धूम मार्ग और उर्चिरदि मार्ग से जाने वालों की गति का और भक्ति योग की उत्कृष्टता का वर्णन

तृतीय स्कन्ध के इस अध्याय में भगवान कपिल अपनी माता देवहूति को दिए जा रहे सांख्य और भक्ति योग के उपदेश का समापन करते हैं | यह अध्याय जीव की तीन गतियों -सकाम कर्म,निष्काम उपासना और शुद्ध भक्ति के भेद को अत्यंत स्पष्टता से बताता है |

१ सकाम गृहस्थो की गति -श्री कपिल जी कहते हैं :

अथ यो गृहमेधीयान धर्मानेवाव संगृहे | काममर्थ च धर्मान स्वान दोग्धि भूय: पिपर्ति तान ||

जो पुरुष घर में ही आसक्त है उसे गृहमेधी कहा जाता है |वह गृहस्थ धर्म का पालन तो करता है ,परन्तु उस का उद्देश्य धर्म नहीं,बल्कि काम और अर्थ होता है|वह धर्म को साधन बना कर केवल इन्द्रिय तृप्ति अर्थात अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिए धन इकठा करना चाहता है उदाहरणार्थ आज के बाबा लोग हैं तो धार्मिक पर उन का उद्देश्य धर्म नहीं बल्कि धन इकठा करना है || वे भी श्रद्धा पूर्वक यज्ञों द्वारा देवताओं की और पितरों की पूजा करते हैं |ऐसे पुरुष का मन श्रद्धा से मोहित होने के कारण ,वह पितृ और देवताओं का उपासक बन जाता है | मृत्यु के बाद वह दक्षिणायन अर्थात जब सूर्य की गति दक्षिण की तरफ हो ,मार्ग से चन्द्रलोक को जाता है | वहां अपने पुन्य कर्मों का फल सोमपान के रूप में भोगता है ,परन्तु जब पुन्य समाप्त होते हैं तो उसे फिर मृत्यु लोक में जन्म लेना पड़ता है |

भगवान् कहते हैं ,जब क्षीर सागर में अनन्त शय्या पर शयन करने वाले श्रीहरि योग निंद्रा में लीन होते हैं ,तब ब्रह्मा जी की रात्री होती है और उस समय उन गृह मेधियों के प्राप्त हुए लोक भी प्रलय में लीन हो जाते हैं अर्थात सकाम कर्मों से प्राप्त स्वर्गादि लोक भी नश्वर हैं |

2. निष्काम योगियों और ज्ञानियों की गति –

इस के विपरीत जो धीर पुरुष हैं,वे अपने धर्म का पालन काम और अर्थ के लिए नहीं करते | वे अनासक्त,शांत स्वभाव ,और शुद्ध चित वाले ,ममता और अहंकार से रहित ,अपने धर्म का पालन करने वाले ऐसे योगी पुरुष अपने वर्णाश्रम के धर्म से प्राप्त शुद्ध सत्वगुणमय चित से जब उन की मृत्यु होती है तो उतरायण मार्ग अर्थात सूर्य की गति उतर की तरफ हो तो ब्रह्म लोक की यात्रा करते हैं |यह ब्रह्म लोक सम्पूर्ण विश्व का मूल है | वहां प्रवर के ईश्वर ,प्रकृति के कारण और कार्य दोनों का आधार हैं |

कपिल जी कहते हैं -हे माता,ब्रह्मा जी का एक दिन हमारे द्विपरार्ध के बराबर होता है | जो परब्रह्म का चिन्तन करने वाले योगी हैं ,वे ब्रह्मा जी के लोक में तब तक निवास करते हैं जब तक ब्रह्मा जी की आयु समाप्त नहीं हो जाती अर्थात द्विपरार्ध तक | जब प्रलय काल आता है ,तब पृथ्वी जल,अग्नि ,वायु,आकाश ,मन,इन्द्रियां ,अहंकार,महतत्व आदि सम्पूर्ण जगत को समेटने की इच्छा से ब्रह्मा जी अव्यक्त प्रकृति में,काल में और फिर त्रिगुणमय अव्यक्त में लीन हो जाते हैं | उस समय ब्रह्मलोक में निवास करने वाले वे विरक्त ,जितेन्द्रिय ,अहंकार शून्य योगी भी ब्रह्मा जी के साथ ही भगवान में प्रवेश कर जाते हैं और परम अमृत स्वरूप सनातन परब्रह्म को प्राप्त होते हैं |उन्हें फिर संसार में नहीं लौटना पड़ता |यह क्रममुक्ति है |

3 -वहिर्मुख और विषयासक्त पुरुषों की अधोगति -अब भगवान उन लोगों की गति बताते हैं जो अत्यंत रजोगुणी हैं |

ये त्विहासक्तमनस:कर्मसु श्रद्धयांविता: | कुर्वन्त्यप्रतिषिद्धानि नित्यान्यपि च कृत्स्न्श: ||

जो लोग इस लोक में ही आसक्त है शास्त्रों में जिन कर्मों का निषेध नहीं है ,ऐसे नित्य -नैमितिक कर्मों को भी बड़ी श्रद्धा से करते हैं ,परन्तु उन का चित रजो गुणों से कुन्ठित है,वे कामना से भरे हुए है ,इन्द्रियों को वश में नहीं रख पाते हैं और निरन्तर पितरों का पूजन और घर में ही आसक्त रहते हैं |ऐसे त्रैवर्णिक पुरुष-जो धर्म,अर्थ,काम इन तीनों में ही लगे रहते हैं,जो भगवान हरि से विमुख हैं और जिन्हें मधुसूदन भगवान की वह पवित्र कथा जो कि कीर्तन करने योग्य है उस में रुचि नहीं है |कपिल जी बहुत कठोर शब्दों में कहते हैं -निश्चय ही वे देव से ठगे हुए हैं ,जैसे सूकर विष्ठा को पसंद करता है ,वैसे ही वे अच्युत भगवान की अमृतमयी कथा सुधा को छोड़ कर व्यर्थ की सांसारिक गाथाये सुनते हैं | ऐसे लोग द्क्षिणायन मार्ग से पितृलोक में जाते हैं ,वहां से फिर अपने ही वंश में पुत्र-पोत्रादि के रूप में जन्म लेते हैं और श्मशान तक के कर्म काण्ड में ही लगे रहते हैं | जब तक उन के पुन्य समाप्त हो जाते हैं ,तो देवताओं द्वारा उन की उन्नति को तुरंत नष्ट कर दिया जाता है ,और वे विवश हो कर फिर इस मृत्यु लोक में गिर पड़ते हैं |

४ – भक्ति योग की सर्वश्रेष्ठता- इसलिए हे माता,अब तुम सब प्रकार से परम पुरुष परमात्मा का भजन करो|उन के गुणों के आश्रय से उन की भक्ति के द्वारा ,उन के चरण कमलों का भजन करो |

वासुदेवे भगवति भक्तियोग: प्रयोजित: |जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं यदब्रह्मदर्शनम ||

भगवान वासुदेव में किया गया भक्ति योग शीघ्र ही वैराग्य और वह ज्ञान उत्पन्न कर देता है जो ब्रह्म के साक्षात्कार का कारण है | भक्ति की परिपक्व् अवस्था का लक्षण बताते हुए कपिल जी कहते हैं -जब इन्द्रियों की प्रवृतियों के द्वारा समस्त विषयों में प्रिय-अप्रिय का भेद भाव नहीं रहता,चित सम हो जाता है ,तब वह पुरुष तुरंत ही अहंकार -ममता से रहित ,समदर्शी ,हेय-उपादेय से शून्य अपने आत्म स्वरूप पद को देख लेता है | वह ज्ञान मात्र,परब्रह्म ,परमात्मा ,ईश्वर,पुरुष-ये सब एक ही भगवान के नाम हैं ,वे ही द्रष्टा,द्दश्य, आदि भेदों से अलग अलग प्रतीत होते हैं |

५ – ज्ञान योग और भक्ति योग में अभेद -यह इस अध्याय का सब से गूढ़ सिधान्त है |

ज्ञानमेकं पराचीने: इन्द्रियैर्ब्रह्म निर्गुणम | आबभात्यर्थरूपेण भ्रान्त्या शब्ददिधर्मीणा ||

एक ही निर्गुण ब्रह्म वहिर्मुख इन्द्रियों के कारण शब्दादि धर्मों से युक्त ,अर्थ रूप में भ्रम वश पतीत होता है ,जैसे एक ही आकाश घट मढ़ आदि उपाधियों से अलग अलग लगता है |भगवान कपिल जी कहते हैं -हे माता ,

१ -आसक्ति ही बंधन और मोक्ष का कारण है ,जब मन विषयों में ,पुत्र परिवार,घर में आसक्त होता है तो बंधन का कारण बनता है ,और वही मन जब भगवान में आसक्त हो जाता है तो मोक्ष का कारण बन जाता है | जो ममता और अहंकार से रहित है ,जो सब में सम भाव रखता है ,जो किसी से द्वेष नहीं करता और जो सुख दुःख में समान रहता है ,वह पुरुष मन को जीत लेता है |

2 – ज्ञान योग का मार्ग-कपिल जी ज्ञान योग का लक्षण बताते हैं | ज्ञान योगी निरन्तर आत्मा और अनात्मा का विवेक करता है |वह विचार करता है कि मैं शरीर नहीं हूँ ,मन नहीं हूँ ,बुद्धि नहीं हूँ | मैं तो इन सब को प्रकाशित करने वाला शुद्ध आत्मा हूँ | वह योगी यम-नियम ,आसन,प्राणायाम से चित को शुद्ध करके ,गुरु के द्वारा उपनिषद शास्त्र के श्रवण ,मनन और निधिध्यासन द्वारा ब्रह्म का साक्षात्कार करता है ,वह इस द्दश्य् मान जगत को माया का कार्य समझ कर इस का त्याग कर देता है और अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है |

परन्तु हे माता,यह ज्ञान का मार्ग अत्यंत कठिन है ,इस में यदि भक्ति का भाव न हो तो साधक का चित शुष्क हो जाता है और बीच में ही छूट सकता है |बहुत से ज्ञानी लोग अहंकार के कारण “मैं ही ब्रह्म हूँ”इस भाव में अटक जाते हैं | और भगवान की माया को पार नहीं कर पाते |

3 – भक्ति योग की श्रेष्ठता -इस के बाद कपिल जी भक्ति योग की महिमा बताते हैं ,भक्ति योग बहुत सरल,सुलभ और स्वाभाविक है |भक्त कुछ नहीं त्यागता,वह केवल सब कुछ भगवान पर छोड़ देता है |ज्ञानी कहता है-यह संसार मिथ्या है ,इसे छोडो”,पर भक्त कहता है यह संसार भगवान का है ,इसे भगवान की सेवा में लगाओ |

भक्त के लक्षण यह हैं -वह सभी प्राणियों में मेरे ही स्वरूप को देखता है |वह किसी से वैर नहीं करता ,वह दयालु होता है | वह मेरी कथा का कीर्तन में रहता है ,मेरे नाम का जप करता है ,मेरे मन्दिर में सेवा करता है और जो कुछ मिले उसे मेरा प्रसाद समझ कर ग्रहण करता है | ऐसे भक्त के हृदय में मैं वास करता हूँ |जैसे पवन रहित स्थान में दीपक की लौ निश्चल रहती है ,वैसे ही भक्त का चित मुझ में स्थिर हो जाता है |

ज्ञान योग और भक्ति योग का भेद और अभेद – अंत में भगवान कपिल जी दोनों का भेद स्पष्ट करते हुए अभेद भी बताते हैं –

भेद क्या है :

*ज्ञान योग बुद्धि प्रधान है ,भक्ति योग प्रेम प्रधान है |

*ज्ञान योग में वैराग्य मुख्य साधन है | भक्ति योग में भगवान के प्रति अनुराग मुख्य साधन है |

*ज्ञान योग में साधक को अपनी शक्ति से माया से मन को हटाना पड़ता है ,जो तलवार की धार पर चलने के समान है |भक्ति योग में भगवान स्वयं कृपा करके अपने भक्त को माया से पार करा देते हैं ,जैसे कोई पिता अपने छोटे बालक को गोद में लेकर नदी पार करा दे |

ज्ञान योग का फल – ब्रह्म में लीन होना ,दुखों की निवृति ,

भक्ति योग का फल- भगवान के प्रेम को प्राप्त करना ,जो मोक्ष से भी बढ़ कर है |ज्ञानी को केवल शान्ति मिलती है ,भक्त को प्रेम आनन्द मिलता है |

अभेद यह है -हे माता, वास्तव में सच्चा ज्ञानी वही जो भक्त है और सच्चा भक्त वही है जो ज्ञानी है |ज्ञान के बिना भक्ति अंधविश्वास है और भक्ति के बिना ज्ञान शुष्क है | जब ज्ञान भक्ति युक्त हो जाता है तो वही परम ज्ञान बन जाता है |भक्ति ही ज्ञान को फलवती करती है | इसलिए मेरे मत में भक्ति योग ही सर्व श्रेष्ठ है | जो पुरुष निष्काम भाव से ,बिना किसी फल की इच्छा के निरन्तर मेरी भक्ति करता है ,वह गुणों को लांघ कर मेरे धाम को प्राप्त होता है और मेरे समान एश्वर्य को प्राप्त कर लेता है ,फिर उस का पुनर्जन्म नहीं होता |

इस प्रकार कपिल भगवान ने माता देवहूति को समझाया कि हे माते,तुम भी इस भक्ति योग का ही आश्रय लो ,इसी से तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त होगी |

इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे कपिलेये द्वात्रिशोसध्याय: ||३२||

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-http://thegodweknow.com अगले सप्ताह देवहूति को तत्व ज्ञान एवं मोक्ष पद की प्राप्ति का वर्णन |

Leave a Reply