मानव जीवन की अंतिम गति
श्रीमद्भागवत महापुराण के तृतीय स्कन्ध के तीसवें अध्याय में भगवान कपिल देव अपनी माता देवहूति को जीव की अधोगती और नर्क यातना का मार्मिक और वैराग्य उत्पन्न करने वाला वर्णन सुनाते हैं | यह अध्याय हमें यह बताता है कि जो मनुष्य जीवन भर पाप,अधर्म और इन्द्रिय तृप्ति में लिप्त रहता है |उस की मृत्यु के समय और मृत्यु के बाद क्या गति होती है |यह कथा केवल भय दिखाने के लिए नहीं है ,बल्कि जीव को सावधान करने भगवान की भक्ति की और प्रेरित करने के लिए है |
पिछले अध्यायों में कपिल ने बताया कि कैसे जीव माता के गर्भ में अत्यंत कष्ट भोगता है |गर्भ में जीव भगवान से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु ,मुझे इस नरक से निकालो ,मैं आप की भक्ति करूंगा | परन्तु जन्म लेते ही वह माया के प्रभाव से सब भूल जाता है |तीसरे अध्याय में उसी जीव के जीवन के अंतिम भाग और मृत्यु के बाद की यात्रा का वर्णन है |
कपिल देव जी कहते हैं -हे माता,मनुष्य अपने जीवन में जो कुछ कमाता है ,वह झूठे अहंकार के कारण अपने परिवार के लिए करता है | वह सोचता है कि यह घर मेरा है ,यह पत्नी मेरी है ,ये मेरे पुत्र हैं ,यह धन मेरा है |इस ममत्व में फंस कर वह दिनरात अधर्म करता है |वह दूसरों को दुःख देकर ,जीवों को मार कर ,चोरी करके ,झूठे बोल कर अपने परिवार का पेट पालता है | वह यह नहीं सोचता कि यह सब यहीं रह जाएगा |
ऐसा अधर्मी व्यक्ति जब बुढ़ापे में प्रवेश करता है ,तब उस की दशा अत्यंत दयनीय हो जाती है |उस का शरीर जर्जर हो जाता है |उस की आँखों की ज्योति कम हो जाती है ,कान ठीक से सुन नहीं पाते ,दांत टूट जाते हैं ,कमर झुक जाती है ,घर में उस की निंदा होने लगती है |जिन पुत्रों के लिए उस ने अपना पूरा जीवन पाप में बिता दिया ,वही पुत्र अब उस की अवहेलना करते हैं |वह घर में एक अपमानित नौकर की तरह पड़ा रहता है |उस की कोई नहीं सुनता ,वह भूखा होने पर भी खाना नहीं मांग पाता |इस प्रकार वह अत्यंन्त दुःख में अपने अंतिम दिनों को काटता है पर फिर भी उसे वैराग्य नहीं होता ,उस का मोह अपने परिवार में ही लगा रहता है |
जब उस की म्रत्यु का समय आता है ,तब अत्यंत भयंकर दृश्य उपस्थित होता है | उसे लेने के लिए साक्षात यमदूत आते हैं |उन का रूप अत्यन्त् डरावना होता है | उन की आँखें क्रोध से लाल होती हैं ,उन के केश विखरे हुए होते हैं ,उन के दांत टेढ़े मेढे होते हैं ,उन का शरीर काला होता है और हाथों में पाश लिए होते हैं | उन को देख कर पापी जीव अत्यंत भयभीत हो जाता है और मलमूत्र त्याग देता है |
उस समय जीव को अपना कफ,वात ,और पित से गला रूकता हुआ महसूस होता है | उसे घोर घुटन होती है |उस का कंठ अबरुद्ध हो जाता है |वह कुछ बोलना चाहता है पर बोल नहीं पाता |यमदूत उस जीव को उस के सूक्ष्म शरीर से बलपूर्वक खींच कर बाहर निकालते हैं,जैसे सिपाही किसी अपराधी को घसीटते हैं ,वह जीव अपने स्थूल शरीर को छोड़ देता है ,पर मोह के कारण वह बार बार अपने शरीर और परिवार की और देखता है |
यमदूत उसे पाश में बाँध कर यमलोक के मार्ग पर ले जाते हैं | वह मार्ग अत्यंत कष्टदायी होता है ,वह तपते हुए अंगारों से भरा होता है ,कहीं कहीं नुकीले शूल और कांटे बिछे होते हैं | उस मार्ग पर चलते हुए यमदूत उस को कोड़ों से मारते हैं वह भूख प्यास से व्याकुल हो जाता है ,पर उसे खाने पीने को कुछ नहीं मिलता |कहीं कहीं आंधी और तूफ़ान का सामना करना पड़ता है |इस प्रकार पाप जीव अत्यंत पीड़ित हो कर यमलोक तक पहुंचता है |
यमलोक में चित्रगुप्त के द्वारा उस के पाप और पुन्य का हिसाब किया जाता है |जो मनुष्य पापी होता है ,उसे यमराज दंड देते हैं और उसे अट्ठाईस प्रकार के भयंकर नरकों में भेजा जाता है |श्रीमद्भागवत में इन नरकों का विस्तार से वर्णन किया गया है |
मुख्य नरक इस प्रकार हैं –
१ – तामिस्त्र: जो व्यक्ति दूसरे के धन,स्त्री और ओर पुत्र को ह्डपता है,उसे इस नरक में डाला जाता है |यहाँ उसे घोर अन्धकार में भूखा प्यासा रखा जाता है और यमदूत उसे मारते पीटते हैं |
2 – अंध तामिस्त्र : जो पति अपनी पत्नी और पत्नी अपने पति को धोखा देती है ,उसे अंध तामिस्त्र में डाला जाता है,जहाँ वह अंधे की तरह भटकता है |
3 – रौरव: – जो व्यक्ति अपने परिवार के लिए जीवों को सताता है उसे रौरव नरक में डाला जाता है |वह रू रू नाम के हिंसक सर्प जैसे जीव उसे काटते हैं |
४ – महा रौरव: जो व्यक्ति मांस खाने के लिए जीवों को मारता है उसे महा रौरव में डाला जाता है जहाँ उसे वे ही जीव कष्ट देते हैं जिन्हें उस ने मारा था |
५ – कुम्भीपाक : जो व्यक्ति पशु पक्षियों को जिन्दा पकड़ पकाकर खाता है ,उसे खोलते हुए तेल के कडाहे में डाला जाता है |
६ – कालसूत्र: जो व्यक्ति वेदों की निंदा करता है ,ब्राह्मणों से द्वेष करता है,उसे इस नरक में ले जाया जाता है ,जहाँ की भूमि ताम्बे की तरह तपती है |
7 – असिपत्रवन: जो व्यक्ति वेद धर्म को छोड़ कर पाखंड का आश्रय लेता है ,उसे इस वन में डाला जाता है जहाँ पते तलवार जैसे नुकीले होते हैं और उसे कोड़ों से पिटा जाता है |
८ – सूकर मुख: जो व्यक्ति अभिमान में आ कर दूसरों को दंड देता है ,उसे इस नरक में गिराया आता है जहाँ उसे कोलहू में पेरा जाता है |
9 – अंधकूप: जो व्यक्ति निर्दोष जीवों को मारता है ,मच्छर आदि को सताता है उसे अंधे कुएं में डाला जाता है ,जहाँ उसे सांप,बिच्छु काटते हैं |
10 – कृमिभोजन,संदंश,तप्तसूर्मी ,वज्रकंटक आदि:
इसी प्रकार अन्य नरक हैं जहाँ झूठी गवाही देने वाले,चोरी करने वाले,व्यभिचार करने वाले,ब्राह्मणों का धन हडपने वाले ,मदिरा पीने वाले और दूसरों का धन चुराने वाले जीवों को उन के पापों के अनुसार दारूण यातनाएं दी जाती हैं |
कपिल देव जी कहते हैं कि नरक में जीव अपने पापों का फल भोग कर जब उस का पाप कुछ क्षीण होता है ,तब उसे फिर से पृथ्वी पर भेजा जाता है | वह पहले स्थावर योनी ,वृक्ष,लता,फिर कीट,पशु,पक्षी,और फिर मनुष्य योनी में आता है |मनुष्य योनी में भी वह अपने पूर्व पापों के कारण रोगी,दरिद्र ,अंगहीन या दुखी परिवार में जन्म लेता है |
हे माता देवहूति, इसलिए बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए कि वह इस संसार के झूठे मोह को छोड़ दे| यह शरीर,यह घर,यह परिवार सब नाशवान है | जो मनुष्य इन में आसक्त रहता है उसे ही नरक की यातनाएं भोगनी पडती हैं |सच्चा सुख केवल भगवान श्रीहरि की भक्ति में है | जो मनुष्य जीवन भर भगवान का नाम जपता है ,सत्संग करता है ,दान पुन्य करता है,दूसरों पर दया करता है और अहंकार छोड़ कर भगवान की शरण में रहता है,उसे यमदूत छू भी नहीं सकते |मृत्यु के समय स्वयं भगवान के पार्षद विमान ले कर उसे लेने आते हैं और वैकुण्ठ धाम ले जाते हैं |
इसलिए इस अध्याय का सार यही है कि मनुष्य को पाप से डरना चाहिए और हर क्षण भगवान का स्मरण करना चाहिए | मनुष्य जीवन दुर्लभ है ,इसे व्यर्थ में विषय भोगों में नष्ट नहीं करना चाहिए | सारा संसार एक परिवार है सभी जीव उसी के अंश है सब से प्रेम सब की सुरक्षा सब का कल्याण निश्चित होना चाहिए |
इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां तृतीय स्कन्धे कापिलेयोपाख्याने कर्मविपाको नाम त्रिशोSध्याय : || ३०||
लेखक- मदन लाल शर्मा
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