पिप्लाद मह्रिषी का आत्म चिन्तन

आत्म् चिन्तन कोई घटना नहीं,एक सतत प्रक्रिया है| जीवन के कोलाहल में जब सब कुछ बाहर की और भाग रहा होता है ,तब एक क्षण ऐसा भी आता है जब दृष्टि भीतर की और मुडती है |यही क्षण पिप्लाद का क्षण है |

पिप्लाद केवल एक नाम नहीं है| वह उस जिज्ञासा का प्रतीक है जो हर युग के मनुष्य के भीतर उठती है -मैं कौन हूँ ?यह देह क्या है ?यह प्राण क्या हैं ?और सब के पीछे जो साक्षी है वह कौन है ?

कौन थे पिप्लाद -?

वैदिक परम्परा में मह्रिषी पिप्लाद का स्थान अत्यंत ऊँचा है |कहा जाता है कि वे अथर्वा ऋषि के वंशज थे और प्रश्नोपनिषद के प्रमुख ऋषि हैं |उन के आश्रम में छह जिज्ञासु आते हैं -सुकेशा,सत्यकाम,सौर्यायणी ,आश्वलायन,भार्गव और कंवधी |वे पूछते है -सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई ? ,प्राण क्या हैं? आत्मा का स्वरूप क्या है ?

पिप्लाद उतर देने से पहले तप करते हैं ,मौन धारण करते हैं ,क्यों कि आत्मा का ज्ञान तर्क से नहीं ,अनुभव से दिया जाता है | पिप्लाद का चिन्तन उसी अनुभव की भूमि से उपजा है |

प्रथम चिन्तन -देह से भिन्नता का बोध अर्थात ज्ञान

पिप्लाद अपने भीतर देखता है और पाता है -मैं देह नहीं हूँ | बचपन की देह आज की देह एक नहीं है | बचपन में जो हाथ छोटे थे ,आज वृद्ध हैं | परन्तु जो मैं हूँ वह वही है जो बचपन में भी था | देह वदली ,मैं नहीं बदला |इस का अर्थ है देह मेरा वस्त्र है ,मैं नहीं | जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतार कर नये धारण करता है वैसे ही आत्मा इस देह रुपी वस्त्र को धारण करती है | यह बोध शोक को समाप्त करता है जब तक मनुष्य स्वयं को देह मानता है,तब तक उसे भय,जरा,मृत्यु सताती है |जिस क्षण वह जान लेता है कि मैं देह नहीं ,देह का द्रष्टा हूँ,उसी क्षण वह निर्भय हो जाता है | यही पिप्लाद का प्रथम आत्मचिंतन है-मैं शरीर नहीं,शरीर का साक्षी हूँ |

द्वितीय चिन्तन -प्राण और मन की लीला

फिर प्रश्न उठता है -यदि मैं देह नहीं ,तो क्या मैं प्राण हूँ ?

पिप्लाद देखता है कि प्राण आ रहा है,जा रहा है | सुषुप्ति में प्राण चलता है पर मुझे उस का बोध नहीं रहता ,क्रोध में प्राण तीव्र हो जाता है ,शांति में मंद |प्राण बदलता है ,इसलिए मैं प्राण भी नहीं ,मैं प्राण का द्रष्टा भी हूँ | फिर मन ,मन तो और भी चंचल है क्षण में हिमालय पर ,क्षण में बाज़ार में |मन संकल्प-विकल्प करता है ,स्मृतियों में उलझाता है ,भविष्य की कल्पना में भटकाता है |पिप्लाद ने मन को देखा -जैसे आकाश में बादल आते जाते रहते हैं ,वैसे ही चिताकाश में विचार आते जाते हैं | मैं बादल नहीं ,मैं आकाश हूँ | यह दूसरा सोपान है -मैं प्राण नहीं,मन नहीं,बुद्धि भी नहीं |यह सब मेरे कारण है ,मैं इन का स्वामी हूँ |

तृतीय चिन्तन -दो पक्षियों की कथा

मुंडकोपनिषद में एक सुन्दर रूपक है | पिप्लाद बार बार स्मरण करता है | एक वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हैं |एक पक्षी फल खा रहा है -मीठे,कडवे ,खट्टे ,दूसरा पक्षी कुछ नहीं खा रहा ,केवल देख रहा है ,साक्षी है | पहला पक्षी जीवात्मा है -जो कर्मों का फल भोक्ता है ,सुखी दुखी होता है |दूसरा पक्षी परमात्मा है -जो भीतर ही बैठा ,केवल देख रहा है ,अविचल ,शांत | पिप्लाद का आत्मचिंतन है कि जब तक हम पहले पक्षी से अपनी एकता मानते हैं ,तब तक दुःख है | जिस दिन हम दूसरे पक्षी की और मुड़ते हैं,उसी दिन शान्ति प्रारम्भ होती है | आत्मा कर्ता नहीं,भोक्ता नहीं,केवल द्रष्टा है |

चतुर्थ चिन्तन -आत्मा का स्वरूप किया है ?

तब आत्मा क्या है ? पिप्लाद कहता है-आत्मा को शब्दों में बांधा नहीं जा सकता ,पर संकेत दिया जा सकता है वह न सत है न असत |वह अणु से भी अणु है ,महान से भी महान ,वह हृदय की गुहा में स्थित है |वह न जन्म लेता है न मरता है |शस्त्र से उसे काट नहीं सकते ,अग्नि उसे जला नहीं सकती | वह कैसा है ?-वह नेति नेति है|यह नहीं ,यह भी नहीं | जो भी वस्तु तुम देख सकते हो ,वह आत्मा नहीं |आत्मा वह है जो देखने वाले को देख रहा है | पिप्लाद कहता है -जैसे नमक का ठेला पानी में घुलमिल कर सर्वत्र व्याप्त हो जाता है ,वैसे ही आत्मा इस देह में व्याप्त है | उसे अलग से खोजने कहीं जाना नहीं ,बस भीतर दुबकी लगानी है |

पंचम चिन्तन -जीवन में आत्म चिन्तन का फल

आत्म चिन्तन का अर्थ संसार से भागना नहीं | पिप्लाद् संसार से भागें नहीं ,उन्होंने आश्रम में रह कर जिज्ञासुओं को ज्ञान दिया | आत्म चिन्तन का फल है -समत्व | जिस ने आत्मा को जान लिया वह अपमान में भी विचलित नहीं होता ,सम्मान में भी उछलता नहीं ,हानी- लाभ,सुख दुःख उस के लिए समान हो जाते हैं |वह कमलवत हो जाता है -जल में रह कर जल से निर्लिप्त |

आज के युग में पिप्लाद का चिन्तन और भी प्रासंगिक है|आज के मनुष्य के पास सब कुछ है -सूचना है,सुख सुबिधा है,गति है,परन्तु शान्ति नहीं | कारण एक है -हम सब कुछ जानते हैं ,बस स्वयं को नहीं जानते | हम ने सारे विश्व का चित्र बना लिया ,पर अपने भीतर का चित्र अनदेखा रह गया | पिप्लाद पुकार कर कहता है – हे मनुष्य ,एक क्षण ठहर ,भीतर देख ,बाहर की दौड़ से कुछ नहीं मिलेगा जो आनंद तू बाहर खोज रहा है ,वह तेरे भीतर ही बैठा है |

उपसंहार –

अंत में पिप्लाद का आत्म चिन्तन प्रार्थना बन जाता है |हे आत्मन ,तू प्रकाशों का प्रकाश है ,तू ही मेरे भीतर बोलता है ,देखता है ,सुनता है |मैं तुझे भूल कर भटक गया था |आज लौट आया हूँ | यह लौटना ही आत्म चिन्तन है |यह घर वापसी है |पिप्लाद का यह चिन्तन किसी एक व्यक्ति का नहीं ,समस्त मानवता का चिन्तन है |यह हर उस मनुष्य की कथा है जो भीड़ में अकेला हो जाता है और अकेलेपन में अपने भीतर एक पूर्ण ब्रम्हाण्ड को खोज लेता है |

इति मदन लाल शर्मा

वेबसाइट-http://thegodweknow.com अगले सोमवार” जनक का तत्व चिन्तन” |

Leave a Reply