मनुष्य योनी को प्राप्त हुए जीव की गति का वर्णन

प्रस्तावना –

श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध को विद्वानों ने सांख्य और भक्ति का संगम कहा है |इस में भगवान कपिल जी ने अपनी माता देवहूति को तत्व ज्ञान का उपदेश दिया है | ३१ वां अध्याय इस स्कन्ध के सब से हृदय-विदारक और वैराग्य उत्पाद्क अध्यायों में से एक है |इस में मनुष्य के जीवन का वह सत्य बताया गया है जिसे हम सब लोग भूल चुके हैं | हम संसार के सुखों में लिप्त रहते हैं ,परन्तु हमें याद नहीं कि हम ने माँ के गर्भ में कितना कष्ट भोगा था और वहां भगवान से क्या प्रतिज्ञा की थी |

इस अध्याय में भगवान कपिल जी कहते हैं -हे माता,जीव अपने कर्मों के अनुसार कैसे एक शरीर से दुसरे में जाता है और माँ के गर्भ में उसे किन किन भयंकर यातनाओं को सहना पड़ता है ,इस का वर्णन मैं तुम्हें विस्तार से सुनाता हूँ |

१. जीव की कर्म गति और गर्भ प्रवेश –

कपिल जी कहते हैं कि इस संसार में जीव अनादि काल से अपने पुन्य और पाप कर्मों के बंधन में बंधा हुआ है |मृत्यु के समय जैसा उस का चिन्तन होता है ,जैसी उस की वासना होती है वैसा ही उसे अगला शरीर मिलता है | जब जीव के पाप और पुन्य दोनों का फल भोगना शेष रह जाता है ,तब उसे पुन: मनुष्य योनी प्राप्त होती है |

पुरुष जब स्त्री के साथ सहवास करता है,तब पिता के शरीर का वीर्यकण * -शुक्राणु ,माता के रज के साथ मिलता है |एक रात्री में वह कलल के रूप में ,पांच रात्री में वुद्धद के रूप में ,दस दिन में कर्कन्धु फल के समान कुछ कठोर हो जाता है |उस के बाद वह मांसपेशी या अंडाकार पिंड बन जाता है |यह जीव का प्रथम भौतिक आधार बनता है |परमात्मा की अध्यक्षता में प्रकृति ही इस पिंड को विकसित करती है |

यहाँ जीव का प्रवेश होता है |जीव सूक्ष्म है,उसे कोई देख नहीं सकता ,परन्तु वह अपने पूर्व कर्मों के संस्कार के साथ उस एक बूँद में प्रवेश कर जाती है जैसे ही जीव प्रवेश करता है ,उसी क्षण से चेतना उस पिंड में आ जाती है | यद्यपि ,वह अत्यंत अव्यक्त अवस्था में होती है |

2.-गर्भ में महीने-दर-महीने विकास और भयंकर यातना –

प्रथम मास – सिर बनता है ,जीव को असहय पीड़ा होती है ,परन्तु वह जडवत पड़ा रहता है |

द्वितीय मास -हाथ,पैर आदि अंगों के बिभाग बनते हैं ,नसें,हड्डियाँ ,त्वचा और लिंग का निर्माण होता है |

तीन मास में-सात धातुये त्वचा,मास ,रूधिर,मेदा,अस्थि,मज्जा और शुक्राणु बनते हैं |पांच तत्वों से शरीर पुष्ट होता है |इसी मास में जीव के मन में अपने पिछले सैकड़ों जन्मों के कर्म याद आते हैं | उसे दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है ,वह अपने पिछले जन्मों को देखता है |यह स्मृति उस के लिए अत्यंत कष्टकारी होती है |

चतुर्थ मास -भूख,प्यास का बोध होने लगता है |माता जो भी खाती है उस से गर्भ में स्थित बालक का पोषण होता है |

पंचम मास में – जीव का चित चेतन हो जाता है ,उसे भूख प्यास सताती है |

षष्ठ मास में -वह गर्भ की झीली से ढका हुआ ,माता की आँतों के दाहिनी कोख में घूमने लगता है | माता जो अन्न खाती है ,उसी के रस से उस का पोषण होता है |वह उसी विष्ठा -मूत्र के गद्ढ़े में पड़ा रहता है ,जहाँ सब प्रकार के कीड़े पैदा होते हैं |वे कोमल कीड़े उस के अंगों को काटते हैं ,वह बार बार मूर्छित हो जाता है ,माता के खाये हुए तीखे,कडवे,गर्म,नमकीन,खट्टे पदार्थों के स्पर्श से उस के सर्वांग में पीड़ा होती है |वह जीव वहां मल मूत्र के कुएं में पड़ा रहता है |

कपिल देव जी इस का सजीव चित्रण करते हैं-माता का गर्भ एक थैली के समान है ,जो आँतों और झिलियों से बंधी हुई है |उस में जीव का सिर नीचे की और पैर उपर किये हुए कुबड़े के समान टेढ़ा मेढा पड़ा रहता है |वह अपने अन्गोंको हिला भी नहीं सकता ,जैसे तोते को पिंजरे में बंद कर दिया गया हो |यदि ईश्वर की कृपा से कभी थोड़ी वायु चलती है ,जिस से उसे थोड़ा सुख मिलता है ,तो क्षण भर में वह फिर अचेत हो जाता है |

सप्तम मास में – ज्ञान की शक्ति विशेष रूप से जाग्रत होती है ,उसे सातवें महीने में पूर्व जन्मों का ज्ञान स्पष्ट हो जाता है |वह कभी अपनी इस दुर्दशा पर रोता है |वह सोचता है -मैं किस गहरे कुण्ड में गिर गया हूँ |

3. गर्भस्थ जीव की दिव्य प्रार्थना -गर्भ स्तुति

जब जीव को सातवें मास ज्ञान होता है ,तब वह हाथ जोड़ कर अत्यंत दीन भाव से भगवान की स्तुति करता है |यह भागवत का सब से करूंण और पवित्र प्रसंग है |जीव कहता है –

हे नाथ,मैं बड़ा अधम हूँ ,परन्तु आप अपने अधमोद्धारण विरूद के कारण मेरी रक्षा कीजिये |मैं इस मल मूत्र और रूधिर के कुण्ड में पड़ा हूँ ,जहाँ मुझे जलती हुई अग्नि के समान कष्ट हो रहा है | मैं यहाँ से बाहर निकलना चाहता हूँ | हे कृपासिधु ,इस गर्भ से मुझे कब छुटकारा मिलेगा | हे भगवान, आप के भय से ही यह माया ,यह काल ,यह संसार चलता है |यह माता का गर्भ भी आप के ही द्वारा बनाया गया यंत्र है |मैंने पूर्व जन्मो में बड़े बड़े पाप किये हैं ,मैंने पशुओं को सताया ,दूसरों का धन हरण किया ,पर स्त्री गमन किया ,इसलिए आज मुझे यह योनी मिली है |

मैं यहाँ इस अंधकूप में पड़ा हुआ ,आप की शरण में हूँ,आप की माया से मोहित होकर मैंने कभी आप को याद नहीं किया ,मैं धन,पुत्र,स्त्री के मोह में पड़ा रहा ,परन्तु अब आप ने कृपा करके मुझे इस गर्भ से ज्ञान दिया है | हे प्रभु, मैं वादा करता हूँ कि इस गर्भ से बाहर निकलते ही मै आप का भजन करूंगा |मैं फिर इस संसार के माया जाल में नही फसुंगा | मैं आप के चरणों में मन लगाउंगा ताकि मुझे फिर इस गर्भ के कष्ट में न आना पड़े| मैं आप का अनन्य भक्त बनूंगा | मुझे इस नरक से निकालो | इस प्रकार वह जीव दसवे महीने तक भगवान का स्मरण करता रहता है और जन्म लेने के लिए छटपटाता रहता है |

४, जन्म का महाकष्ट और माया का पर्दा –

कपिल देव जी का कहते हैं -हे माता,जब प्रसव का समय आता है ,तब प्रसूति वायु जीव को नीचे की और धकेलती है |वह वायु बड़ी बलवती होती है |उस वायु के धक्के से जीव का सिर नीचे की और हो जाता है |वह बाहर निकलना नहीं चाहता ,क्यों की उसे पता है कि बाहर माया है |परन्तु वायु उसे बलपूर्वक बाहर निकाल देती है | जन्म के समय इतनी पीड़ा होती है कि उस का दम घुटने लगता है | वह रक्त से लथपथ ,विष्ठा से सन्ना हुआ ,जैसे कोई कीड़ा बाहर निकलता है | बाहर आते ही वह जोर जोर से रोने लगता है |उस के रोने का कारण केवल सांस लेना नहीं ,बल्कि ज्ञान का नाश होता है | जैसे ही बाहर आता है ,भगवान की माया उस पर छा जाती है |माया के स्पर्श से उस के सारे पूर्व जन्मों का ज्ञान नष्ट हो जाता है |वह गर्भ में की हुई सारी प्रतिज्ञाएँ भूल जाता है | वह फिर से अबोध बालक बन जाता है |पहले वह रोता है ,फिर धीरे धीरे उसे गोद में लिया जाता है |वह अपने अंगों को भी नहीं पहचानता ,उसे दूसरों के सहारे पलना पड़ता है |उसे पता ही नहीं चलता कि वह कहाँ है |

५-बाल्यावस्था से लेकर मृत्यु तक फिर वही माया चक्र

बालक होने पर वह अपनी शैशव अवस्था में दूसरों की गोद में मल मूत्र में पड़ा रहता है |उसे खुजली होती है ,वह खुजला भी नहीं सकता |युवा होने पर वह काम क्रोध लोभ में फंस जाता है | वह धन कमाने के लिए झूठ बोलता है ,हिंसा करता है |वह सोचता है कि यह घर,यह स्त्री,यह पुत्र मेरे हैं | वह जीवन भर इन्हीं के लिए पाप करता है और अंत में फिर मृत्यु को प्राप्त होता है ,फिर वही गर्भ ,वही कष्ट ,वही चक्र चलता रहता है |

६, – इस कथा का आध्यात्मिक सार और उपदेश

हे माता देवहूति, -कपिल भगवान ने कहा ,इस प्रकार जीव अनंत काल से जन्म-मरण के चक्र में घूम रहा है |इस चक्र से छूटने का एकमात्र उपाय है-भक्ति योग | मनुष्य को चाहिए कि वह गर्भ के इस कष्ट को याद रखे |उसे याद रहना चाहिए कि उस ने गर्भ में भगवान से क्या वादा किया था ,यदि मनुष्य हर समय यह स्मरण रखे कि यह संसार दुखालय है और गर्भ का कष्ट सबसे बड़ा कष्ट है तो वह कभी पाप नहीं करेगा |

इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह साधू संग करे,भगवान की कथा सुने,भगवान का नाम जपे,भगवान के चरणों में प्रीति ही इस भवसागर से पार होने की एक मात्र नौका है |जो मनुष्य भगवान के चरणों का आश्रय लेता है ,उसे फिर् माता के गर्भ में नहीं आना पड़ता , वह वैकुण्ठ को प्राप्त होता है |

यह ३१ वां अध्याय ह्में वैराग्य सिखाता है |यह हमें बताता है कि हमारा यह सुन्दर शरीर ,जिस पर हमें इतना घमंड है ,वास्तव में मल मूत्र और रक्त का पिंड है | इस का जन्म ही अत्यंत घृणित स्थान से हुआ है |अत: इस शरीर से मोह न करके ,इस शरीर के द्वारा भगवान की प्राप्ति करनी चाहिए | जो भी भक्त श्रद्धा से इस गर्भ स्तुति का पाठ करता है ,उस की बुद्धि शुद्ध हो जाती है ,उसे वैराग्य प्राप्त होता है और वह भगवान की भक्ति में दृढ हो जाता है |

*वीर्यकण (sperm) और genes का सम्बन्ध -genes इंसानी शरीर की सब से छोटी ब्लूप्रिंट या कोड है जो यह तय करते हैं कि हमारा शरीर कैसा दिखेगा और कैसे काम करेगा | जब पुरुष के शरीर में वीर्यकण (शक्राणु) बनते हैं तो वे अपने साथ यही genes ले कर चलते हैं ,ताकि आने वाले बच्चे पिता के गुण जैसे आँखों का रंग,चेहरे की बनावट ट्रांसफर हो सके | यह त्वचा,रक्त और वीर्य कणों के अंदर भी सुरक्षित रहते हैं | इन का ६ से ८ पीढ़ियों तक के पूर्वजों का सीधा असर दिखता है | लडकी अपने पिता के परिवार के ५०% genes लेकर दूसरे परिवार में जाती है |वह भी दो परिवारों को जोडती है | अर्थात लडकी के परिवार के पूर्वजों के genes लडके वालों के घर जन्म लेंगे | जो बच्चा पैदा होता है वह उसी के परिवार का कोई पूर्वज होता है | जैसे उम्र बढती है पुराने लोग नजर आना शुरू हो जाते हैं \यही पुनर्जन्म है ,वह बजुर्ग अपने कर्मों का फल भुक्त् ने आ जाता है | यही कर्म गति है आज जो आप कर रहे है कल आप स्वयं उस का फल भोगोगे |उपरोक्त कपिल जी का वीर्य् कण से यही आशय है |

इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां तृतीय स्कन्धे कापिलेयोपाख्याने जीवगतिर्नामैकत्रिशोSध्याय:||३१||

श्रीमद्भागवत महापुराण तृतीय स्कन्ध ३१ वें अध्याय की सरल कथा |

संकलन करता /भावार्थ कार -मदन लाल शर्मा ,आधार श्रीमद्भागवत महापुराण -कपिल देवहूति संवाद |

“नोट- यह कथा श्रीमद्भागवत के मूल श्लोकों के आधार पर सरल भाषा में प्रस्तुत की गई है |”

वेबसाइट -http://thegodweknow.com अगले मंगल वार ३२ वां अध्याय देखते रहिये |

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