भक्ति योग का स्वरूप

प्रकृति ,पुरुष और महातत्व आदि के लक्षण सांख्य शास्त्र में कहे गए हैं तथा जिस के द्वारा उन का वास्तविक स्वरूप अलग अलग जाना जाता है और भक्ति योग को ही जिस का प्रयोजन कहा गया है | साधकों के भाव के अनुसार भक्ति योग का अनेक प्रकार से वर्णन होता है ,क्यों कि स्वभाव और गुणों के भेद से मनुष्यों के भाव में भी भिन्नता आ जाती है | जो भेद करने वाले क्रोधी पुरुष ,ह्रदय में हिंसा ,दम्भ या ईर्ष्या का भाव रख कर भगवान् से प्रेम करते हैं वह भगवांन के तामसी भक्त हैं ,जो पुरुष विषय ,यश और एश्वर्य की कामना से मूर्ति का भेदभाव से पूजन करता है वह राजस भक्त है ,जो व्यक्ति अपने किये हुए पापों का नाश करने के लिए भगवान् की पूजा करता है वह सात्विक भक्त है | जिस प्रकार गंगा का वहाव लगातार समुद्र की और रहता है उसी प्रकार भगवान् के गुणों को सुनने मात्र से मन की गति तेल की धारा के समान अटूट रूप से भगवान् जो सब कुछ जानते हैं उन के प्रति एक हो जाना और उस पुरुषोतम में बिना किसी स्वार्थ के प्रेम होना इसे ही निर्गुण भक्ति योग का लक्षण कहा गया है | इस प्रकार के बिना स्वार्थ के भक्त देने पर भी परमात्मा की सेवा को छोड़ कर भगवान् के नित्य धाम में निवास ,उस के मन में समा जाना ,उन से एक हो जाना या ब्रम्ह रूप प्राप्त कर लेना ,मोक्ष तक नहीं लेते |भगवत सेवा के लिए मुक्ति का तिरस्कार करने वाला यह भक्तियोग ही परम पुरुषार्थ कहा गया है | इस के द्वारा तीनों गुणों को लांघ कर परमात्मा के भाव को उन के प्रेम रूप और अलौकिक स्वरूप को प्राप्त हो जाता है |

निस्वार्थ श्रध्दापूर्वक अपने नित्य के सर्वकल्याण के लिए किये जाने वाले कर्मों का पालन कर, नित्य प्रति हिंसारहित ,श्रेष्ठ क्रिया योग का अनुष्ठान करने , परमात्मा की मूर्ति के दर्शन ,स्पर्श,पूजा ,स्तुति और वन्दना करने , प्राणियो में परमात्मा की भावना करने वैराग्य के अबलम्बन,महापुरुषों का मान ,दीनों पर दया और समान स्थिति वालों के प्रति मित्रवत व्यबहार करने,यम नियमों का पालन ,आध्यात्मिक शास्त्रों का श्रवण और भगवान् के नामों का ऊँचे स्वर से कीर्तन करने से तथा मन की सरलता ,सत्पुरुषों का सत्संग और अहंकार के त्याग से भगवान् के धर्मों का अनुष्ठान करने वाले भक्त पुरुष का चित अत्यंत शुद्ध हो कर भगवान् के गुणों को सुनने मात्र से अनायास ही परमात्मा में लग जाता है |

जिस प्रकार वायु के द्वारा उड़ कर जाने वाली गंध अपने आश्रय फूल से सूंघने वाली इन्द्रिओं तक पहुंच जाती है ,उसी प्रकार भक्तियोग में तत्पर और रागद्वेष आदि विकारों से शून्य चित परमात्मा को प्राप्त् कर लेता है |परमात्मा आत्मा के रूप में सदा सभी जीवों में स्थित है ,इसलिए जो लोग परमात्मा का अनादर कर के केवल भगवान् की मूर्ति का पूजन करते हैं उन की वह पूजा केवल ढकोसला मात्र है |परमात्मा ,सब की आत्मा ,सभी भूतों में स्थित है ऐसी दशा में मोहवश परमात्मा की उपेक्षा करके केवल मूर्ति पूजा जो व्यक्ति करता है उस की वह पूजा निष्फल होती है | जो व्यक्ति दूसरे जीवों के प्रति वैर भाव रखता है वह परमात्मा से भी द्वेष करता है | उस के मन को कभी भी शांति नहीं मिल सकती ,जो दूसरे जीवों का अपमान करता है वह बहुत बढ़िया सामग्री ,अनेक प्रकार के बिधि बिधानों के साथ भगवान् की मूर्ति का पूजन भी करे तो भी भगवान् प्रसन्न नहीं होते | मनुष्य अपने धर्म का अनुष्ठान करता हुआ तब तक ईश्वर की मूर्ति कि पूजा करता रहे जब तक उसे अपने मन एवं सब जीवों में स्थित परमात्मा का अनुभव न हो जाए | जो व्यक्ति आत्मा परमात्मा के बीच में थोडा सा भी अंतर करता है उस भेद करने वाले को मृत्यु के समय बहुत भय प्रतित लगता है | इस लिए सम्पूर्ण जीवों के अंदर स्थित परमात्मा का यथायोग्य दान,मान,मित्रतावत व्यबहार तथा समान दृष्टि से पूजा करनी चाहिए | यही भक्तियोग है |

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