अथाष्टाद्शोSध्याय :प्रथम:स्कन्ध:(श्रीमद्भागवत)

राजा परीक्षित को शृगी ऋषि का शाप -जब तक पृथ्वी पर राजा परीक्षित सम्राट रहे ,तब तक चारों और व्याप्त हो जाने पर भी कलियुग का कुछ भी प्रभाव नहीं था |वैसे तो जिस दिन श्रीकृष्ण ने पृथ्वी का परित्याग किया ,उसी समय पृथ्वी में अधर्म का मूल कारण कलियुग आ गया था |

विलोम जाति में उत्पन्न होने पर भी महात्माओं की सेवा करने के कारण हमारा , जन्म सफल हो गया | क्यों कि महापुरुषों के साथ बातचीत करने मात्र से ही नीच कुल में उत्पन्न होने की मनोव्यथा शीघ्र ही मिट जाती है | फिर उन लोगों की बात ही और क्या ,जो सत्पुरुषों के एक मात्र आश्रय भगवान का नाम लेते हैं |भगवान की शक्ति अनन्त है,वे स्वयं अनंत हैं |वास्तव में उन के गुणों की अनन्तता के कारण ही उन्हें अनन्त कहा गया है | भगवान के गुणों की समता भी जब कोई नहीं कर सकता ,तब उन से बढ़ कर तो कोई हो ही कैसे सकता है | उन के गुणों की यह विशेषता समझाने के लिए इतना कह देना ही पर्याप्त है कि लक्ष्मी जी अपने को प्राप्त करने की इच्छा से प्रार्थना करने वाले ब्रह्मा आदि देवताओं को छोड़ कर भगवान के न चाहने पर भी उन के चरणकमलों की रज का ही सेवन करती है| ब्रह्मा जी ने भगवान के चरणों का प्रक्षालन करने के लिए जो जल समर्पित किया था ,वही उन के चरण नखों से निकल कर गंगा जी के रूप में प्रवाहित हुआ | यह जल महादेव सहित सारे जगत को पवित्र करता है ||ऐसी अवस्था में त्रिभुवन में श्रीकृष्ण के अतिरिक्त भगवान शब्द का दूसरा और क्या अर्थ हो सकता है | जैसे पक्षी अपनी शक्ति के अनुसार आकाश में उड़ते हैं ,वैसे ही विद्वान लोग भी अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार ही श्रीकृष्ण की लीला का वर्णन करते हैं |

एक दिन राजा परीक्षित वन में शिकार खेलने गए हुये थे ,हिरणों का पीछा करते हुये वे थक गये थे उन्हें जोरों की भूख और प्यास लगी | जब उन्हें कोई जलाशय नहीं मिला ,तब वे पास के ही एक ऋषि के आश्रम में घुस गये | उन्होंने देखा वहां आँखें बंद किये शांत भाव से एक मुनि आसन पर बैठे हुए हैं |इन्द्रिय,प्राण,मन और बुद्धि के निरुद्ध हो जाने से वे संसार से उपर उठ गये थे |जाग्रत,स्वप्न,सुषुप्ति -तीनों अवस्थाओं से रहित निर्विकार ब्रह्म स्वरूप तुरीय पद में वे स्थित थे |राजा परीक्षित ने ऐसी दशा में उन से जल माँगा ,क्यों की प्यास से उन का गला सूखा जा रहा था | जब राजा को वहां बैठने के लिए आसन नहीं मिला ,किसी ने उन्हें भूमि पर बैठने को नहीं कहा -,तब अपने को अपमानित मान कर वे क्रोध के वश में हो गये| वे भूख प्यास से छटपटा रहे थे ,इसलिए एकाएक उन्हें ब्राह्मण के प्रति ईर्ष्या और क्रोध हो गया | उन के जीवन में यह पहला ही अवसर था |वहां से लौटते समय उन्होंने क्रोध वश धनुष की नोक से एक मरा सांप उठा कर ऋषि के गले में डाल दिया और अपनी राजधानी चले गये | उन के मन में यह बात आयी कि इन्होंने अपने नेत्र बंद कर रखे हैं ,क्या वास्तव में इन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियवृतियों का निरोध कर रखा है या इन राजाओं से हमारा क्या प्रयोजन है ,यों सोच कर इन्होंने झूठ मूठ समाधि का ढोंग रच रखा है |

उन शमीक मुनि का पुत्र बड़ा तेजस्वी था ,दूसरे ऋषि कुमारों के साथ खेल रहा था |जब उस बालक ने सुना कि राजा ने उन के पिता के साथ दुर्व्यवहार किया है ,तब उस ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के परम धाम पधार जाने पर यह राजा लोग उदंड हो गए हैं ब्राह्मणों ने इन्हें राजा बनाया है इन्हें उन की रक्षा करनी चाहिए लेकिन यह तो अब उन का भी तिरस्कार करने लग पड़े हैं | इन मर्यादा तोड़ने वाले को मैं दंड देता हूँ | परीक्षित ने मेरे पिता का अपमान किया है ,इसलिए आज से सातवें दिन उसे तक्षक सर्प डस लेगा | इस के बाद बालक अपने आश्रम पर आया |और जोर जोर से रोने लगा ,पुत्र का रोना सुनकर शमीक मुनि ने अपनी आँखें खोली और देखा कि उन के गले में एक मरा हुआ सांप पड़ा है | उसे फेंक कर पुत्र से पूछा ,तुम क्यों रो रहे हो ?इस प्रकार पूछने पर पुत्र ने सारा हाल कह दिया | मुनि शमीक ने राजा के शाप की बात सुन कर अपने पुत्र का अभिनन्दन नहीं किया |उन कि दृष्टि में राजा परीक्षित शाप के योग्य नहीं थे ,एक् छोटी सी गलती के लिए इतना बड़ा दंड दिया | शमीक ने अपने पुत्र से कहा तेरी बुद्धि अभी कच्ची है अभी परिपक नहीं हुई है ,राजा भगवान स्वरूप होता है उसे दूसरे मनुष्यों के समान नहीं समझना चाहिए ,क्यों कि राजा की छत्रछाया में ही रह कर प्रजा सुरक्षित रहती है | जिस समय राजा रूप भगवान पृथ्वी पर नहीं होगा तो प्रजा सुरक्षित कैसे रह सकती है ,उस समय चोर,भ्रष्टाचारी लोगों का बोलबाला हो जायेगा और जनता आरक्षित भेड़ों के समान लोगों का नाश हो जाएगा | राजा के न रहने पर लुटेरे बढ़ जायेंगे, ,वे लोग पशु ,धन,स्त्री और सम्पति को लूट लेते हैं | उस समय मनुष्य अर्थ लोभ और काम वासना से विवश हो कर कुतो और बंदरों के समान वर्णशंकर हो जाते हैं |

सम्राट परीक्षित तो बड़े ही यशस्वी और धार्मिक हैं वे भगवान के परम भक्त हैं ,वे भूख,प्यास से व्याकुल हो कर हमारे आश्रम में आये थे उन्हें शाप नहीं देना चाहिए था | इस नासमझ बालक ने निष्पाप भगवान के सेवक राजा का अपराध किया है ,सर्वात्मा इसे क्षमा करे |भगवान् के भक्तों में भी बदला लेने की शक्ति होती है परन्तु वे दूसरों द्वारा किये गए अपमान का बदला या मारपीट नहीं करते | शमीक को अपने पुत्र के अपराध का बड़ा पश्चाताप हुआ | राजा परीक्षित ने जो उन का अपमान किया था ,उस पर तो उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया | महात्माओं का स्वभाव ही ऐसा होता है ,जब दूसरे लोग उन्हेंसुख दुःख आदि समस्याओं में डाल देते हैं तब भी वह खुश या दुखी नहीं होते ,क्यों की आत्मा का स्वरूप तो गुणों से सर्वथा परे है |

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट -thegodweknow

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