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आत्मा -परमात्माआत्मा -परमात्मा
मनुष्य हमेशा प्रतिदिन की बातचीत में कई बार मैं शब्द का प्रयोग करता है लेकिन आश्चर्य है कि प्रतिदिन मैं और मेरा शब्द का कई {...}
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मनुष्य हमेशा प्रतिदिन की बातचीत में कई बार मैं शब्द का प्रयोग करता है लेकिन आश्चर्य है कि प्रतिदिन मैं और मेरा शब्द का कई {...}
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प्रकृति ,पुरुष और महातत्व आदि के लक्षण सांख्य शास्त्र में कहे गए हैं तथा जिस के द्वारा उन का वास्तविक स्वरूप अलग अलग जाना जाता {...}
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भौतिक सुखों के विषयों के प्रति उदासीनता विकसित करना वैराग्य है जिस ने सभी सांसारिक सुख और मोह माया का त्याग कर दिया है वह {...}
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धार्यते इति धर्म:जो धारण किया जाये वह धर्म है ,समाज में मनुष्य जीवन के प्रति जो धारणा बनाता है वही उस का धर्म है |गीता {...}
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सृष्टी से पहले यह जगत जिसे हम यूनिवर्स कहते हैं अंधकार में लीन और अज्ञात अर्थात जिसे जाना न जाये और अलक्षण अर्थात जो चिन्ह {...}
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समय किसी भी कार्य को करने का सही क्षण होता है |समय अतीत से वर्तमान और भविष्य के क्रिया कलापों को क्रम में करता है {...}
Mythological Religion Religious Theology
हम मैं से उस का अर्थ अपने शरीर से लेते हैं लेकिन मैं शरीर नहीं हूँ कभी सोच कर देखो |मैं कौन हूँ ,जानने के {...}
Religion Religious Theology
निरखि किन नयना होऊ निहाल | अति अदभुत आनंद-अम्बुद -सी सोहत सो सुखमा सुविसाल ||१ || नीरद-तनु दामिनी-सी दमकत छिन-छिन छवि-कन झरत रसाल | अंग-अंग {...}