है–हसल कल्चर वाला युवा |वह सोचता है दिन में १६ घंटे काम साइड हसल वीक एंड पर भी लेपटोप -तभी सफलता मिलेगी |कर्म ही सब कुछ है |दूसरा है – सब छोडो वाला ,नोकरी से फ्रस्टेट हो कर वह हिमाचल में कैफे खोलने ,सब कुछ छोड़ कर सन्यास लेने की कल्पना करता है |सोचता है नौकरी छोड़ते ही शान्ति मिल जायेगी | जनक कहते हैं दोनों अज्ञान में हैं पहले में कर्ता का अहंकार है -“मैं कर रहा हूँ ” दूसरे में त्यागी का अहंकार -” मैंने छोड़ दिया “बंधन काम में नहीं ,मैं पन में है |मेरी एक शिष्या डॉक्टर है |वह पहले ओवरटाइम कर के थक जाती थी ,फिर उस ने सब छोड़ने का सोचा ,मैंने कहा – छोड़ना नहीं,भाव बदलो |अब वह उसी हस्पताल में है ,वही ऑपरेशन करती है ,पर भाव यह है कि शरीर और बुद्धि उपकरण हैं,प्रकृति करवा रही है ,मैं साक्षी हूँ |न करने का बोझ,न न करने का अहंकार |वह कर्म में अकर्म को जी रही है |यही आज के युग की मुक्ति है |

श्लोक – अचिंत्य चिंत्यमानोSपि चिंतारूपं भजत्यसौ | त्यक्तवा तदभावनं तस्माद एवंमेववाहमास्थित: || 7||

सामान्य अर्थ – जो अचिन्त्य है ,जो मन से परे है ,उस का चिन्तन करने पर भी मन चिन्तन के आकार को ही प्राप्त होता है ,ब्रह्म को नहीं | इसलिए उस चिन्तन की भावना को भी छोड़ कर मैं अपने स्वरूप में स्थित हूँ |

विवेचना-

परमात्मा को शास्त्रों में अचिन्त्य ,अव्यक्त,अनिर्वचनीय कहा है |साधक की सब से बड़ी भूल यह है कि वह उसी अचित्य को चिन्तन का विषय बना लेता है |हम आँख बंद कर के ब्रह्म का ध्यान करते हैं ,आत्मा की कल्पना करते हैं |अष्टावक्र कहते हैं -तुम जिसे ब्रह्म समझ रहे हो ,वह ब्रह्म नहीं तुम्हारी कल्पना है ,मन कभी अचित्य तक पहुंच ही नहीं सकता | जैसे चमच से आकाश को नहीं मापा जा सकता |अचिंत्य का चिन्तन करते हुए तुम चिंता को ही भज रहे हो ,विचार को ही पूज रहे हैं |यह अत्यंत सूक्ष्म माया है |इसलिए अंतिम साधन ,साधन का भी त्याग है |ध्यान से ध्यान को काटना ,जब काँटा निकल जाए तो दोनों कांटे फेंक दिए जाते हैं |इसी प्रकार तत्व चिन्तन से अज्ञान का काँटा निकाल कर उस चिन्तन को भी छोड़ देना है |जब चिन्तन शांत होता है ,तब जो शेष रहता है वही आत्मा है |वह प्रयास से नहीं,प्रयास के विश्राम से प्रकट होता है |इसलिए जनक ने भावना का भी त्याग कर दिया और अपने स्वरूप में स्थित हो गए |

उदाहरण- आज यूट्यूब और पाडकास्ट पर आत्म ज्ञान की बाढ़ है |लोग दिन भर सुनते हैं -“मैं कौन हूँ “ब्रह्म क्या है ?चेतना क्या है / यह श्लोक ठीक इसी पर चोट करता है ,|आप अचिन्त्य ब्रह्म पर सोच रहे हैं ,पर सोचते सोचते आप ब्रह्म को नहीं ,अपनी सोच को ही मजबूत कर रहे हैं |एक् सज्जन रोज मेरे पास आते थे उन्होंने २०० किताबें पढ़ी-अद्वैत,क्वांटम कन्सीएसनेस .ला आफ अट्रेकशन |उन का मन और उलझ गया |वे कहते -समझ में तो आ गया ,पर शान्ति नहीं ,यही हो रहा है |हम आत्मा का चिन्तन करते करते चिंता को ही भाजने लगते हैं |विचार से निर्विचार नहीं मिलता |जैसे पानी में कंकड़ मार कर पानी नहीं मिलता |उस दिन मैंने उन से कहा – एक सप्ताह कुछ मत पढो,कुछ मत सोचो |बस जो हो रहा है उसे देखो,गुस्सा आये तो गुस्से को देखो |चाय पीते हुए चाय को देखो | तीसरे दिन बोले – पहली बार लगा बिना सोचे भी हूँ |उस चिन्तन की भावना को त्यागना ही ध्यान है |आज के सूचना युग में सब से बड़ा साधन है अन स्बस्कराइव करना |

श्लोक-एवमेव कृतं यें स क्रितार्थों भवेदसौ | एवमेव स्वभावो य: स कृतार्थो भवेदसौ || ८||

सामान्य अर्थ – जिस पुरुष ने इस प्रकार का आचरण कर लिया ,वह कृतार्थ -धन्य और मुक्त हो जाता है और जिस का ऐसा स्वभाव ही बन गया है,वह भी कृतार्थ हो जाता है |

विवेचना –

यह द्वादस प्रकरण का समापन और फल-श्रुति श्लोक है |इस में दो प्रकार के जीवन्मुक्तों का वर्णन है |पहला है -साधक-यें एवमेव कृतम |जिस ने सुन कर ,मनन करके वैराग्य और अभ्यास से इस प्रकार की साक्षी दृष्टि ,अनासक्ति और निर्विकल्पना को अपने जीवन में उतारा है |वह यत्न से सिद्ध हुआ है |दूसरा है – सिद्ध स्वभाव -य: एवमेव स्वभाव: | जिस का यह सहज स्वभाव ही है ,जिसे कुछ करना नहीं पड़ा,श्रवण मात्र से ही जिस का बोध जाग गया |जैसे जनक दोनों की अंतिम स्थिति एक ही है -कृतार्थता |कृतार्थ का अर्थ है जिस के लिए सब कुछ करना,पाना,जानना शेष नहीं रहा | वह पूर्ण हो गया |यहाँ अष्टावक्र आश्वासन देते हैं कि मुक्ति किसी विशेष जाति आश्रम या कठोर तपस्या की मोहताज नहीं,मार्ग सब के लिए खुला है |चाहे अभ्यास से आओ ,चाहे सहज बोध से ,लक्ष्य एक है |यह श्लोक इस पूरे प्रकरण का सार है -सत्य को जानना नहीं,सत्य हो जाना ,जो ऐसे जीता है वही मुक्त है,वही धन्य है |

उदाहरण-

इस श्लोक में आज के दो सफल लोगों की कहानी है |पहली है -अंजली |उस ने 10 साल थरेपी,मैडिटेशन,साधना की वैराग्य का अभ्यास किया,धीरे धीरे उस ने लेबल ,कर्ता भाव और ओवर thinking को छोड़ा |आज वह एक स्कूल चलाती है,पर कृतार्थ है |उसे सब कुछ पाना नहीं दूसरी है – उस का ८० वर्षीय पिता ,उन्होंने कोई साधना नहीं की ,उन का स्वभाव ही ऐसा है |वे सब्जी मंडी जाते हैं .पोते के साथ खेलते हैं ,कोई निंदा करे तो हंस देते हैं |उन्हें किसी ने ज्ञान नहीं दिया ,पर उन का स्वभाव है -एवमेव है |वे सहज ही साक्षी हैं |दोनों कृतार्थ हैं |एक ने यत्न से पाया ,एक का स्वभाव ही बन गया |आज की भाषा में -एक ने हाई बर्क से शांति पाई ,दुसरे की आई क्कु ही हाई है |अष्टावक्र कहते हैं -मंजिल एक है आप चाहें स्ट्रगल से आयें या ग्रेस से ,यदि आप जीना सीख गए ,तो आप कृतार्थ हैं |आप को अब किसी सर्टिफिकेट की आवश्यकता नहीं |

इति अष्टावक्र गीता द्वादश प्रकरण

लेखक – मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-http://thegodweknow.com -अगले सप्ताह केवल 12 प्रकरण का सार ,देखते रहें पढ़ते रहें |

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