इच्छा से मुक्ति ही सच्ची मुक्ति है अष्टावक्र प्रकरण -11

श्लोक- भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी | निर्विकारो गतक्लेश:सूखेनैवोपशाम्यति ||१||

सामान्य अर्थ -जो निश्चय कर लेता है कि संसार में उत्पति और विनाश ,होना और न होना ,यह सारे विकार स्वभाव से ही हो रहे हैं ,प्रकृति के नियम से हो रहे हैं ,वह पुरुष निर्विकार हो जाता है,उस के सारे क्लेश मिट जाते हैं और वह अनायास ही शान्ति को प्राप्त हो जाता है |

विवेचना –

इस प्रथम श्लोक में अष्टावक्र ज्ञान की पहली सीधी बताते हैं -द्रष्टा भाव – जगत में प्रतिक्षण कुछ बनता है ,कुछ विगडता है ,लोग आते है ,जाते हैं ,हम इसे अपना राग द्वेष जोड़ के देखते हैं ,इसलिए दुखी होते हैं | ज्ञानी जानता है कि वह भाव-अभाव मेरा किया हुआ नहीं ,स्वभाव का खेल है |जैसे समुद्र में लहरें उठाना-गिरना समुद्र का स्वभाव है,वैसे सृष्टि में परिवर्तन प्रकृति का स्वभाव है |

जब यह दृढ निश्चय होता है ,तब व्यक्ति कर्तापन से मुक्त हो जाता है | वह विकारों को रोकने की चेष्टा नहीं करता | यहीं से क्लेश -अविद्या,अस्मिता ,राग द्वेष और अभिनिवेश -समाप्त होते हैं |निर्विकार का अर्थ जड होना नहीं ,बल्कि भीतर अचल रहना है |बाहर क्रिया चलती रहती है ,भीतर समता बनी रहती है ऐसे स्थिति में शान्ति के लिए अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता ,वह सहज ही प्राप्त हो जाती है | यही सहज समाधि है |

अष्टावक्र कहते है -हे राजन जो अपने स्वभाव से उत्पन्न भाव विकारों पर नियन्त्रण पा लेता है वह निर्विकार हो कर अपने चित पर नियन्त्रण पा कर कष्ट रहित और परम शांत हो जाता है |

श्लोक-ईश्वर:सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी | अन्तर्गलितसर्वाश: शान्त: क्वापि न सज्जते ||2||

सामान्य अर्थ -जो यह निश्चय कर लेता है कि ईश्वर ही सब का निर्माता है ,उस के सिबा दूसरा कोई नहीं है ,उस की समस्त आशाएं भीतर ही समाप्त हो जाती हैं |वह शांत हो जाता है और कहीं भी आसक्त नहीं होता |

विवेचना-

पहले श्लोक में स्वभाव की बात थी ,दूसरे में ईश्वर -निश्चय की |दोनों ही सत्य के दो नाम हैं |जब साधक देखता है कि इस विराट सृष्टि का एक ही चेतन आधार है ,वही सब बना रहा है,चला रहा है,तब उस का अहंकार समाप्त जाता है -“मैं कर्ता हूँ” यह भ्रम टूट जाता है | जब कर्ता ईश्वर है ,तो फल की चिंता भी उसी की है |इस के भीतर की वासना -जाल रुपी आशाएं स्वत: समाप्त हो जाते हैं ,आशा ही बंधन है ,आशा ही संसार को खींचती है |अन्तर्गलित सर्वाश: का अर्थ है -जिस के अन्दर आशा का बीज ही पिघल गया हो

ऐसा पुरुष शांत हो जाता है |वह संसार में रहता है,पर लिप्त नहीं होता |क्वापि न सज्जते -वह न धन में ,न पद में ,न मान अपमान में फंसता है ,क्यों कि जब सब कुछ उसी का है ,तो फिर किस से राग और किस से द्वेष ? यह अनासक्ति वैराग्य का निषेध नहीं,बल्कि ज्ञान जनित सहज मुक्ति है |यही जीवन मुक्ति का लक्षण है | ज्ञानी पुरुष अपने हृदय में निश्चय कर लेता है कि सृष्टि का सृजन हार केवल एक ही ईश्वर है इसलिए वह निर्विकार हो कर परम शांत रहता है |

श्लोक- आपद:संपद:काले दैवादेवेति निश्चयी | तृप्त स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वांछति न शोचति || 3||

सामान्य अर्थ – जो यह निश्चय कर लेता है कि आपति और सम्पति दोनों समय पर दैवयोग से ही आती जाती हैं ,वह पुरुष सदा तृप्त और स्वस्थ इन्द्रियों वाला रहता है |वह न किसी वस्तु की इच्छा करता है ,न शोक करता है |

विवेचना –

यह श्लोक जीवन के व्यबहारिक उहापोह पर ज्ञान का प्रकाश डालता है |मनुष्य सुख में फूलता है ,और दुःख में सिकुड़ता है ,क्यों कि वह इन्हें अपने पुरुषार्थ का ही फल मानता है | अष्टावक्र कहते हैं -आपदा और सम्पदा दोनों काल प्रेरित और दैवाधीन हैं |प्रारब्ध ,प्रकृति और काल के संयोग से आती है | यह निश्चय होते ही तृष्णा शांत हो जाती है |ज्ञानी तृप्त हो जाता है ,तृप्ति का अर्थ-जो है,उस में पूर्णता का अनुभव ,उस की इन्द्रियां स्वस्थ हो जाती हैं ,अर्थात बाहर की और भागने के बजाए अपने में स्थित हो जाती हैं| वह इन्द्रियों का दास नहीं ,स्वामी बन जाता है |

न वांछति न शोचति -यही गीता का स्थित प्रज्ञ लक्षण है |जब लाभ हुआ तो अहंकार नहीं,हानि हुई तो विषाद नहीं,यह उदासीनता नहीं,जो गया है वह फिर किसी रूप में आएगा |ऐसे में इच्छा और शोक दोनों व्यर्थ हो जाते हैं |यही समस्त योग है जो वृद्धावस्था में विशेष रूप से शांति देता है | अष्टावक्र कहते हैं कि जो यह जान लेता है कि संकट और सम्पति देव प्रदत हैं इन का समय निश्चित होता है वह हमेशा संतुष्ट रहता है और परम शांत रहता है |

श्लोक-सुखदु:खे जन्ममृत्यु दैवादेवेति निश्चयी | साध्यादर्शी निरायास: कुर्वन्नपि न लिप्यते ||४||

सामान्य अर्थ – जो निश्चय कर लेता है कि सुख दुःख और जन्म मृत्यु भी दैवयोग से ही है,वह साध्य को देखने वाला ,प्रयत्न रहित हो जाता है | वह कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता |

विवेचना –

तीसरे श्लोक में संपति-आपति की बात थी ,यह जीवन के सब से बड़े द्वन्द्ध-सुख दुःख और जन्म मृत्यु को लिया गया है |सामान्य मनुष्य सुख को पकड़ना चाहता है और दुःख ,मृत्यु से भागना चाहता है |इसी द्वन्द्ध में सारा जीवन तनाव में बीतता है |ज्ञानी देखता है कि सुख दुःख मन की अवस्थाएं है और मृत्यु शरीर की अवस्थाये है और दोनों ही दैवाधीन हैं ,मेरे स्वरूप आत्मा से इन का कोई सम्बन्ध नहीं है |आत्मा तो इन का साक्षी मात्र है |

इस निश्चय से दो फल होते हैं |पहला-साध्या दर्शी -वह जो साधन में नहीं,साध्य अर्थात आत्मा में स्थित हो जाता है | दूसरा -निरा यास:-जीवन में आयास,तनाव,होड़ समाप्त हो जाती है | वह कर्म छोड़ता नहीं ,कुर्वन्नपि -कर्म करता हुआ भी न लिप्यते -लिप्त नहीं होता है |जैसे कमल जल में रह कर भी जल से अलग रहता है |यह अकर्मण्यता का उपदेश नहीं ,बल्कि कर्ता -भाव से मुक्त कर्मयोग है | कर्ता ईश्वर है ,मैं द्रष्टा हूँ-इस ज्ञान से कर्म बंधन नहीं बनता,बल्कि लीला बन जाता है | अष्टावक्र कहते हैं- हे राजन , फल प्राप्ति समय और देव की इच्छा पर निर्भर है ,समय से पूर्व और भाग्य से अधिक नहीं मिलता |इसलिए कर्म करते हुए और निर्लिप्त रह कर स्थिर मन हो जाओ |

श्लोक – चिन्तया जायेते दुःख नान्यथेहेति निश्चयी | त्या हीन:सुखी शांत: सर्वत्र गलितस्पृह: || ५||

सामान्य अर्थ – ज्ञानीपुरुष इस निश्चय में स्थित होता है कि इस संसार में दुःख का एक मात्र कारण चिंता ही है दूसरा कोई कारण नहीं है |इसी निश्चय से चिंता का त्याग कर देने पर वह सुखी और शांत , सभी इच्छाओं से रहित हो जाता है |

विवेचना आत्मचिंतन –

यह श्लोक हमारे जीवन की सब से वडी चिंता को मिटाता है ,हम सोचते हैं कि दुःख का कारण पैसे हैं,,परिवार है ,शरीर है लेकिन इन सब से दुःख नहीं मिलता ,अष्टावक्र जी कहते हैं दुःख इन से नहीं आता दुःख का कारण मनुष्य के भीतर की चिंता से पैदा होता है|घटना तो घटती है और चली भी जाती है |लेकिन हम बार बार उस के बारे में सोचते रहते हैं उस की चिंता कर लेते हैं

चिंता क्या है ? जो अभी है ही नहीं उस के बारे में बार बार सोचना ही चिंता है | कल क्या होगा,लोग क्या कहेंगे ,मेरा क्या होगा ,मैं क्या करूंगा आदि आदि के बारे में अपने मन में कल्पनाओं का जाल बुन लेना जिन कल्पनाओं का कोई आस्तित्व है ही नहीं | जब यह मन में विचार पक्का हो जाता है कि दुःख का कारण कहीं बाहर नहीं है यह केवल हमारे अन्दर अपनी ही चिंता है ,तो बड़ा परिवर्तन होता है | हम बाहर को ठीक करने की चिंता छोड़ देते हैं |

चिंता हीन होते ही मन स्वभाव से ही शांत हो जाता है ,शान्ति कहीं से लानी नहीं पडती ,,वह हमारा मूल स्वभाव है |जैसे तालाव में कंकड़ फेंकना बंद करो तो पानी अपने आप साफ हो जाता है |तब व्यक्ति सब जगह गलित स्पृह: हो जाता है -उस की मांगें मिट जाति हैं | वह हर जगह सुखी रहता है क्यों कि उस का सुख अब परिस्थिति पर निर्भर नहीं रहा |यह आत्म चिन्तन ही सच्ची मुक्ति का पहला कदम है |

श्लोक- नाहं देहो न में देहो बोधोSहमिति निश्चयी | कैवल्यं इव संप्राप्तो न समरत्यकृतं कृतम ||६||

सामान्य अर्थ – मैं शरीर नहीं हूँ,यह शरीर मेरा भी नहीं है ,मैं तो केवल शुद्ध ज्ञान स्वरूप हूँ -ऐसा दृढ निश्चय करने वाला पुरुष कैवल्य अर्थात मोक्ष को प्राप्त हुआ सा हो जाता है |वह फिर किए और न किए कर्मों को याद भी नहीं करता |

विवेचना आत्मचिंतन –

पिछले श्लोक में चिंता को दुःख का कारण बताया ,इस श्लोक में उस का मूल कारण बताया-देह के साथ तादात्म्य | हम हमेशा दो भूलें करते हैं -मैं शरीर हूँ और यह शरीर मेरा है |इसी से सारा व्यबहार चलता है मेरे लिए अच्छा क्या है बुरा क्या है मान क्या है और अपमान क्या है | अष्टावक्र जी कहते हैं ,निश्चय कर लो -नाहं देह:| मैं यह हाड मांस का पुतला नहीं हूँ और न में देह:-यह शरीर मेरी सम्पति भी नहीं है जैसे कपड़ा मेरा है ,पर मैं कपड़ा नहीं हूँ |तो फिर मैं क्या हूँ ? वोधोSहमं -मैं केवल जानने वाला ,साक्षी चेतना हूँ |

जब यह निश्चय बुद्धि से उतर कर अनुभव बन जाता है ,तो व्यक्ति जीते जी कैवल्य जैसा अनुभव करता है |कैवल्य यानी केवल होना ,अकेला पन नहीं ,बल्कि पूर्णता है | इस स्थिति में एक पूर्ण स्वतन्त्रता आती है -न समरति अकृतं कृतम यानी अपने किये और न किये कर्मों का हिसाब नहीं रखता |हम ने क्या अच्छा किया क्या बुरा नहीं किया -यह बोझ अहंकार ही ढोता है | साक्षी भाव से रहने वाला जानता है कि कर्म शरीर और मन से हुए,मुझ ज्ञान स्वरूप से नहीं हुए | इसलिए वह अतीत के पश्चाताप और भविष्य की योजना -दोनों से मुक्त हो कर वर्तमान में शांत रहता है |यही सच्चा आत्मचिंतन है |

श्लोक – आब्रह्मस्तंबपर्यन्त अह्मेवेति निश्चयी | निर्विकल्प:शुची: शांत:प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृत: ||7||

सामान्य अर्थ – ब्रह्म से लेकर तिनके तक सब कुछ मैं ही हूँ -ऐसा दृढ निश्चय करने वाला व्यक्ति विकल्पों से रहित ,पवित्र,शांत और प्राप्त-अप्राप्त की चिता से मुक्त हो जाता है |

विवेचना आत्मचिंतन –

पिछले श्लोक में ‘मैं बोध हूँ ‘ का निश्चय था ,यहाँ अष्टावक्र जी उस निश्चय को विराट बना देते हैं ‘|अहमेव ‘-केवल मैं ही हूँ |ब्रह्मा जो सब से श्रेष्ठ माना जाता है और स्तंब जो सब से तुच्छ तिनका है ,दोनों में वही एक चेतना व्याप्त है,और वही मैं हूँ |जब तक हम अपनों को अलग अलग व्यक्ति मानते हैं तब तक तुलना चलती है -मैं बड़ा,वो छोटा ,इसी से राग द्वेष बनता है |पर जब यह ज्ञान होता है कि सब में एक ही आत्मा है तो भेद मिट जाता है |

ऐसे ज्ञानी के तीन लक्षण होते हैं -निर्विकल्प ,शुची,शांत |निर्विकल्प – यानी उस के मन में यह अच्छा यह बुरा ,का उहापोह समाप्त हो जाता है | शुची-यानी अन्दर बाहर की पवित्रता ,क्यो कि अब कोई मेल,ईर्ष्या ,द्वेष-ठहरता नहीं और शांत यानि अचल शान्ति | सब से बड़ी बात -प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृत: ,जो मिल गया ,उस की पकड़ नहीं ,जो नहीं मिला उस के पीछे भागना नहीं |वह जानता है कि उस का स्वरूप ही सब कुछ है ,उसे बाहर से क्या पाना है |यह निश्चय ही जीवन में निर्भयता लाता है |आत्म् चिन्तन में यही विराट भावना हमें छोटी छोटी चिंताओं से उपर उठाती है | ज्ञानी लोग ब्रह्म से लेकर तिनके तक में स्वयं को पाता है |

श्लोक – नानाश्चर्यमिदं विश्वं न किचिदिती निश्चयी | निर्वासन: स्फूर्तिमात्रो न किंचिदिव शाम्यति ||८||

सामान्य अर्थ – यह अनेक आश्चर्यों से भरा हुआ जगत वास्तव में कुछ भी नहीं है ऐसा निश्चय करने वाला पुरुष वासनाओं से रहित हो कर केवल स्फुरण मात्र -शुद्ध चेतना मात्र रह जाता है और शांत हो जाता है मानो कुछ है ही नहीं |

विवेचना आत्म चिन्तन –

यह श्लोक वैराग्य की पराकाष्ठा है |संसार बड़ा रंग बिरंगा आश्चर्य जनक लगता है – नए नये रूप,नई नई घटनाएँ ,हम इसी आश्चर्य में उलझ जाते हैं |अष्टावक्र जी कहते हैं -ज्ञानी देखता है कि यह सब आश्चर्य ‘न किंचित’- वास्तव में कुछ भी नहीं है , केवल सपने जैसा है |जब तक हम संसार को सत्य मानते हैं ,वासना बनी रहती है – यह पा लूँ,वह देख लूँ | पर जब निश्चय हो गया कि सब कुछ पानी के बुलबुले जैसा है ,क्षण भंगुर है तब निर्वासन: हो जाता है – वासना अपने आप मिट जाती है ,उसे मिटाना नहीं पड़ता |

तब क्या बचता है ? स्फूर्तिमात्र: | केवल स्फुरण-चेतना का हल्का सा कंपन,”मैं हूँ” की सहज अनुभूति,न् कोई विचार ,न कोई इच्छा ,बस होना मात्र |और इसी में शाम्यति -परम शान्ति को प्राप्त होना है ,न किंचिदिवं -जैसे कुछ हुआ ही नहीं,इतना स्वभाविक आत्म चिन्तन का यही फल है \संसार को मिथ्या जानना निराशा नहीं,बल्कि मुक्ति है | जब विश्व को कुछ नहीं जान लिया ,तब आत्मा ही सब कुछ के रूप में चमकती है |यही अष्टावक्र का सार है |

नोट-यह विवेचना AI की सहायता से श्लोक के अर्थ को समझने और मेरे मदन लाल शर्मा के आत्म चिन्तन पर आधारित है |

वेबसाइट-http://thegodweknow.com अगले सप्ताह प्रकरण (12)

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