अष्टावक्र-9

निर्वेद्चर्चा

श्लोक- कृताकृते च द्वन्द्वानी कवा शान्तानी कस्य व |एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद भव त्यागपरोSव्रती ||१||

सामान्य अर्थ – अष्टावक्र जी कहते हैं कि इस संसार में क्या करना है और क्या नहीं करना, अच्छे और बुरे कर्मों की उहापोह से बाहर निकल कर ,इन के बारे में मत सोच और सब कुछ त्याग कर वैराग्य धारण कर ले |

विवेचना –

मनुष्य जीवन भर कुछ करने और कुछ न करने के जाल में उलझा रहता है | मैं यह करूं ,यह न करूं ,इसी सोच की उहापोह में पैदा होता हैं ,अष्टावक्र जी कहते हैं ,इतिहास देख लो ,कर्म करके किसे स्थायी शान्ति मिली ?राजा ,ऋषि ,योगी सभी कर्म के बाद भी अशांत रहे क्यों कि कर्म से नया कर्म पैदा होता है | संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं जो यह कह दे की मेरी सभी इच्छाएं अर्थात कामनाएं पूर्ण हो गयी हैं | इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति निर्वेद अर्थात वैराग्य को प्राप्त होता है | यहाँ त्याग का अर्थ घर वार छोड़ना नहीं है | अव्रती ,,शब्द महत्वपूर्ण है ,इस का अर्थ -जो अव्रती,व्रती न हो अर्थात जो यह भी व्रत न ले कि ” मैं त्याग करूंगा ” | क्यों कि ” मैं त्यागी हूँ” | यह भी एक अहंकार ही है | सच्चा त्याग है -कर्तापन के अभिमान को छोड़ देना |मैं करने वाला हूँ क्यों कि यह कृत -अकृत का भाव भी बंधन है | जब यह भाव भी छूट जाता है ,तब व्यक्ति इस संसार में रहते हुए भी त्यागी हो जाता है | यही मुक्ति का सीधा मार्ग है |

श्लोक – कस्यापि तात धन्यस्य लोकचेष्टावलोकनात |जीवितेच्छा बुभुक्षा च बुभुत्सोपशमं गता: || 2||

सामान्य अर्थ – यह सारा संसार अनित्य है सदा रहने वाला नहीं | यह तीन प्रकार के तापों ,दैहिक ,दैविक और भौतिक दुखों से दूषित है | यह सार रहित है ,निंदा के योग्य है और छोड़ने के योग्य है | ऐसा पक्का निश्चय करके ज्ञानी पुरुष शांत हो जाता है ,उसे परम शान्ति मिल जाती है |

विवेचना –

संसार हर व्यक्ति को अपनी और लुभाता है आकर्षित करता है क्यों की संसार में भोगने योग्य वस्तुओं की प्रचुरता है ,इन सब को देख कर हर मनुष्य का मन उन को पाने के लिए बैचेन रहता है | यही भोग बिलास की इच्छा उसे इस संसार से बांधे रखती है | तीन इच्छाए मनुष्य को बांधे रखती हैं | १- जीवितेच्छा -मैं हमेशा जीवत रहूँ ,2- बुभुक्षा – मैं और अधिक सुखों का भोग करूं और खाऊं पीऊ और 3- बुभुत्सा -और अधिक जानूं ,और ज्ञान प्राप्त करूं | पहली दो तो स्पष्ट बंधन हैं ,तीसरी सूक्ष्म बंधन है | अष्टावक्र जी कहते हैं ,लोक चेष्टा को ध्यान से देखो ,लोग सुबह से शाम तक किस के लिए भाग दौड़ रहे हैं ? थोड़े से सुख के लिए कितने दुःख उठा रहे हैं | इसे देख कर वैराग्यवान को विरक्ति का भाव पैदा हो जाता है |यह धन्य पुरुष की पहचान है | वह सोचता है कि – जब अंत में सब को यह संसार छोड़ना ही है ,तो जीने की लालसा क्यों ? जब यह सब भोग अंत में रोग और शोक देते हैं तो भोग की लालसा क्यों ? और जब वहुत जानने पर भी व्यक्ति अहंकारी और अशांत ही रहता है ,तो शास्त्रों को पढने से क्या लाभ ? इस प्रकार देखने से उस की इच्छाएं शांत हो जाती हैं | उसे कुछ पाने की नहीं ,बल्कि जो है उसी में शांत रहने की कला आ जाती है |यह अवस्था ही धन्यता है |

श्लोक – अनित्यं सर्वमेवेदं तापत्रयदूषितं | असारं निन्दितं हेयमि -ति निश्चित्य शाम्यति || 3||

सामान्य अर्थ – यह संसार हमेशा रहने वाला नही है तीन इच्छाएं जीवितेच्छा ,बुभुक्षा और बुभुत्सा से यह दूषित रहता है | जो ज्ञानी इस बात को जान लेता है वह शान्ति प्राप्त कर लेता है |

विवेचना –

शान्ति का उपाय संसार को सुधारना नहीं ,उस के स्वरूप को ठीक से जान लेना है |अष्टावक्र चार बातें कहते हैं, १ -अनित्यं -यह संसार बदल रहा है ,आज जो यह है कल नहीं रहेगा शरीर,बंधन,धन सब अनित्य है | 2 – यह जगत तीन तापों से ग्रसित है ,-हर वस्तु में तीन दुःख लगे हैं ,अपने मन का दुःख ,दूसरों से मिलने वाला दुःख और प्रकृति से मिलने वाला दुःख |जहाँ जाओगे दुःख पीछा करेगा | 3- असारं -जिस में कोई सार नहीं जैसे केले के तने में छिलका ही छिलका ,अंदर गुदा नहीं | ४- निन्दित हेयम -विवेकी संतों ने इसे हेय कहा है |यह विचार निराशावाद नहीं,यथार्थवाद है |जब तक हम संसार को सुन्दर और् स्थायी मानते हैं ,तब तक हम उस से चिपके रहते हैं ,जैसे ही निश्चय होता है कि यह मृगतृष्णा है ,वैसे ही दौड़ समाप्त हो जाती है |इस निश्चय से वैराग्य नहीं ,वल्कि शाम्यति -परम शान्ति उत्पन्न होती है |फिर व्यक्ति संसार से लड़ता नहीं ,बल्कि उसे सहज भाव से देखता हुआ अपने स्वरूप में स्थित होता रहता है |

श्लोक – कोSसौ कालो वयं किंवा यत्र द्वन्द्धानी नो नृणाम | तान्युपेक्ष्य यथाप्राप्तवर्ती सिद्धिमवाप्नुयात ||४||

सामान्य अर्थ – ऐसा कौन सा समय या कौन सी उम्र है जब मनुष्य के मन में उहापोह नहीं रही हो ? अर्थात जीवन में कभी भी संशय दिविधा ,करना न करना , अच्छा बुरा यह उहापोह समाप्त नहीं होते ,इसलिए बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि इन संशयों की उपेक्षा कर दे और जो जैसा प्राप्त हो उस में जीते हुए अनायास ही सिद्धि को प्राप्त करे |

विवेचना-

यह श्लोक मनुष्य के सब से बड़े जाल – यह करूं न करूं पर चोट करता है | हम सारा जीवन “क्या करूं,क्या न करूं ” यह सही है या वह सही है इसी में बिता देते हैं | बचपन में खेल का उहापोह,जवानी में करियर का,बुढापे में धर्म-अधर्म का | अष्टावक्र कहते हैं -कोई काल ऐसा नहीं जहां उहापोह न हो |यदि आप सोचते हैं कि कल यह सब दुविधा खत्म हो जायेगी ,तो यह भ्रम है |

इसलिए समाधान इस उहापोह् को सुलझाना नहीं ,उस की उपेक्षा करना है |उपेक्षा का अर्थ लापरवाही नहीं ,बल्कि साक्षी भाव से देख कर उस में न उलझना है | जैसे आकाश में बादल आते जाते रहते हैं ,पर आकाश उन में नहीं उलझता | जब आप यथावर्ती हो जाते हैं – जो जीवन ने दिया है ,उसी में संतुष्ट और सहज रहते हैं ,तो बिना किसी कठिन साधना के सिद्धि मिल जाती है |सिद्धि का अर्थ कोई चमत्कार नहीं ,बल्कि मन की शांत और उहापोह -मुक्त अवस्था है |यही मुक्ति है |

श्लोक – नाना मतं महर्षिणा साधूनां योगिनां तथा | दृष्ट्वा निर्वेदमापन्न: को न साम्यती मानव: ||५||

सामान्य अर्थ –

यह श्लोक बहुत व्यबहारिक सत्य लगता है | हम सत्य की खोज में शास्त्रों,गुरुओं और सम्प्रदायों के पास जाते हैं ,पर वहां पाते हैं कि एक ऋषि कहता है ,कर्म करो ,दूसरा कहता है कर्म त्यागो ,एक कहता है भक्ति करो ,दूसरा कहता है ज्ञान ही श्रेष्ठ है | योगी एक आसन बताता है ,दूसरा दूसरा | इस भेद को देख कर बुद्धिमान व्यक्ति को समझ आ जाता है कि सत्य शब्दों और मतों में नहीं है |यदि सत्य एक है तो इतने मत क्यों ? यह सब मन की उपज है |इस से एक गहरा निर्वेद -अर्थात संसार और शास्त्रार्थ से विरक्ति पैदा होती है |

यह निर्वेद निराशा नहीं, बल्कि जागृति है |जब आप देखते हैं कि सब अपनी अपनी दूकान चला रहे हैं ,तब आप बाहर की और देखना बंद कर देते हैं और भीतर की और मुड़ते हैं | अष्टावक्र का संकेत है कि इस वैराग्य में ही शांति है |जब तक आप किसी मत के पीछे भागोगे ,अशांत रहेंगे | जिस क्षण आप सभी मतों को देख कर उन से उपर उठ जाते हैं ,उसी क्षण आप अपने स्वरूप में स्थित हो जाते हैं और शांत हो जाते हैं |

श्लोक- कृत्वा मूर्तिपरिज्ञान चैतन्यस्य न किं गुरु:| निर्वेदसमतायुक्तया यस्तारयति संसृते: ||६||

सामान्य अर्थ -जिस ने चैतन्य के मूर्ती रूपों का ज्ञान प्राप्त कर लिया है,क्या वह गुरु नहीं है ? जो व्यक्ति वैराग्य(निर्वेद) और समता से युक्त हो कर दूसरों को इस संसार -सागर से पार कराता है ,वही सच्चा गुरु है |

विवेचना –

इस् श्लोक में अष्टावक्र जी गुरु की नई परिभाषा देते हैं ,जब तक हम सोचते हैं कि गुरु बाहर है ,कोई व्यक्ति,कोई मूर्ती,कोई देहधारी | यहाँ अष्टावक्र कहते हैं -सच्चा गुरु वह नहीं जो सिर्फ मन्त्र दे ,बल्कि वह है जिस ने यह जान लिया है कि इस जगत की हर मूर्ती ,हर रूप के पीछे एक ही चैतन्य है | जब साधक को यह मूर्ती परिज्ञान हो जाता है कि सब रूपों में वही एक चेतना है,तो बाहर का भेद मिट जाता है |

और ऐसे ज्ञानी के दो गुण होते हैं -निर्वेद और समता | निर्वेद अर्थात वैराग्य -संसार की नश्वरता को देख कर उस से विरक्ति ,पर निराशा नहीं | समता अर्थात सुख दुःख ,मान अपमान में एक समान भाव |जो स्वयं इन गुणों में स्थित है और युक्ति से ,करूणा से दूसरों को भी जन्म-मरण के चक्र से पार ले जाता है वही गुरु है | अष्टावक्र का संकेत है कि जिसे आप बाहर पूज रहे हैं ,वह आप की चेतना का ही प्रतिबिम्ब है | असली गुरु बाहर नहीं ,आप के भीतर जागृत वह बोध अर्थात आत्म – ज्ञान है जो निर्वेद और समता से आप को मुक्त कराता है |

श्लोक- पश्य भूतविरास्त्व भूतमात्रान यथार्थत: | तत्क्षणाद बन्धनिर्मुक्त: स्वरूपस्थो भविष्यसि ||7||

सामान्य अर्थ – हे जनक जो कुछ तुम्हें संसार में परिवर्तन दिख रहा है ,शरीर का जन्म ,बुढापा,मृत्यु ,सुख दुःख ,पहाड़ नदी – यह सब पंच महा तत्वों के विकार मात्र हैं |वास्तव में यह तत्वों की मात्रा का ही बदलना है ,नया कुछ बनता विगडता नहीं | इस सत्य को यथार्थ में देख लो,तो उसी क्षण तुम बंधन से मुक्त हो कर अपने आत्म स्वरूप में स्थित हो जाओगे |

विवेचना –

यह श्लोक अष्टावक्र के साक्षी भाव का मूल है |हम संसार को बहुत ठोस मानते हैं ,पर अष्टावक्र कहते हैं ,देखो -जैसे सोने से हार,कंगन ,अंगूठी बनते हैं ,नाम रूप बदलते हैं ,पर सोना वही रहता है | वैसे ही यह सारा जगत पृथ्वी,जल,अग्नि,वायु,आकाश इन पञ्च भूतों का ही खेल है | जब तक हम विकार को ही सत्य मानते हैं ,तब तक राग द्वेष ,मेरा तेरा ,अच्छा बुरा बना रहता है |ज्ञानी विकार में तत्व को देख लेता है |वह जानता है कि शरीर भी इन्हीं भूतों का पिंड है ,मैं इन से अलग इन को देखने वाला चैतन्य हूँ |

अष्टावक्र कोई साधन नहीं बताते ,वे कहते हैं केवल ‘पश्य’ देखो ,यह देखना बुद्धि का नहीं ,बोध का देखना है | जैसे ही यह दृष्टि आती है मनुष्य उसी क्षण बंधन निर्मुक्त हो जाता है |उसे मुक्ति के लिए मरने या हिमालय जाने की जरूरत नहीं | अपने स्वरूप में स्थित होना ही मुक्ति है ,और वह यहीं अभी सम्भव है |

श्लोक- वासना एवं संसार इति सर्वा विमुंच ता: | तत्यागो वासनात्यागतिस्थतिर्द्य यथा तथा ||८||

सामान्य अर्थ – वासना ही संसार है |यह जान कर तुम सभी वासनाओं को छोड़ दो | वासना के त्याग से ही संसार का का त्याग हो जाता है ,और तब तुम उसी क्षण ,जैसे हो वैसे ही अपने स्वरूप में स्थित हो जाते हो |

विवेचना –

यदि सातवाँ श्लोक बाहर के जगत के मिथ्यातत्व को बताता है तो आठवाँ श्लोक भीतर के जगत के बंधन को काटता है | अष्टावक्र कहते हैं ,तुम्हें बाहर का संसार नहीं बांधता ,तुम्हारी भीतर की चाह बांधती है |वासना का अर्थ -और चाहिए,यह बना रहे ,वह न हो ,मैं कुछ बन जाऊं | यही सूक्ष्म वासना ही मन में संसार रचती है |घर संसार नहीं है ,घर की वासना संसार है ,पैसा संसार नहीं ,पैसे की वासना संसार है |

लोग संसार छोड़ने के लिए ,वस्तु छोड़ते हैं ,अष्टावक्र वासना छोड़ने को कहते हैं |वस्तु छोड़ने से वैराग्य नहीं ,वासना छोड़ने से वैराग्य होता है | “सर्वा विमुंच ता:” सब वासनाओं को छोड़ दो |इस का अर्थ जबरदस्ती दवाना नहीं है |अष्टावक्र का त्याग ज्ञानपूर्वक त्याग है |जब तुम स्पष्ट देख लेते हो कि वासना ही दुःख है ,वासना ही पुनर्जन्म है,तो वह अपने आप गिर जाती है | और आश्चर्य देखो -वासना गई कि संसार गया | संसार गया तो क्या बचा ? केवल शुद्ध आत्मा |तब तुम्हें कुछ करना नहीं है | यथा,तथा -आज अभी ,इसी अवस्था में तुम मुक्त हो,स्थित हो ,यही अष्टावक्र का सहज योग है |

इति अष्टावक्र नवम प्रकरण

मदन लाल शर्मा

वेबसाइट -http://thegodweknow.com

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