ऋषि उदालक आरुणी का आत्म-चिन्तन

एक वैदिक ऋषि की अंत यात्रा

प्रस्तावना- भारतीय वैदिक परम्परा में ऋषि केवल मन्त्र द्रष्टा ही नहीं,बल्कि जीवन और जगत के गूढ़तम रहस्यों के अन्वेषक भी थे |ऐसे ही एक महान ऋषि थे उदालक आरुणी | छन्दोग्य उपनिषद ,बृहदारन्यक और अनेक पुराणों में जिन का उल्लेख अत्यंत श्रद्धा और गौरव के साथ किया गया है ,वे केवल एक विद्वान ब्राह्मण नहीं ,बल्कि आत्म जिज्ञासा के मूर्तिमान स्वरूप थे |

उदालक नाम का अर्थ है -उपर उठ गया हो जिस ने ऊर्ध्वगमन किया हो और आरुणी -अर्थात अरुण गोत्र में उत्पन्न |परन्तु उन का जीवन सिद्ध करता है कि उन्होंने ज्ञान के आकाश में सचमुच ऊर्ध्वगमन किया था |उन का आत्मचिंतन किसी पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं था | वह जीवन के प्रत्येक अनुभव ,प्रत्येक प्रश्न और प्रत्येक शिष्य के साथ संवाद से उपजा हुआ जीवंत दर्शन था | आज जब मनुष्य बाहरी सफलताओं के पीछे भागते भागते अपने ही अन्दर से अपरिचित होता जा रहा है ,तब ऋषि उदालक का आत्मचिंतन और भी प्रासंगिक हो जाता है |

१- जीवनवृत और प्रासंगिक तपस्या |

ऋषि उदालक आरुणी ,मह्रिषी गौतम के शिष्य और महान ऋषि अरुण के पुत्र थे |कुछ आख्यानों के अनुसार वे उदालक के नाम से भी जाने जाते थे | उन का प्रारम्भिक जीवन कठोर गुरु भक्ति और अनुशासन का अद्भुत उदाहरण है | कहा जाता है कि वे अपने गुरु मह्रिषी आयोद धौम्य के आश्रम में अध्ययन करते थे | एक बार मूसलाधार वर्षा हो रही थी और गुरु ने उन्हें खेत की मेंड को ठीक करने भेजा ,पानी का वेग इतना तेज था कि मेंड बार बार टूट जाती थी ,बहुत प्रयास के बाद उदालक को एक उपाय सूझा -वे स्वयं ही मेंड बन कर लेट गए ,ताकि पानी रूक जाए और खेत की रक्षा हो सके |रात भर वह उसी अवस्था में पड़े रहे ,ठंड और वर्षा सहते हुए |प्रात: काल जब गुरु को शिष्य आश्रम में नहीं मिला तो वे उसे खोजते हुए खेत पर पहुंचे और “उदालक” कहाँ हो? पुकारा |कीचड़ में लेते हुए शिष्य ने उतर दिया -‘भगवन,मैं यहाँ मेंड बना हुआ हूँ |इस निष्ठां से प्रसन्न हो कर गुरु ने उन्हें उदालक नाम दिया और आशीर्वाद दिया कि समस्त वेद और उपनिषदों का ज्ञान उन के हृदय में स्वयं प्रकाशित हो जाए |

यह कथा केवल गुरु भक्ति की नहीं,वल्कि आत्मचिंतन के प्रथम सोपान की कथा है |आत्मा को जानने के लिए सब से पहले अहंकार को मिटाना पड़ता है ,स्वयं को साधन बना देना पड़ता है |उदालक ने अपने शरीर को ही साधन बना दिया | यही उन का पहला आत्म चिन्तन था -” मैं कौन हूँ ?क्या केवल यह शरीर हूँ,या इस शरीर से भी परे कोई प्रयोजन है ?”

2 – आत्म चिन्तन का दार्शनिक आधार : सत की खोज ‘

ऋषि उदालक का सब से प्रसिद्ध दार्शनिक संवाद उन के पुत्र श्वेतकेतु के साथ है ,जिस का वर्णन छान्दोग्य उपनिषद के छठे अध्याय में विस्तार से आता है | श्वेतकेतु बारह वर्ष की आयु में गुरुकुल गया और चोवीस बर्ष की आयु तक चारों वेदों का अध्ययन करके लौटा |वह अत्यंत विद्वान हो गया था ,परन्तु साथ ही उस में विद्वता का अहंकार भी आ गया था |पिता उदालक ने पुत्र की इस अवस्था को देखा और पूछा ‘हे श्वेतकेतु,क्या तुम ने वह शिक्षा भी प्राप्त की है जिस के जान लेने पर अनसुना भी सुना हो जाता है ,अविचरित भी विचरित हो जाता है और अज्ञात भी ज्ञात हो जाता है ? श्वेतकेतु चकित रह गया |उस ने कहा -“भगवन,ऐसी कौन सी शिक्षा है ?”

तब उदालक ने आत्मचिंतन का वह बीज बोया जिस ने भारतीय दर्शन को सदा के लिए बदल दिया | उन्होंने उदाहरण दिया – जैसे मिट्टी के एक ढेले को जान लेने पर मिट्टी से बने सभी वर्तन -घडा,कटोरा ,सुराही -जाने हुए हो जाते है , क्यों कि सत्य तो केवल मिट्टी है ,बाकी सब केवल नाम और रूप है |

जैसे लोहे के एक अस्त्र को जान लेने पर लोहे से बनी सभी वस्तुएं जानी हुई हो जाती हैं | जैसे सोने के एक टुकड़े को जान लेने पर सोने से बने सभी आभूषण -कंगन,हार,बाजूबंद -जाने हुए हो जाते हैं ,सत्य केवल सोना है,आभूषण केवल नाम रूप है |

वैसे ही हे श्वेतकेतु,एक सत को जान लेने पर यह समस्त जगत जाना हुआ हो जाता है |

यहाँ उदालक का आत्मचिंतन प्रारम्भ होता है | वे कहते हैं कि सृष्टि के आदि में केवल एक ही तत्व था -सत |एकमेव अद्वितीयम | वह सत ही सत्य है |उसी ने इच्छा की -एकोSहं वहु स्यामं” मैं एक हूँ ,बहुत हो जाऊं और उसी इच्छा से यह समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई | यह चिन्तन आज के विज्ञान के इस सिधान्त से कितना मिलता जुलता है,जहाँ कहा जाता है कि सृष्टिके प्रारम्भ में एक ही उर्जा बिंदु था ,जिस से ब्रम्हांड का विस्तार हुआ |

3.- त्रिवृत्कर्ण और आत्मा की यात्रा

उदालक ने सृष्टि उत्पति का अत्यंत वैज्ञानिक विवेचन किया | उन्होंने कहा कि उस सत से पहले तेज(अग्नि) को उत्पन्न किया ,तेज से जल को और जल से अन्न (पृथ्वी) को उत्पन्न किया | फिर उस सत ने इन तीनों में जीव के रूप में प्रवेश किया और त्रिवृत्कर्ण किया -अर्थात प्रत्येक तत्व में तीनों तत्वों का मिश्रण किया |इस कारण अग्नि में भी जल और पृथ्वी का अंश है,जल में भी तेज और पृथ्वी का और पृथ्वी में भी तेज और जल का |

यह केवल भौतिक सृष्टि का वर्णन नहीं है,यह आत्मा के अबतरण का भी वर्णन है |आत्मा ही वह सत है जो अन्नमय ,जलमय और तेजोमय कोशों में प्रवेश करती है | हम जो भोजन करते हैं ,उन का स्थूल भाग मल बनता है |मध्यम भाग मांस बनता है ,और सूक्षतम भाग मन बनता है | जल का स्थूल भाग मूत्र,मध्यम भाग रक्त और सूक्ष्म भाग प्राण बनता है |तेज का स्थूल भाग अस्थि,मध्यम भाग मज्जा और सूक्ष्म भाग वाणी बनता है |

अर्थात हमारा मन,प्राण,वाणी-हमारे ही आहार का सूक्ष्मतम परिणाम है |यह आत्म चिन्तन का एक अत्यंत व्यबहारिक पक्ष है | जैसे अन्न वैसा मन |आज के मनोविज्ञान और पोषण विज्ञान ने भी इस बात को स्वीकार किया है |

४- सुषुप्ति ,मृत्यु और आत्म-स्वरूप का चिन्तन

उदालक श्वेतकेतु को आत्मा का स्वरूप समझाने के लिए अत्यंत सरल प्रयोग करते हैं | वे कहते हैं –

हे श्वेतकेतु ,जब मनुष्य सुषुप्ति में होता है ,गहरी नींद में होता ई ,तब वह सत का साथ हो जाता है ‘|स्वमपीतो भवति ‘-वह अपने स्वरूप में लीन हो जाता है |जैसे पक्षी दिन भर आकाश में उड़ने के बाद थक कर अपने घोंसले में लौट आता है ,वैसे ही मन दिन भर इन्द्रियों के पीछे भागने के बाद थक कर प्राण में ,और प्राण सत में लीन हो जाता है | गहरी नींद में हमें सुख क्यों मिलता है ?क्यों कि उस समय हम अहंकार ,चिंता ,द्वेष से मुक्त हो कर अपने मूल स्वरूप -सत- के निकट होते हैं |

फिर वह मृत्यु का उदाहरण देते हैं |जब मनुष्य मरता है ,तो उस की वाणी मन में लीन हो जाती है ,मन प्राण में ,प्राण तेज में और तेज सत में | अर्थात मृत्यु आत्मा का नाश नहीं ,बल्कि आत्मा का अपने मूल स्त्रोत में प्रत्यावर्तन है |

और फिर वे सब से मार्मिक उदाहरण देते हैं – वट वृक्ष का |वे श्वेतकेतु को कहते हैं -इस वट के फल को तोड़ो |श्वेतकेतु फल तोड़ता है |इस में क्या है ? इस में छोटे छोटे बीज हैं |इस में से एक बीज को तोडो |श्वेतकेतु बीज तोड़ता है |इस में क्या देखते हो ?श्वेतकेतु कहता है -कुछ भी नहीं ,भगवन | तब उदालक कहते हैं -हे सौम्य, जिस सूक्ष्म तत्व को तुम नहीं देख पा रहे हो,उसी सूक्ष्म तत्व से यह विशाल वट वृक्ष खड़ा है |वैसे ही, हे श्वेतकेतु ,जिस सूक्ष्म सत को तुम नहीं देख पा रहे हो,उसी से यह समस्त विशाल जगत व्याप्त है |वह सत ही आत्मा है |

५ .महावाक्य -तत्वमसि –

ऋषि उदालक के आत्म चिन्तन की पराकाष्ठा है “,तत्वमसि श्वेतकेतो “- हे श्वेतकेतु -वह सत तुम ही हो | उह वेदान्त के चार महावाक्यों में से एक है |नौ बार नौ अलग अलग उदाहरणों के साथ उदालक अपने पुत्र को यही एक बात समझाते हैं -तत्वमसि |

जैसे नदियाँ -गंगा,यमुना,सरस्वती -अलग अलग नामों से बहती हैं ,परन्तु समुद्र में मिल कर अपना नाम रूप खो देतीं हैं और केवल समुद्र कहलाती हैं ,वैसे ही सभी जीव सत से निकल कर अंत में सत में ही लीन हो जाते हैं ,परन्तु अज्ञानवश यह नहीं जानते कि हम सत से ही आये हैं | जैसे मधुमखियाँ बिभिन्न फूलों से रस इकट्ठा करके उसे एक ही शहद में मिला देतीं हैं ,और वह रस यह नहीं जान पाता कि मैं अमुक फूल का हूँ ,वैसे ही सभी जीव सत में मिल कर यह नहीं जान पाते कि हम सत से हैं |

और उदालक अंतिम उपदेश देते हैं -हे श्वेतकेतु ,किसी पुरुष को आँख पर पट्टी बाढ़ कर निर्जन वन में छोड़ दिया जाए ,वह चारों दिशाओं में भटकेगा -मैं कहाँ हूँ ?परन्तु यदि कोई उस की पट्टी खोल दे और कहे कि तुम्हारा गाँव इस दिशा में है ,तो वह दिशा निर्देश पा कर अपने गाँव पहुंच जाएगा |वैसे ही यह जीव अज्ञान की पट्टी से बंधा हुआ ,इस संसार में भटक रहा है ,परन्तु जब कोई गुरु – आत्म ज्ञानी आचार्य -उस की आँखों से अज्ञान की पट्टी हटाता है और कहता है -‘तत्वमसि’-तो वह अपने स्वरूप को पहचान लेता है | यही आत्म चिन्तन है | बाहर की खोज नहीं ,भीतर की पहचान |

६. आधुनिक युग में उदालक के आत्म चिन्तन की प्रासंगिकता –

आज का युग सूचना का युग है |हमारे पास ज्ञान का अंवार है,परन्तु आत्म ज्ञान का अभाव है |हम पृथ्वी से लेकर मंगल तक की खोज कर रहे हैं ,परन्तु अपने ही मन के भीतर झांकना भूल गए हैं |अवसाद,अशांति,अकेलापन-यह सब आतं-विस्मृति के ही परिणाम हैं |

ऋषि उदालक का आत्म चिन्तन हमें तीन सूत्र देता है –

पहला सूत्र – जड में एकता ,शाखाओं में विविधता |

आज समाज जाति,धर्म,भाषा,देश के नाम पर बंटा हुआ है |उदालक कहते हैं -विविधता केवल नाम रूप की है ,सत्य तो एक ही मिट्टी है,एक ही सोना है ,एक ही सत है -यदि हम इस एकता को समझ लें तो संघर्ष समाप्त हो जाएगा |

दूसरा सूत्र – जैसा अन्न वैसा मन

उदालक ने कहा था -अन्न का सूक्ष्म भाग मन बनता है |आज फ़ास्ट फ़ूड ,अशुद्ध आहार और नकारात्मक सूचनाओं के आहार से हमारा मन भी अशांत और अस्वस्थ हो रहा है |सात्विकआहार,सात्विक विचार और सात्विक संगति ही स्वस्थ मन का आधार है |

तीसरा सूत्र -तुम ही वह हो-तत्वमसि |

हम सुख को बाहर खोज रहे हैं ,जब की सुख का स्त्रोत ही भीतर है |गहरी नींद में जब हम बाहरी जगत से कट कर अपने भीतर लौटते हैं ,तभी हमे सच्चा आराम मिलता है |यह इस बात का प्रमाण है कि आनन्द बाहर नहीं ,भीतर है |आत्म विश्वास का अर्थ है -आत्मा पर विश्वास यह जानना कि मैं शुद्र नहीं ,मैं ही वह विराट सत हूँ |

उपसंहार –

ऋषि उदालक आरूणी क आत्म चिन्तन किसी बीते युग की कहानी नहीं,बल्कि हर युग के मनुष्य के लिए एक दर्पण है |वह दर्पण जिस में हम अपने वास्तविक स्वरूप को देख सकते हैं | उन्होंने पुत्र को डांटा नहीं ,बल्कि प्रश्न पूछने की कला सिखाई |उन्होंने ने उतर थोपे नहीं ,बल्कि उदाहरणों के माध्यम से स्वयं अनुभव कराया |यही सच्चे गुरु का लक्षण है और यही सच्चे आत्म चिन्तन की पद्धति है | उन का जीवन हमें सिखाता है कि ज्ञान विनम्रता से आता है ,जैसे मेड बन कर लेट जाने से ,ज्ञान पिपासा से बढ़ता है -जैसे श्वेतकेतु ने प्रश्न पूछे और ज्ञान अंतत: आत्म पहचान में परिणत होता है |_तत्वमसि |

यदि हम अपने व्यस्त जीवन में से कुछ क्षण निकाल कर प्रतिदिन एक चिन्तन करें-मैं कौन हूँ ?यह जगत क्या है ? इस विविधता के पीछे वह एकता क्या है ? और क्या वह एकता मुझ में भी है ?-तो यही उदालक आरूणी को सच्ची श्रद्धांजली होगी और यही हमारे जीवन को भी सार्थक बनाएगा |

अंत में उदालक के ही शब्दों में -स य एषोSनिमैत दात्म्यमिदं सर्व तत्सत्यं स आत्मा तत्वमसि श्वेतकेतो “- वह जो अणु से भी सूक्ष्म है,वही इस सब का आत्मा है,वही सत्य है,वही आत्मा है,हे श्वेतकेतु ,वही तुम हो |

इति-

लेखक -मदन लाल शर्मा

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