संसार के सभी काम ईश्वरीय हैं

कौशिक नामक एक ब्राह्मण थे |ब्रह्मचर्य व्रत पर अटल थे |एक दिन पेड़ की छाँह में बैठे वेद पाठ कर रहे थे कि इतने में उन के सिर पर किसी पक्षी ने बीट कर दी | कौशिक ने उपर देखा तो पेड़ की डाल पर एक बगुला बैठा दिखाई दिया | ब्राह्मण ने सोचा ,इसी नीच बगुले की यह करतूत है ,उन्हें बहुत गुस्सा आया |उन की क्रोध भरी दृष्टि बगुले पर पड़ते ही वह तत्काल भस्म हो कर पृथ्वी पर गिर पड़ा | बगुले के मृत शरीर को देख कर ब्राह्मण का मन अशांत हो उठा |उन्हें बड़ा पछतावा होने लगा |

मन की भावनाओं के कार्य रूप में परिणत होने के लिए कितने ही बाहरी कारणों की आवश्यकता पडती है ,किन्तु बाहरी कारण भावनाओं का हर वक्त साथ नहीं देते | इसी कारण हम कितनी ही बुराइयों से अक्सर बच जाते हैं | यदि यह बात न हो ,यदि मन की सारी भावनाएं तत्काल ही कार्यरूप में परिणत होने लग जाएं तो फिर इस संसार के कष्टों को कोई सहन न कर सके |

कौशिक बड़े पछताय कि मैंने एक निर्दोष पक्षी को मार दिया | क्रोध में आ कर मैंने जो भावना की उस ने यह क्या अनर्थ कर दिया ,यह सोच कर उन्हें बड़ा शोक हुआ |इतने में भिक्षा का समय हो आया और वे भिक्षा के लिए चल पड़े |

एक द्वार पर भिक्षा के लिए वह खड़े हुए | घर की मालकिन अन्दर वर्तन साफ कर रही थी | कौशिक ने सोचा ,काम , पूरा होने पर मेरी तरफ ध्यान देगी किन्तु इतने में स्त्री का पति ,जो किसी काम पर बाहर गया हुआ था ,लौट आया |आते ही बोला -बड़ी भूख लगी है,खाना परोसो | पति की बात सुनते ही गृह लक्ष्मी कौशिक की प्रवाह न कर के अपने पति की सेवा टहल में लग गई | पानी ला कर उस ने पति के पाँव धोये ,आसन बिछाया ,थाली परोसी और बैठ कर पंखा झेलने लगी |

कौशिक द्वार पर ही खड़े रहे | जब उस स्त्री का पति भोजन कर चूका तभी कौशिक के लिए वह भिक्षा लाई | भिक्षा देते हुए उस ने कौशिक से कहा -महाराज आप को बहुत देर ठहरना पड़ा ,क्षमा कीजियेगा |स्त्री की अपने प्रति की गई लापरवाही के कारण कौशिक क्रोध के मारे प्रज्वलित अग्नि से मालूम पड़ रहे थे | बोल उठे -“देवी ,मुझे और घरों में जाना है | यह तुम्हारे लिए उचित नहीं था जो तुम ने मुझे इतनी देर ठहरा रखा |”

स्त्री ने कहा -“ब्राह्मण श्रेष्ठ ,पति की सेवा शुश्रूषा में लगी रही ,इसी कारण कुछ देर हो गई ,क्षमा कीजियेगा “| कौशिक को अपनी दृढ-व्रतता और जीवन की पवित्रता का बड़ा घमंड था |वह उस स्त्री को उपदेश देने लगे -” नारी ,माना की पति की सेवा टहल करना स्त्री का धर्म है,किन्तु ब्राह्मण का अनादर करना भी ठीक नहीं|मालूम होता है तुम्हें अपने पतिव्रता होने का बड़ा घमंड है |”

स्त्री ने विनीत भाव से कहा -“नाराज न होइएगा|अपने पति की शुश्रूषा में रहने वाली स्त्री पर कुपित होना उचित नहीं| आप से प्रार्थना है कि मुझे पेड्वाला बगुला समझने की गलती न कीजियेगा | आप का क्रोध पति की सेवा में लगी रहने वाली सती का कुछ नहीं बिगाड़ सकता |मैं बगुला नहीं हूँ |” स्त्री की बातें सुन कर ब्राह्मण कौशिक चौंक उठे | उन्हें बड़ा अचरज हुआ कि इस स्त्री को बगुले के बारे में कैसे पता लगा ? वे आश्चर्य कर ही रहे थे कि इतने में वह बोली –

महात्मन,आप ने धर्म का मर्म न जाना |शायद आप को इस बात का भी पता नहीं कि क्रोध एक ऐसा शत्रु है जो मनुष्य के शरीर ही के अन्दर रहते हुए उस का नाश कर देता है | मेरा अपराध क्षमा करें और मिथिलापुरी में रहने वाले धर्मव्याघ्र के पास जा कर उन से उपदेश ग्रहण करें |”

ब्राह्मण बिस्मित हो कर बोले -” देवी ,आप का कल्याण हो |आप मेरी जो निंदा कर रही हैं ,मेरा विश्वास है कि यह मेरी भलाई के ही लिए है |अवश्य मैं मिथिला जाऊँगा और धर्मव्याघ्र से उपदेश ग्रहण करूंगा “| इस प्रकार कह कर कौशिक मिथिला नगरी कीओर चल पड़े |

मिथिला पहुंच कर कौशिक धर्मव्याघ्र की खोज करने लगे | उन्होंने सोचा कि जो महात्मा मुझे उपदेश देने के काबिल है वे अवश्य ही कहीं आश्रम में रहते होंगे | ऐसा सोच कर उन्होंने सुंदर भवनों बाग़ बगीचों में ढूंडा ,पर कौशिक को धर्मव्याघ्र का कोई पता न चला | अंत में एक कसाई की दूकान पर एक हट्टाकट्टा आदमी मांस बेच रहा था |लोगों ने उन्हें बताया कि वह जो दूकान पर बैठे हैं वे ही धर्मव्याघ्र हैं ||

ब्राह्मण बड़े कुत्सिल भाव से नाक भौं सिकोड़ कर दूर खड़े रहे,उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था |ब्राह्मण को यूँ दुविधा में देख कर कसाई उठ खड़ा हुआ और जल्दी से जा कर बड़ी नम्रता के साथ बोला-“भगवन,उस सती स्त्री ने ही तो आप को मेरे पास नहीं भेजा है?” सुन कर कौशिक सन्न रह गये |

भगवन ,मैं आप के यहाँ आने का उद्देश्य जानता हूँ |चलिए घर पर पधारिये ,आप की इच्छा पूरी होगी |” यह कह कर धर्मव्याघ्र उन्हें अपने घर ले गया | वहां पहुंच कर कौशिक ने धर्मव्याघ्र को अपने माता पिता की बड़ी श्रद्धा के साथ सेवा टहल करते देखा | इस से निवृत हो कर कसाई धर्मव्याघ्र ने ब्राह्मण कौशिक को बताया कि जीवन क्या है ,कर्म क्या है और मनुष्य के कर्तव्य क्या हैं | यह उपदेश पाकर कौशिक अपने घर लौट आये और धर्मव्याघ्र के उपदेश के अनुसार अपने माता पिता की सेवा टहल में लग गये जिन की कि उपेक्षा करके वे वेदाध्ययन और तपस्या में लगे थे |

धर्मव्याघ्र की कथा गीता के उपदेश का ही दूसरा रूप है |कोइ ऐसी वस्तु नहीं जिस में परमात्मा व्याप्त न हो ,इसलिए कोई भी काम ऐसा नहीं जो ईश्वरीय न हो | समाज के प्रचलित ढांचे के कारण ,या ख़ास मौका मिलने या न मिलने के कारण ,अथवा अपनी पहुंच या विशेष परिश्रम के कारण भिन्न भिन्न मनुष्य भिन्न भिन्न कामों में लग जाते हैं | इस उंच नीच का या और किसी तरह का प्रश्न ही कहाँ उठ सकता है | किसी भी काम को ,अपने धर्म से डिगे बगैर करना ही ईश्वर की भक्ति करना है |

स्त्रोत -महाभारत कथा

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