अथर्वा ऋषि का आत्म-चिन्तन

मैं अथर्वा ,अर्थ वर्ण वेद का द्रष्टा ,आज अपने जीवन के अंतिम प्रहर में इस शिला पर बैठा हूँ ,जहाँ से हिमालय की धवल चोटियाँ दिखाई देती हैं और नीचे घाटी में यज्ञों का धुंआ आकाश की और उठ रहा है |मेरे हाथ में वह माला है जिसे मेरी माता ने मेरे उपनयन के प्रथम दिन दी थी ,और मेरे हृदय में वे हजारों मन्त्र हैं जो परमात्मा ने कृपा करके मेरे मुख से प्रकट किये |आज मैं अपने आप से प्रश्न करता हूँ ,मेरा ज्ञान क्या है ? मेरा जीवन किस उद्देश्य के लिए था ?

मैंने ब्रह्मा के मानस पुत्रों की परम्परा में जन्म लिया ,भृगु और अंगीरा के कुल् में मेरा पालन हुआ |मेरे पिता ने मुझे सिखाया कि ज्ञान दो प्रकार का होता है ,एक वह जो यज्ञ के लिए है और दूसरा वह जो जीवन के लिए है |ऋग्वेद ने देवताओं की स्तुति सिखाई ,यजुर्वेद ने यज्ञ की विधि सिखाई ,सामवेद ने स्वरों का माधुर्य सिखाया ,परन्तु मेरे हृदय में सदा एक अपूर्णता रही,मैं देखता था कि मनुष्य यज्ञ तो करता है परन्तु रोग से पीड़ित है ,मनुष्य देवताओं को तो पुकारता है ,परन्तु अपने शत्रु के भय से काँपता है ,मनुष्य स्वर्ग तो चाहता है परन्तु इस पृथ्वी पर उस का घर अशांत है |

तब मैंने तप किया , 12 वर्षों तक हिमालय की कन्दराओं में केवल जल और वायु पर जीवन धारण किया | मेरी तपस्या का उद्देश्य किसी देवता को प्रसन्न करना नहीं था ,बल्कि उस सत्य को जानना था जो मनुष्य के प्रतिदिन के जीवन में काम आये |एक रात्री जब माघ की पूर्णिमा थी और आकाश में नक्षत्र अपने पूर्ण प्रकाश में थे ,तब मुझे वह दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई | मैंने देखा कि ब्रह्म एक ही है ,परन्तु उस की शक्तियाँ अनेक हैं |वही ब्रह्म अग्नि में तेज बनता है ,औषधि में रोगनाशक शक्ति बनता है और मन्त्र में रक्षा बनता है | तब मेरे मुख से मन्त्र निकले ,जिन्हें आज लोग अथर्व वेद कहते हैं |लोगों ने कहा कि यह वेद भिन्न है ,इस में जादू टोना है ,इस में व्यभिचार है | मैं हंसता हूँ ,उन की अज्ञानता पर ,क्या रोगी को औषधि देना जादू है ? क्या भयभीत बालक को साहस देना टोना है ? क्या दुष्टों से गाँव की रक्षा करना व्यभिचार है | मैंने तो केवल वही लिखा जो जीवन के लिए आवश्यक है | मेरे वेद में ब्रह्म ज्ञान भी है और गृहस्थ के लिए उपदेश भी है |

मैं आत्मचिंतन करता हूँ कि मैंने क्या देखा |मैंने देखा कि सृष्टि पांच तत्वों से बनी है ,परन्तु छठा तत्व मन है जो इन सब को बांधता है |मन ही रोग का कारण है और मन ही आरोग्य का साधन है |जब मनुष्य क्रोध करता है तो उस का रक्त दूषित होता है ,जब वह भयभीत होता है तो उस की नाडी तीव्र हो जाती है ,जब वह प्रेम करता है तो उस के मुख में कांति आ जाती है |इसलिए मैंने शांति के सूक्त लिखे ,पुष्टि के सूक्त लिखे ,प्रेम और सौमनस्य के सूक्त लिखे ,मैं चाहता था कि मनुष्य केवल यज्ञ वेदी पर ही शुद्ध न हो ,बल्कि अपने विचारों में भी शुद्ध हो |

मेरे शिष्य मुझ से पूछते थे ,गुरुदेव भूत प्रेतों के मन्त्र क्यों लिखते हैं |मैं उन से कहता था ,पुत्र भूत प्रेत कोई आकाश में उड़ने वाले जीव नहीं हैं ,भूत अतीत का पश्चाताप है ,प्रेत भविष्य की अनावश्यक चिंता है ,जो मनुष्य को वर्तमान में जीने नहीं देते |जब मैं कहता हूँ कि इस मन्त्र से पिशाच दूर होगा ,तो मेरा अर्थ होता है कि इस विचार से तुम्हारा आलस्य दूर होगा ,तुम्हारा अज्ञान दूर होगा |मेरे मन्त्र प्रतीक हैं ,संकेत हैं,उन्हें स्थूल दृष्टि से मत देखो,सूक्ष्म दृष्टि से देखो |

आज जब मैं अपने जीवन को देखता हूँ तो मुझे तीन बातों का संतोष है और दो बातों का विषाद | संतोष इस बात का है कि मैंने ज्ञान को केवल ब्राह्मणों तक ही सिमित नहीं रखा ,मैंने वैद्य को औषधि दी ,मैंने कृषक को भूमि की उर्वरता का मन्त्र दिया ,मैंने गृहणी को परिवार में शान्ति का सूक्त दिया,मैंने राजा को राष्ट्र की सुरक्षा का उपदेश दिया | मेरा वेद सब का वेद है ,वह किसी एक वर्ग का नहीं है “दूसरा संतोष इस बात का है कि मैंने ब्रह्म को दूर् स्वर्ग में नहीं रखा ,मैंने उसे धरती पर खोजा,इसी जल में ,इसी औषधी में ,इसी श्वास में | मैंने कहा ,’अयं निज: परो वेति गणना लघुचेत साम,उदार चरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम ,यह भावना मेरे हृदय से निकली |

तीसरा संतोष मुझे इस बात का है कि मैंने मृत्यु को शत्रु नहीं माना ,लोग मृत्यु से डरते हैं मैं मृत्यु को एक दीर्घ निंद्रा मानता हूँ |मेरे वेद में मृत्यु के सूक्त भी हैं और दीर्घायु के भी | मैं जानता हूँ कि शरीर नश्वर हैं ,परन्तु कर्म अमर है |जो मन्त्र मैंने दिए ,जो औषधियां मैंने बनाई ,वे शरीर के बाद भी जीवित रहेगी |

अब विषाद की बातें -पहला विषाद यह है कि मनुष्य मेरे मन्त्रों का दुरूपयोग करेगा | मैंने रक्षा के लिए जो मन्त्र दिए|,उन का प्रयोग लोग हिंसा के लिए करेंगे ,मैंने वशीकरण जो अर्थ प्रेम और एकता के रूप में किया ,उसे लोग दूसरों को अपने वश में करने के अहंकार के रूप में लेंगे |ज्ञान जब अज्ञानी के हाथ में जाता है तो वह शस्त्र बन जाता है ,यही मेरे मन की पीड़ा है | दूसरा विषाद- यह है कि आने वाले युग में लोग मेरे वेद को चौथा वेद कह कर सब से छोटा समझेंगे ,उसे वेदों में सब से कम महत्व देंगे |परन्तु मैं जानता हूँ कि समय आएगा जब मनुष्य को फिर से मेरे वेद की आवश्यकता पड़ेगी , जब वह रोगों से घिरेगा ,जब उस का मन अशांत होगा,जब प्रकृति असंतुलित होगी,तब वह फिर से अथर्वा को खोजेगा |

मैं अपने आप से पूछता हूँ क्या मैंने ईश्वर को देखा है ? मैं कहता हूँ ,हाँ मैंने देखा है ,परन्तु मन्दिर में नहीं,मूर्ती में नहीं| मैंने ईश्वर को उस माता कि आँखों में देखा है जो अपने ज्वर से पीड़ित पुत्र के माथे पर गीला वस्त्र रखती है ,मैंने ईश्वर को उस वैद्य के हाथों में देखा है जो किसी भेद भाव के सब की चिकित्सा करता है ,मैंने ईश्वर को उस अग्नि में देखा है जो ठंड में किसी अनाथ को ताप देती है |ईश्वर कोई व्यक्ति नहीं है ,वह एक अनुभूति है ,वह करूणा है,वह सेवा है ,वह प्रेम है | मेरे अथर्व वेद का प्रथम और अंतिम शब्द यही है ,करूणा |

मैंने जीवन भर एक बात सिखाई,सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञ: पृथ्वी धारयन्ति |सत्य ऋत ,दीक्षा,तप,ब्रह्म,और यज्ञ ही पृथ्वी धारण करते हैं | यदि इन में से एक भी नष्ट हो गया तो पृथ्वी डगमगा जायेगी | आज मुझे लगता है कि मनुष्य सत्य से दूर जा रहा है ,वह दिखावे में जी रहा है |मैं अपने शिष्यों को कहता था ,यज्ञ केवल घी और लकड़ी का नहीं होता ,सब से बड़ा यज्ञ अपने अहंकार का यज्ञ है |

अब मेरा शरीर थक गया है ,मेरी आँखें धुंधली हो रही हैं ,मेरे हाथ काँप रहे हैं ,परन्तु मेरा मन अभी भी शांत है | मैं जानता हूँ कि मेरा समय आ गया है|मैं इस शिला को प्रणाम करता हूँ ,इस वायु को प्रणाम करता हूँ ,इस आकाश को प्रणाम करता हूँ ,मैंने जो कुछ सिखा ,वह इस प्रकृति से ही सिखा | वृक्षों ने मुझे धैर्य सिखाया ,नदियों ने मुझे निरन्तरता सिखाई,पर्वतों ने मुझे स्थिरता सिखाई और अग्नि ने मुझे पवित्रता सिखाई |

यदि कोई मुझ से पूछे कि जीवन का सार क्या है ,तो मैं कहूँगा ,जीवन का सार किसी ग्रन्थ में नहीं है,वह तुम्हारे प्रतिदिन के कर्म में है | तुम किसी भूखे को भोजन दो ,वह वेद है | तुम किसी रोते हुए को हंसाओ ,वह मन्त्र है ,तुम किसी गिरते हुए को उठाओ ,वह यज्ञ है |मेरे अथर्व वेद को पढने से पहले मनुष्य बनो,क्यों कि मनुष्य हुए बिना वेद को समझा नहीं जा सकता |

मैं अथर्वा ,आज अपने में लीन हो रहा हूँ | मेरा मन्त्र,मेरा ज्ञान ,मेरी चिंता ,सब इस वायु में विलीन हो रहे हैं | मैं जा रहा हूँ परन्तु मेरे शब्द रहेंगे | जब कभी कोई वैद्य किसी रोगी की नाडी देखेगा ,मैं वहीं हूँ |जब कभी कोई माता अपने पुत्र के लिए प्रार्थना करेगी,मैं वहीं हूँ|जब कभी कोई राजा अपनी प्रजा के सुख के लिए सोचेगा ,मैं वहीं हूँ | मैं अंत में विलीन हो रहा हूँ ,परन्तु अनंत ही मैं हूँ |

मैं यह भी स्मरण करता हूँ कि मैंने शत्रुओं से घृणा करना नहीं सिखाया ,मैंने मित्रता का मार्ग सिखाया |मेरे समनस्य सूक्त में मैंने कहा है कि हृदय एक हो मन एक हो,विचार एक हो तभी समाज में शान्ति आएगी | आज जब मैं अपने चारों और देखता हूँ तो पाता हूँ कि मनुष्य जाति,वर्ण,और भाषा के नाम पर बंट रहा है ,परन्तु रक्त का रंग सब का एक ही है ,अश्रु का स्वाद सब का एक ही है ,पीड़ा की अनुभूति सब की एक ही है ,फिर यह भेद कैसा | मैंने अपने जीवन में किसी से उस की जाति नहीं पूछी ,मैंने केवल उस की पीड़ा पूछी |

मुझे स्मरण है कि एक बार एक चाण्डाल मेरे पास आया,,उस के शरीर पर कोढ़ था ,सभी वैद्यों ने उसे त्याग दिया था |मेरे शिष्यों ने कहा कि इसे आश्रम में मत आने दो ,यह अपवित्र है | मैंने कहा – रोग कभी अपवित्र नहीं होता ,घृणा अपवित्र होती है | मैंने स्वयं अपने हाथों से उस की औषधि बनाई,उस के घाव धोये और तीन मॉस में वह स्वस्थ हो गया |वही व्यक्ति बाद में मेरा शिष्य बना और उस ने सहस्त्रों लोगों की सेवा की |इस से मैंने सिखा कि पवित्रता शरीर की नहीं हृदय की होती है |

मैं आत्मचिंतन में यह भी देखता हूँ कि ज्ञान का अभिमान सब से बड़ा बंधन है |बहुत से ऋषि अपने ज्ञान पर गर्व करते हैं ,परन्तु मैं सदा छात्र बना रहा | मैं आज भी कहता हूँ कि मैं कुछ नहीं जानता ,जो कुछ जानता हूँ परमात्मा की कृपा है |जैसे समुद्र से एक बूँद लेकर कोई यह नहीं कह सकता कि उस ने समुद्र को जान लिया ,वैसे ही वेदों का एक मन्त्र जान कर कोई यह नहीं कह सकता कि उस ने ब्रह्म ज्ञान को जान लिया |नम्रता ही ज्ञान का प्रथम लक्षण है |

अंत में मैं आने वाली पीढ़ीयों के लिए एक ही संदेश छोड़ता हूँ | हे,मनुष्यों ,अपने जीवन को केवल भोगों के लिए मत जिओ,उसे योग के लिए जिओ|अपनी श्वास को पहचानों ,,अपने हृदय की गति को सुनो,अपने मन के विचारों को देखो |जब तुम अपने आप को पहचान लोगे तो सम्पूर्ण विश्व को जान लोगे |यही मेरा आत्मचिंतन है ,यही मेरा अथर्व ज्ञान है ,यही मेरी अंतिम प्रार्थना है कि सब सुखी हों,सब निरोग हों ,सब में प्रेम हो |

इति -अथर्वा आत्म चिन्तन

मदन लाल शर्मा

वेबसाइट -http://thegodweknow.com आगे फिर एक और ऋषि का आत्म चिन्तन

Leave a Reply