ऋषि शाण्डिल्य (तत्वचिंतन )
छान्दोग्योपनिषद में शाण्डिल्यऋषि का तत्व ज्ञान दार्शनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है | शाण्डिल्य सृष्टि मीमांसा में चरम सत्य तज्जलान को प्रथमत: सिध्द करते हैं | इस समस्त सृष्टि की उत्पति ,लय और स्थिति तज्जलान परम तत्व ब्रह्म में है |
“सर्व खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति ” ब्रह्म ही” तज्जलान ” है | अर्थात ज+ल+अन है | समस्त सृष्टि उस से ही तज्ज अर्थात उसी से उत्पन्न हुई है | “ल” अर्थात उसी ब्रह्म में तल्लीन हो जाती है |यह समस्त जगत अपनी स्थिति के समय उसी ब्रह्म में अनन-प्राणन अर्थात चेष्टा करता है | इसलिए “तदन” कहलाता है | शाण्डिल्य कर्म सिधान्त के समर्थक थे | उन के अनुसार मनुष्य कर्ममय है |इस लोक में मनुष्य जैसा कर्म निश्चय या व्यबसाय करता है वैसा ही मृत्युपरांत जन्म होता है | कर्म सिधान्त और पुनर्जन्म एक दुसरे पर आश्रित हैं ,ऐसा शाण्डिल्य का मानना है | गीता में भी कहा गया है जिस भाव को स्मरण करते हुए मनुष्य अंत में शरीर त्यागता है वह उसी के अनुरूप जन्म ग्रहण करता है | मनुष्य कर्म के अनुसार ही अपना भाबी जन्म के रास्ते को प्रशस्त करता है | ” कर्म” के सिधान्त को स्थापित करते हुए शाण्डिल्य ऋषि परलोक और पुनर्जन्म को निर्धारित करते है | वर्तमान जीवन का ही कर्म अगले जन्म का रास्ता बनाता है | भारतीय तत्वचिंतन में ऋषि शाण्डिल्य का महत्वपूर्ण योगदान है |
महान तत्ववेता ऋषि याज्ञवल्क्य आत्मा का “नति नेति” इस प्रकार निषेधात्मक पदों द्वारा निरूपण करते हैं | परन्तु शाण्डिल्य इस के विपरित ,आत्मा का निश्चयात्मक शब्दों में विधेयात्मक रूप से बर्णन करते हैं | ब्रह्म मनोमय है |”मनुतेSनेनेती मन:” जिस के द्वारा जीव मनन करता है वही मन है | जीव मन की वृतियों के कारण जीव बिषयों की और प्रवृत होता है | इसलिए वह मनोमय है | वह प्राण शरीर है ,लिंग शरीर ही प्राण है | प्राण ही जिस का शरीर है उसे प्राण शरीर कहते हैं |”आत्मा मनोमय और प्राण शरीर को मृत्युपरांत अन्य शरीर में ले जाती है “|
यह आत्मा चैतन्य रूप है | आत्मा सत्य है तथा आकाश की तरह सर्व व्यापक है ,वह रूप रहित सर्व कर्मा अर्थात सम्पूर्ण जगत की स्रष्टा और सर्व कर्म समर्थ है | यह सारा विश्व उस का कर्म है |वह सर्व सुगंध है |गीता में भी कहा गया है कि मैं पुष्प गंध हूँ इस का तात्पर्य यह है कि वह अपुष्प गंध -दुर्गन्ध से रहित है |जब कि मनुष्यों की घ्रानेंद्रिय सुगंध और दुर्गन्ध दोनों को ग्रहण करती है | इसलिए घ्रानेद्रिय को पाप से बिंधा हुआ माना जाता है | परन्तु ईश्वर का दुर्गन्ध रुपी पाप से संसर्ग न होने के कारण उसे सर्व गंध कहा गया है |वह सर्व रस है ,उस के हाथ पाँव नहीं हैं तो भी वह वेगवान है ,बिना नेत्र के देखता है बिना कान सुनता है ,वह आप्तकाम है अत: नित्य तृप्त है | आत्मा का साक्षात्कार होने पर मनुष्य की सभी कामनाएं पूरी हो जाती हैं |
शाण्डिल्य के मत से आत्मा महान भी है और सूक्ष्म भी है |वह अनंत और सूक्ष्म अति सूक्ष्म है | आत्माका स्थान शरीर के हृदय में है उन का तात्पर्य यह है कि वह लघु से लघु परिमाण से सूक्ष्म है | यहाँ एक जिज्ञासा स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है कि तो क्या आत्मा का अणु परिमाण है |इस का समाधान करते हुए शाण्डिल्य ऋषि कहते हैं कि ऐसा नहीं है क्यों कि यह आत्मा पृथ्वी ,अन्तरिक्ष ,,इन सभी लोकों की अपेक्षा से भी बड़ा है | अर्थात यह आत्मा अनंत परिमाण बाली है |
हृदयस्थ ब्रह्म और परब्रह्म की अभिन्नता -सर्वकर्मा ,सर्वकाम,सर्वगन्ध, सर्वरस इस सब को सब और से व्याप्त करने वाला.वाक् रहित और संभ्रम शून्य आत्मा ही हृदयस्थ ब्रह्म है क्यों कि इन गुणों से लक्षित होने वाले ब्रह्म का ध्यान अपेक्षित है,इन गुणों से युक्त नहीं |अत: यहाँ भी निर्गुण ब्रह्म का ही विवेचन है |हृदयस्थ ब्रह्म और परब्रह्म अभिन्न हैं |
मानव जीवन का लक्ष्य मृत्यु उपरान्त ईश्वर भाव की प्राप्ति है -शांडिल्य ऋषि के तत्व ज्ञान का सार यही है कि मनुष्य मरने पर ब्रह्म में लीन हो जाता है अर्थात देहत्याग के अनन्तर वह सत्स्वरूप हो जाता है | मानव जीवन का अनन्तकाल से चरम लक्ष्य यही रहा है कि वह मरणोंपरान्त आत्मा -ब्रह्मा में लीन हो जाए |
