याज्ञवल्क्य का आत्म चिन्तन “मैं कौन हूँ ‘?की अमर खोज

ऋषि याज्ञवल्क्य -वैदिक परम्परा के सब से तेजस्वी विचारकों में से एक हैं |वृहदारन्यक उपनिषद में इन की पत्नी मैत्रेयी के साथ संवाद भारतीय दर्शन की नीव बना | जब सम्पति और अमरता के बीच चुनाव आया ,तो याज्ञवल्क्य ने कहा ” जिस से मैं अम्रर न हो सकूं ,उसे लेकर क्या करूं ” यही से उन की आत्मचिंतन का प्रकाश शुरू होता है|

१. आरम्भ: त्याग से पहले का प्रश्न –

याज्ञवल्क्य गृहस्थ थे राजा जनक की सभा पंडित थे ,अपार यश और धन के स्वामी थे | फिर भी जब वानप्रस्थ का समय आया तो उन्होंने मैत्रेयी और कात्यायनी के बीच संपति बांटनी चाहि | मैत्रेयी बोली ‘” भगवन ,यदि यह सारी पृथ्वी धन से भर जाये तो क्या मैं उस से अमर हो जाउंगी “? याज्ञवल्क्य का उतर था ,” नहीं धन से सुख सुविधा मिलती है अमरता नहीं “|

पहला सूत्र -आत्मचिंतन तब शुरू होता है जब मनुष्य देख ले कि बाहरी उपलब्धियां भीतरी खालीपन नहीं भर सकतीं |

2.. प्रेम का केंद्र आत्मा – मैत्रेयी को समझाते हुए याज्ञवल्क्य ने बहुत गहरी बात कही ,” न वा अरे पत्यु: कामाय पति:प्रियो भवति, आत्मनस्तु कामाय पति: प्रियो भवति|” यानी पत्नी को पति इसलिए प्रिय नहीं कि पति है,बल्कि इसलिए कि उस में अपना |आत्मा”दिखता है | पुत्र धन ,पशु,ब्राह्मण,क्षत्रिय,लोक,देव,वेद -सब प्रिय इसलिए लगते हैं क्यों कि उन के माध्यम से हम अपने आप को ही चाहते हैं |

दूसरा सूत्र – जगत में हम जिस से भी प्रेम करते हैं ,वह प्रेम अनन्त: अपने आत्मा का ही विस्तार है | जिसे हम खोज रहे हैं वह खोजने वाला स्वयं है | :

3. नेति-नेति : आत्मा क्या नहीं है –

तो यह आत्मा है क्या ? याज्ञवल्क्य ने परिभाषा नहीं दी ,निषेध दिया ,”नेति नेति” यह नहीं यह नही |

१.आत्मा शरीर नहीं ,क्यों कि शरीर बदलता है, ,मरता है |

2. आत्मा मन नहीं ,क्यों कि मन चंचल है ,कभी सुखी कभी दुखी |

3. आत्मा बुद्धि नहीं ,क्यों कि बुद्धि सो जाती है |

आत्मा प्राण नहीं ,अहंकार नहीं,इन्द्रियाँ नहीं |

जो भी देखा जा सकता है ,सोचा जा सकता है ,कहा जा सकता है -वह आत्मा नहीं | आत्मा वह है जो देखने वाले को देखता है ,जानने वाले को जानता है ,पर स्वयं किसी का विषय नहीं बनता |

तीसरा सूत्र -आत्म ज्ञान जोड़ से नहीं ,घटाने से मिलता है जो जो “मैं” नहीं हूँ उसे घटाते जाओ ,जो बच रहे वही” मैं” हूँ |

४. साक्षी भाव -जल में नमक की तरह

याज्ञवल्क्य ने एक सुंदर उपमा दी जैसे पानी में नमक घोल दो तो नमक दीखता नहीं ,पर चखो तो हर बूँद में नमक है ,वैसे ही वह आत्मा इस शरीर ,मन,प्राण ,सब में औत प्रोत है,पर अलग से पकड़ में नहीं आता | वह द्रष्टा है -देखने वाला | उसे कैसे देखोगे ? वह श्रोता है -सुनने वाला ,उसे कैसे सुनोगे ?वह मन्ता है -मनन करने वाला -उस का मनन कैसे करोगे ?

चौथा सूत्र – आत्मा कारण नहीं ,कर्ता है ,वह साधन नहीं,वह साध्य है | उसे जानने के लिए बाहर नहीं ,भीतर मुड़ना पड़ता है |

५. मृत्यु के पार -विज्ञान धन –

मैत्रेय ने पूछा “मरने पर जो संज्ञा नहीं रहती ,फिर क्या बचता है ?

याज्ञवल्क्य बोले -जहाँ द्वैत है,वही एक दुसरे को देखता ,सूंघता,सुनता है |पर जहाँ सब आत्मा ही हो गया,वहां किस से किसे देखें ,किस से किसे सुनें ? जैसे सैधव का ढेला पूरा का पूरा नमक है ,वैसे ही आत्मा “विज्ञान धन ” है – चेतना का घनीभूत पिंड | मृत्यु शरीर की है ,द्रष्टा की मृत्यु नहीं होती |

६.. आज के जीवन के लिए संदेश —

याज्ञवल्क्य का चिन्तन ३००० साल पुराना हो कर भी एक दम ताजा है |

रिश्तों में – जब हम समझ लेते हैं कि प्रेम का स्त्रोत अपना आत्मा है ,तो हम दूसरों से अपेक्षा कम करते हैं ,स्वीकार ज्यादा, काम में -,पद पैसा, प्रसिद्धि साधन है ,साध्य नहीं | मैं कौन हूँ ,यदि याद रहे तो सफलता -असफलता में समता रहती है |

दुःख में – नेति नेति का अभ्यास बताता है कि दुःख मन में है ” ,मैं “दुःख नहीं हूँ | मैं दुःख का जानने वाला हूँ |

ध्यान में – आँख बंद करके पूछो – जो विचारों को देख रहा है ,वह कौन है ? यही याज्ञवल्क्य की विधि है |

याज्ञवल्क्य ने हमें कोई मत नहीं दिया ,एक दर्पण दिया ,उस में झांकें तो पता चलता है -जिसे हम बाहर खोज रहे थे ,वह भीतर बैठा मुस्कुरा रहा है |

अंतिम बात – आत्म चिन्तन का अर्थ पलायन नहीं याज्ञवल्क्य ने राज सभा छोड़ी ,पर कर्तव्य नहीं उन्होंने बताया कि जब “मैं”स्पष्ट हो जाता है तो “मेरा ” का बोझ उतर जाता है ,फिर व्यक्ति संसार में रह कर भी संसार से मुक्त जीता है | यही जीवन मुक्ति है | यही याज्ञवल्क्य का अमर संदेश है |

लेखक -मदन लाल शर्मा

वेबसाइट- thegodweknow.com

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