अष्टावक्र -10
श्लोक- विहाय वैरिण काममर्थ चानर्थसंकुलं| धर्ममप्येतयोर्हेतुं सर्वत्रानादरं कुरु || १||
सामान्य अर्थ – काम को अपना वैरी – शत्रु जान कर छोड़ दो ,अर्थ धन को अनर्थों से भरा हुआ जान कर छोड़ दो,और इन दोनों काम और अर्थ का हेतु सकाम धर्म है, उस का भी त्याग करके सर्वत्र अनादर भाव रख अर्थात किसी भी विषय में आसक्ति मत रख |
विवेचना –
इस श्लोक में अष्टावक्र जी त्रिवर्ग -धर्म,अर्थ ,काम के त्याग की बात करते हैं | वे काम को ज्ञान का सब से बड़ा शत्रु कहते हैं |काम का अर्थ केवल वासना नहीं बल्कि किसी भी वस्तु को पाने की तीव्र इच्छा है ,जहाँ कामना है वहां मन चंचल होता है और आत्मस्वरूप से दूर होता है | अर्थ अर्थात धन को अनर्थ -संकुल कहा है |धन कमाने में दुःख,उस की रक्षा में दुःख,और खर्च में भी दुःख|वह लड़ाई,चोरी,चिंता को जन्म देता है | इसलिए वह अनर्थ का घर है |
सब से सूक्ष्म बात तीसरी है -धर्ममप्यत्योर्हेतुं |जो धर्म केवल काम और अर्थ की प्राप्ति के लिए किया जाता है -जैसे स्वर्ग पाने के लिए यज्ञ ,पुन्य के लिए दान वह भी बंधन है ऐसा सकाम धर्म भी त्यागने योग्य है | अष्टावक्र का मार्ग दमन नहीं ,विवेक है | वे कहते हैं -सर्वत्र अनादरं कुरू |घृणा से नहीं,बल्कि यह जान कर कि ये सब आत्मा से भिन्न है और क्षणिक सुख देते हैं ,इन के प्रति उदासीन हो जाओ |जब अनादर आ जाता है ,तब त्याग अपने आप हो जाता है | यही प्रौढ़ वैराग्य की भूमिका है |
श्लोक- स्वप्नेंद्रजालवत पश्य विनानि त्रिनि पंच वा |मित्रक्षेत्रधनागार -दारदायादि संपद: || 2||
सामान्य अर्थ – मित्र ,खेत,धन,घर ,स्त्री परिवार आदि की जो संपदाएं हैं ,उन को तीन या पांच दिन रहने वाली जानो | इन्हें स्वप्न और इंद्रजाल के समान अनित्य देखो |
विवेचना –
शिष्य के मन में प्रश्न उठता है कि जो संबंध और सम्पति इतने सुखद लगते हैं ,उन का त्याग कैसे हो ? गुरु उतर देते हैं -इन की क्षणभंगुरता को देखो | अष्टावक्र जान भूझ कर कहते हैं |त्रिनि पंच वा दिनानि | ये तीन पांच दिन ही रहने वाले हैं | जीवन में कोई भी भोग सदा नहीं रहता |आज जो मित्र है वह कल शत्रु बन सकता है ,जो धन आज है वह कल नष्ट हो सकता है ,शरीर भी क्षणिक है | इसलिए संसारिक वस्तुओं से ,संबंधों से अत्याधिक मोह नहीं करना चाहिए ,यह सब क्षणिक हैं दुखों का कारण हैं |
इन को स्वप्न और इंद्रजाल कहा गया है |स्वप्न में जैसे महल,धन,परिवार दीखते हैं पर आँख खुलते ही कुछ नहीं रहता ,वैसे ही जाग्रत अवस्था के यह सम्बन्ध भी चेतना के पर्दे पर चलता हुआ खेल है |इंद्रजाल यानी जादूगर का खेल -दिखता बहुत है ,पर वह सच कुछ नहीं होता | इस का अर्थ संसार से भागना नहीं ,इस का अर्थ है -दृष्टि बदलना | जब तुम जान लेते हो कि यह सब रहने वाला नहीं ,तो उस में अत्यंत आसक्ति नहीं रहती |आसक्ति गई तो शोक भी गया ,तो फिर तुम इन के बीच रह कर भी मुक्त रहते हो | यही अष्टावक्र का साक्षी भाव है -संसार को देखते हुए भी उस में लिप्त न होना ,जैसे आकाश में बादल आते जाते हैं पर आकाश अछूता रहता है |
श्लोक- यत्र यत्र भवेत तृष्णा संसार विद्धि तर वै | प्रौढ़वैराग्यमाश्रित्य वीततृष्ण सुखी भव ||3||
सामान्य अर्थ – जहाँ जहाँ तृष्णा होती है ,वहीं वहीं संसार को जानो | इसलिए दृढ वैराग्य का आश्रय लेकर तृष्णा से रहित हो कर सुखी हो जाओ |
विवेचना –
इस श्लोक में अष्टावक्र ने संसार की बहुत गहरी परिभाषा दी है | सामान्यत: हम सोचते हैं कि घर ,बाज़ार,परिवार -यह सब ही संसार है |वे कहते हैं -नहीं यह सब संसार बाहर नहीं ,अंदर नहीं है |संसार का मूल कारण तृष्णा है | तृष्णा के कारण ही यदि अज्ञानी को सब कुछ भी मिल जाए तो वह प्यासा ही रहता है | यत्र तत्र भवेतृष्णा -जहाँ इच्छा होती है ,वहीं संसार बन जाता है | इच्छा वह मृग तृष्णा है जो तुम्हें संसार से बांधे रखती है ,चाहे वह मोक्ष की भी इच्छा क्यों न हो ,यदि उस में तृष्णा है तो वह भी संसार ही है | तृष्णा ही कर्म कराती है ,कर्म ही जन्म-मरण का चक्र बनाती है |
इसलिए इस का उपाय एक ही है -प्रौढ़ वैराग्य |कच्चा वैराग्य श्मशान वैराग्य जैसा होता है ,कुछ देर रहता है फिर चला जाता है |प्रौढ़ वैराग्य विवेक से उत्पन्न होता है | यह जानता है कि विषयों से कभी तृप्ति नहीं मिलती ,जैसे आग में घी डालने से आग बढती है ,वैसे ही भोग से तृष्णा बढती है ” वीत तृष्ण: सुखी भव – जब तृष्णा चली जाती है ,तो मन दौड़ना बंद कर देता है |मन के शांत होते ही जो आत्म सुख अंदर सदा मौजूद था ,वह प्रकट हो जाता है |सुख कहीं से लाना नहीं है,तृष्णा हटते ही सुख अपना स्वरूप दिखा देता है ,यही जीवन्मुक्ति है |
श्लोक- तृष्णामात्रात्मको बन्धस -तन्नाशो मोक्ष उच्यते | भवासंसक्तिमात्रेण प्राप्तितुष्टिर्मुहूर्मुहू: ||४||
सामान्य अर्थ – तृष्णा ही बंधन का स्वरूप है और उस का नाश ही मोक्ष कहलाता है |संसार में केवल आसक्ति न रखने से ही बार बार प्राप्ति की तृष्टि -आत्म संतोष प्राप्त होता है |
विवेचना –
यह दशम प्रकरण का सार श्लोक है |अब तक बंधन को समझाया ,अब उस की परिभाषा एक पंक्ति में दे दी -तृष्णामात्रात्मको बन्ध: | अर्थात कोई और बंधन ,न जंजीर ,न जेल,न समाज | केवल तृष्णा ही बंधन है | कोई और बन्धन नहीं है ,और तृष्णा का नाश ही मोक्ष है | मोक्ष कहीं दूर जाने वाली वस्तु नहीं ,कोई लोक नहीं ,मोक्ष मन की एक अवस्था है जहाँ चाह समाप्त हो गई ,चाह गई तो भय गया,ईर्ष्या गई,शोक गया |
दूसरी पंक्ति बहुत सुन्दर है -भवासक्तिमात्रेण प्राप्ति तुष्टि -र्मुहुर्मुर्हूँ: – संसार की आसक्ति छोड़ते ही ,बार बार वह तृप्ति मिलती है ,जो कहीं बाहर नहीं मिलती ,यह प्राप्ति किसी नई वस्तु की प्राप्ति नहीं ,बल्कि जो सदा प्राप्त है -आत्मा- उस की तुष्टि है | संसारी मनुष्य सोचता है -कुछ मिलेगा तो सुख मिलेगा | ज्ञानी कहता है -कुछ छूटेगा तो सुख मिलेगा |क्या छूटेगा ? तृष्णा | जैसे ही तुम कहते हो -मुझे कुछ नहीं चाहिए,उसी क्षण तुम सम्राट हो जाते हो |यही र्मुहंर्मुहं: तुष्टि है -हर क्षण नई तृप्ति ,हर क्षण नया आनन्द,क्यों कि अब आनन्द बाहर पर निर्भर नहीं ,अन्दर से फूट रहा है | यही अष्टावक्र का अद्वैत वैराग्य है |
श्लोक- त्वमेकश्चेतन: शुद्धो जडं विश्वमसतथा | अविद्यापी न किचित्सा का बुभुत्सा तथापिते ||५||
सामान्य अर्थ – तुम एक हो शुद्ध हो और चेतन स्वरूप हो,यह दिखाई देने वाला संसार जड है और असत्य है |वास्तव में अज्ञान भी कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है , फिर तुम्हारे लिए किसी दूसरी वस्तु को जानने की इच्छा क्यों रहे |
विवेचना –
इस श्लोक में अष्टावक्र आत्मा के वास्तविक स्वरूप की और संकेत करते है |मनुष्य सामान्यत: अपने शरीर,मन,विचार ,सबंध और संसार को ही अपना वास्तविक स्वरूप मान लेता है “अष्टावक्र कहते हैं कि तुम्हारा मूल स्वरूप इन सब से अलग शुद्ध चेतना है |शरीर और संसार परिवर्तनशील है ,जब कि चेतना वह है जिस के कारण इन सब का अनुभव होता है |
यहाँ ‘जड विश्वम ‘ कह कर संसार को जड कहा गया है ,क्यों कि संसार की प्रत्येक वस्तु स्वयं अपने आस्तित्व को जानने वाली चेतना नहीं है |जब आत्मस्वरूप का ज्ञान होता है ,तब अज्ञान का स्वतंत्र आस्तित्व नहीं रह जाता | ” का बुभुत्सा”- अर्थात फिर जानने की इतनी इच्छा क्यों ? इस का अर्थ यह नहीं कि व्यबहारिक ज्ञान प्राप्त करना गलत है |संकेत उस अंतहीन मानसिक खोज की और है ,जिस में मन लगातार कुछ नया प्राप्त कर के पूर्ण होना चाहता है | अष्टावक्र कहते हैं कि आत्मा पहले से ही पूर्ण है ,उसे बाहर से कुछ जोड़ कर पूर्ण नहीं बनाना है | अत: हे राजन ,संपूर्ण एकात्म और विस्तीर्ण हो कर भी तुझे और क्या जानने की इच्छा है ? इसलिए मोक्ष को प्राप्त कर |
श्लोक- राज्यं सुता:कलत्राणी शरीराणि सुखानि च | संसक्तस्यापि नष्टानि त्व जन्मनि जन्मनि|| ६||
सामान्य अर्थ – राज्य,पुत्र ,पत्नी,शरीर औए अनेक प्रकार के सुख -इन सब में आसक्त रहने पर भी वे जन्म जन्म में नष्ट होते रहे हैं और तुम से छूटते रहे हैं |
विवेचना –
इस श्लोक में अष्टावक्र अनित्यता और आसक्ति का सबंध समझाते हैं |मनुष्य संसार की वस्तुओं को अपना मान कर उन से सुख और सुरक्षा प्राप्त करना चाहता है |धन,परिवार ,पद,शरीर और सुबिधायें जीवन में आवश्यक हो सकती हैं ,लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब मन उन्हें स्थायी मान कर उन से चिपक जाता है |
अष्टावक्र स्मरण कराते हैं कि संसार की कोई भी वस्तु स्थायी नहीं है |शरीर बदलता है,सबंध बदलते हैं, संपति आती जाती है और परिस्थितियाँ निरन्तर परिवर्तनशील रहती हैं |इसलिए जिस वस्तु को हम’मेरा’ कह कर पकड़ते हैं ,वही समय आने पर हम से अलग हो जाती है | यहाँ “जन्मनि -जन्मनि ” का प्रयोग संसार के बार बार दोहराए जाने वाले अनुभव की ओर संकेत करता है |मनुष्य बार बार वस्तुओं को प्राप्त करता है ,उस से आसक्त होता है और फिर उन के छूटने पर दुखी होता है |इस क्रम को देख कर विवेक उत्पन्न होना चाहिए |
इस श्लोक का उद्देश्य परिवार या संसार का त्याग करना मात्र नहीं है |मुख्य बात आसक्ति का त्याग है |वस्तुओं का उपयोग करते हुए भी यह समझ भी बने रहे कि वे नश्वर हैं | जब ‘मेरा’ भाव ढीला पड़ता है ,तब उन के मिलने और विछुड़ने से मन की शान्ति कम प्रभावित होती है |यही वैराग्य की दिशा है |
श्लोक – अलमर्थेंन कामेन सुकृतेनापि कर्मणा | एभ्य: संसारकान्तारे न विश्रान्तमभूनू मन: ||7||
सामान्य अर्थ _ धन इच्छाएं और शुभ कर्म-इन सब के द्वारा बहुत कुछ प्राप्त किया जा चुका,फिर भी संसार रुपी वन में मन को वास्तविक विश्राम नहीं मिला | अब इस से परे शान्ति को पहचानो |
विवेचना –
इस श्लोक में अष्टावक्र मनुष्य की उस प्रवृति पर ध्यान दिलाते हैं जिस में वह सोचता है कि धन,इच्छाओं की पूर्ति और अच्छे कर्मों से अंतत: पूर्ण संतोष मिल जाएगा |जीवन में धन चाहिए ,इच्छाओं की भी अपनी जगह है और शुभ कर्म भी आवश्यक हैं ,लेकिन केवल इन के सहारे मन को स्थायी शान्ति नहीं मिलती | ‘ संसारकान्तार ‘ अर्थात संसार का वन एक सुन्दर रूपक है | जैसे घने जंगल में व्यक्ति एक रास्ता पकड़ कर आगे बढ़ता रहता है ,लेकिन यदि दिशा स्पष्ट न हो तो वह भटक जाता है ,वैसे ही मनुष्य भी धन,उपलब्धि,इच्छाओं और कर्मों के पीछे लगातार दौड़ता रह सकता है ,एक उपलब्धि मिलती है तो मन अगली उपलब्धि की और बढ़ जाता है |
अष्टावक्र का प्रश्न है -यदि इतने प्रयासों के बाद भी मन विश्राम में नहीं आया ,तो क्या अब दृष्टिकोण बदलने का समय नहीं है | यहाँ ‘अलम ‘ का भाव है -बस ,पर्याप्त हो चुका | इस का अर्थ कर्म छोड़ देना नहीं ,बल्कि समझना है कि बाहरी उपलब्धियां आत्मिक पूर्णता का अंतिम साधन नहीं है | जब मन अपनी शान्ति को बाहरी वस्तुओं पर निर्भर करना छोड़ता है,तब वैराग्य और आत्म दृष्टि विकसित होती है |
श्लोक- कृतं न कतिजन्मानि कायेन मनसा गिरा | दुःखमायासदं कर्म तददयाप्युपरमयताम ||८||
सामान्य अर्थ – न जाने कितने जन्मों से शरीर,मन और वाणी के द्वारा अनेक प्रकार के श्रम पूर्ण और दुःख देने वाले कर्म किए जाते रहे है | अब इन कर्मों से उपरत -अर्थात आसक्ति से निवृत -हो जाओ |
विवेचना –
यह श्लोक पिछले श्लोक की शिक्षा को और गहरा करता है |मनुष्य जीवन भर शरीर ,मन,और वाणी के माध्यम से लगातार कर्म करता रहता है |कुछ कर्म सुख के लिए होते हैं ,कुछ धन के लिए ,कुछ प्रतिष्ठा के लिए और कुछ इच्छाओं की पूर्ति के लिए | फिर भी कर्मों की निरन्तरता मन को स्थायी विश्राम नही देती |
‘कायेन मनसा गिरा ‘ का अर्थ -शरीर से मन से और् वाणी से |अर्थात मनुष्य की पूरी जीवन व्यवस्था कर्म और प्रयास में लगी रहती है |अष्टावक्र पूछते हैं कि इतने लम्बे समय से यह सब करते रहने के बाद भी मन की शान्ति नहीं मिली ,तो अब भी उसी अंतहीन दौड़ में क्यों लगे रहना ?
‘ उपरम्यताम ‘ का अर्थ कर्मों को यात्रिक रूप से छोड़ देना नहीं है |इस का गहरा अर्थ है -कर्तापन और आसक्ति से विश्राम लेना |आवश्यक कर्म होते रहें ,लेकिन अन्दर यह आग्रह न रहे कि हर कर्म से मुझे कोई निश्चित फल,सुख या पहचान अवश्य मिले | अष्टावक्र की दृष्टि में वास्तविक विश्राम बाहरी गतिबिधियों के पूर्ण रूक जाने से नहीं ,बल्कि भीतर की पकड़ ढीली होने से आता है |जब मन हर कर्म के फल स्वयं को बांधना छोड़ देता है ,तब कर्म करते हुए भी भीतर शान्ति संभव होती है |यही इस श्लोक का वैराग्य पूर्ण संदेश है |
इति दशम प्रकरण अष्टावक्र गीता
मदन लाल शर्मा
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