श्रीमद्भागवत स्कन्ध तृतीय:नवमोSध्याय:की कथा
ब्रह्मा जी द्वारा भगवान की स्तुति –
श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के नवम अध्याय में सृष्टि के आदि ब्रह्मा जी द्वारा भगवान विष्णु की स्तुति का अत्यंत मार्मिक वर्णन है | यह कथा हमें बताती है कि ज्ञान ,तप और अहंकार से भी ऊपर भगवान की शरणागति और भक्ति ही सर्वोच्च है |
कथा का प्रसंग – प्रलयकाल के बाद भगवान नारायण क्षीरसागर में शेषशय्या पर योगनिन्द्रा में स्थित थे ,तब उन की नाभी से एक विशाल कमल प्रकट हुआ | उसी कमल से चतुर्मुख ब्रह्मा जी का प्रादुर्भाव हुआ | ब्रह्मा जी ने जब नेत्र खोले तो चारों और जल ही जल दिखाई दिया | उन्हें न दिशा का ज्ञान था ,न अपने उत्पति का कारण समझ आया | वे सोचने लगे -‘मैं कौन हूँ ?यह कमल कहाँ से आया ? मुझे किस ने उत्पन्न किया ? मेरा कर्तव्य क्या है ?
जिज्ञासा से प्रेरित हो कर भगवान् ने उन्हें अपने चतुर्भुज रूप का दर्शन दिया |भगवान का वह रूप अत्यंत मनोहर था -श्याम वर्ण,पीताम्बरधारी ,वनमाला,कौस्तुममणि ,शंख,चक्र,गदा -पद्म से सुशोभित | उन के चरण कमलों से गंगा जी प्रवाहित हो रही थी | भगवान को देख कर ब्रह्मा जी का हृदय आनन्द से भर गया ,उन का रोम रोम पुलकित हो उठा |
ब्रह्मा की स्तुति –
ब्रह्मा जी ने हाथ जोड़ कर अत्यंत विनम्र भाव से भगवान की स्तुति प्रारम्भ की | इस स्तुति को ‘ब्रह्म स्तुति’ या ‘ गर्भ स्तुति ‘भी कहा जाता है :
१.भगवान का स्वरूप -हे प्रभो,आप एक होते हुए भी अनेक रूपों में प्रकट हैं |यह सम्पूर्ण जगत आप के ही संकल्प से उत्पन्न हुआ है और आप ही इस के कारण भी हैं और कार्य भी ,जैसे मिट्टी से घडा बनता है ,घड़े में मिट्टी ही रहती है ,वैसे ही आप इस सृष्टि के उपादान और निमित दोनों कारण हैं |
2. माया का रहस्य – हे नाथ, आप की माया बड़ी प्रबल है | बड़े बड़े ज्ञानी भी इस से मोहित हो जाते हैं | मैं भी आप के माया जाल मे पड़ कर ‘ मैं ब्रह्मा हूँ ‘मैं सृष्टि कर्ता हूँ,इस अभिमान में डूब गया था |आप की कृपा के बिना जीव आप की माया को पार नहीं कर सकता |
3. भक्त वत्सलता – प्रभो,जो लोग अपने वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए भी आप के चरणों का स्मरण नहीं करते ,उन का जीवन व्यर्थ है |परन्तु जो पापी से पापी व्यक्ति भी अन्त समय में आप का नाम ले लेता है ,वह तुरंत मुक्त हो जाता है | आप इतने दयालु हैं कि अपने भक्तों के लिए आप स्वयं अवतार ले लेते हैं |
४. सृष्टि का प्रयोजन – हे अच्युत , आप ने मुझे सृष्टि रचने के लिए उत्पन्न किया है | परन्तु मैं बिना आप की शक्ति के तिनका भी नहीं हिला सकता | अत: आप मुझे ऐसी बुद्धि और शक्ति प्रदान करें जिस से मैं आप की आज्ञा के अनुसार ठीक ठीक सृष्टि की रचना कर सकूं और कहीं अभिमान न आ जाये |
५. शरणागति -भगवन ,मैं आप के चरणों में पूर्ण शरणागत हूँ ,जैसे बच्चा माता की गोद में निर्भय रहता है वैसे ही मैं आप की शरण में हूँ | आप ही मेरे गुरु,पिता,माता और सर्वस्व हैं | मुझे अपने भक्तों की संगति दीजिए जिस से मैं सदा आप का गुणगान करता रहूँ |
ब्रह्मा जी की यह स्तुति सुन कर भगवान बहुत प्रसन्न हुए | उन्होंने मेघ के समान गम्भीर बाणी में कहा- हे ब्रह्मन , तुम्हारा तप और स्तुति सफल हुई | मैं तुम से बहुत प्रसन्न हूँ | तुम मेरी माया से मोहित मत होना | अभिमान त्याग कर मेरी आज्ञा से सृष्टि की रचना करो | मैं तुम्हारे हृदय में स्थित हो कर तुम्हें बुद्धि देता रहूँगा || जो व्यक्ति प्रात:काल उठ कर तुम्हारी इस स्तुति का पाठ करेगा;उस की बुद्धि निर्मल होगी और उसे मेरी भक्ति प्राप्त होगी|
कथा का आध्यात्मिक संदेश –
१. अहंकार का त्याग – ब्रह्मा जी जैसे सृष्टि कर्ता को भी जब अहंकार हुआ तो वे दिग्भ्रमित हो गये| भगवान की कृपा से ही अहंकार मिटता है|
2. तप और भक्ति का महत्व – केवल ज्ञान या पद से कुछ नहीं होता | भगवान के दर्शन तप और शरणागति से ही सम्भव है |
3. भगवान की सर्वोपरिता -सृष्टि ,स्थिति ,प्रलय सब भगवान की शक्ति से हो होते हैं |जीव निमित मात्र है|
४.स्तुति का फल- भगवान ने स्वयं कहा कि इस स्तुति के पाठ से बुद्धि शुद्ध होती है और भक्ति बढती है |
उपसंहार –
इस प्रकार भगवान से वरदान पा कर ब्रह्मा जी का हृदय गदगद हो गया | भगवान अंतर्ध्यान हो गये और ब्रह्मा जी ने सृष्टि रचना का कार्य प्रारम्भ किया |
यह अध्याय हमें सिखाता है कि चाहे हम कितने भी बड़े पद पर हों ,भगवान के सामने हमें दीन भाव से ही रहना चाहिए| मैं करने वाला हूँ यह भाव ही बंधन है और भगवान कराने वाले हैं ,यह भाव ही मुक्ति है | ब्रह्मा जी की यह स्तुति आज भी भक्तों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है | कलियुग में तो भगवान का नाम स्मरण ही सब से बड़ा साधन है |
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां तृतीयस्कन्धे नवमोSध्याय: ||
लेखक-मदन लाल शर्मा
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