निर्गुण -सगुण ब्रह्म

श्री कृष्ण के मथुरा चले जाने के बाद गोकुल वासी उन के वियोग से दुखी हो गये | नन्द यशोदा ,ग्वाल और गोपियों को सभी को उन की जुदाई सताने लगी | गोपियाँ श्री कृष्ण से प्रेम करतीं थीं उन की वेदना अपेक्षाकृत अधिक थी |उधर श्रीकृष्ण को भी मथुरा में गोपियों की याद आती रहती थी ,उन के प्रेम का प्रभाव श्रीकृष्ण पर था |श्रीकृष्ण के एक मित्र उद्धव थे ,वे ज्ञान मार्ग के समर्थक थे उन के इसी ज्ञान मार्ग के गर्व को चूर करने के उदेश्य से उन्हें गोकुल भेजना चाहा | इस से एक तो गोपियों को तसल्ली मिलेगी दूसरा उद्धव के ज्ञान पर प्रेम का प्रभाव होगा | इसलिए उन्होंने उद्धव को अपनी प्रेमका गोपियों के पास अपना संदेश देकर भेजना चाहा |

उसी समय उद्धव जी वहां पर आ गये | दोनों मित्र हैं दोनों में शारीरिक और आंतरिक साम्य भी है | उद्धव जी ज्ञान मार्गी हैं ,उन का प्रेम और भक्ति में विश्वास नहीं है | श्रीकृष्ण ने सोचा अगर उन का भी प्रेम और भक्ति में विश्वास होता तो कितना अच्छा होता | लेकिन उन के ह्रदय में ज्ञान ने दृढ़ता पूर्वक स्थान जमा रखा था |ये दृढ ज्ञानी हैं तो गोपियों को योग सिखा कर देखें उन को गोपियों के आगे मात खानी पड़ेगी |

श्रीकृष्ण जी कहते हैं कि हे उद्धव मैं तुम्हें ब्रज भेज रहा हूँ आप तुरंत वहां के लिए प्रस्थान कर जाओ | आप ज्ञानी हैं |आप ब्रह्म को यह जानते हैं कि वह पूर्ण है ,अखंड है और अविनाशी है |उस ब्रह्म की न तो कोई रूप रेखा है ,न जाति है , न कुल है और न ही माता पिता ही हैं अर्थात ब्रह्म एक और अद्वितीय है | इस प्रकार का ज्ञान मार्ग का उपदेश आप गोपियों को भी दे आओ | वे मेरे विरह रुपी नदी में डूव रही हैं | और साथ ही कहना कि ब्रह्म के बिना मुक्ति नहीं यदि आप मुक्ति चाहती हैं तो निर्गुण ब्रह्म को अपना लो | आप शीघ्र ही ब्रज को प्रस्थान कर जाओ हमारे प्रेम का संदेश सुना कर प्यारी गोपियों के दुःख को दूर करो, तुम ब्रज को जा रहे हो तो एक संदेश मेरा भी गोपियों को देना वह यह कि श्रीकृष्ण अपने माता पिता देवकी और वसुदेव का प्रेम देख कर मथुरा आये हैं न तो वे गोपियों के प्रियतम हैं और न यशोदा के पुत्र हैं | कहाँ तो छोटी सी आयु के श्रीकृष्ण और कहाँ तुम मतवाली ग्वालनें ? आप सब ने उन्हें अपने वश में कर लिया था | इसीलिए तो श्रीकृष्ण ने मथुरा को छोड़ दिया था |

उद्धव को दूर से देख कर गोपियें कह रही हैं | कोई कृष्ण की भान्ति ही श्याम शरीर का आ रहा है |उस के वस्त्र भी वैसे ही हैं अर्थात जिस प्रकार श्रीकृष्ण पीताम्बर धारण किया करते थे वैसे ही इस नये आने वाले व्यक्ति ने धारण कर रखे हैं ,वह रथ में भी वैसे ही बैठा है | उस के गले में उसी प्रकार की माला भी शोभा दे रही है | राह देखते ही गोपियाँ जैसी स्थिति में थीं वैसे ही उठ खडीं हुईं और अपने घर के सब कामों को छोड़ कर दौड़ पड़ीं | उन को श्रीकृष्ण के रूप का स्मरण हो आया और वे प्रेम विभोर हो गयी | इसी बीच उद्धव उन के समीप तक पहुंच गये ,पर उद्धव को देख कर वे स्तब्ध रह गयीं कि यह व्यक्ति तो कोई दूसरा ही आ निकला | उद्धव को देख कर कोई सखी उस से पूछती है कि आप यह तो बताइए कि आप कहाँ से आये हैं |ऐसा लगता है आप को श्रीकृष्ण ने भेजा है आप का रंग भी वैसा ही है ,वस्त्र भी वैसे ही पहने हैं ,आप के शरीर पर आभूषण भी उसी प्रकार के हैं | अब आप किसे ले जाने के लिए आये हैं | एक सखी कहती है कि उद्धव के उपदेश को ध्यान से क्यों नहीं सुनती हो |इन्हें तो श्रीकृष्ण ने यहाँ भेजा है | वे उन्हें अपने साथ लिए ब्रज के राजा नंद के पास ले आयीं | गोपियों की आंगन में भीड़ लग गई ,उद्धव जी उन से मिल कर बैठ गये |श्रीकृष्ण की समस्त सम्बन्धियों सहित कुशल पूछ कर सभी गोपियाँ गदगद हो गयीं और उन्होंने उद्धव के पैर पकड़ लिए | ब्रज की गोपियों के इस तरह के प्यार भाव को देख कर उद्धव जी प्रेममग्न हो गये| उद्धव जी अपने मन में सोचने लगे कि श्रीकृष्ण की यह बात समझ में नहीं आती कि उन्होंने ब्रज के ऐसे प्रेम को भुला कर मुझे ब्रज की स्त्रियों को योग सिखाने के लिए क्यों भेज दिया है | गोपियों की यह दशा थी की पत्री भी ठीक से नहीं पढ़ी जा रही थी क्यों की उन के नेत्र हर्ष के आंसुओं से भर रहे थे |गोपियों के इस प्रकार के प्रेम को देख कर उद्धव का ज्ञान का गर्व दूर हो गया | इस के पश्चात सब को ज्ञान देने के लिए गुरु की तरह सहेज कर रखी हुई कथा को उन्होंने कहना शुरू किया |

उद्धव जी कहते हैं -कि तुम मुझ से योग के बारे में सीखो और इन सांसारिक बिषय भोगों को छोड़ दो | श्रीकृष्ण के प्रेम से बढ़े हुए गोपियों के ह्रदय को इस प्रकार के व्रत की बात सुन कर बहुत दुःख हुआ | वे कहने लगीं हम योग के बारे में क्या जाने ?श्रीकृष्ण के व्रत को छोड़ कर योग् व्रत साधना को कौन पूरा करे अर्थात हम तो श्रीकृष्ण के प्रेम को जानती हैं ,योगी लोग तो चित्र या बिंदु को ह्रदय को एकाग्र करते हैं उस के बारे में हम क्या जाने ,जो जाना न जा सके ,जो पकड़ा न जा सके,,जिस का पार न पाया जा सके क्या उस को जानना सम्भव है ? जो माया रहित है उसे ही सब योगी ध्यान लगा कर देखते हैं | नेत्र और नासिका के अग्र भाग जिसे त्रिकुटी कहा जाता है ,बहां पर ब्रह्म का निवास है ,वह अविनाशी है ,कभी नष्ट नहीं होता ,वह ज्योति स्वरूप है और स्वाभाविक रूप से स्वयं प्रकाशित है ऐसा ज्ञानियों का मत है | परन्तु हमारा मन तो श्रीकृष्ण से लगा हुआ है वह यदि घूमेगा भी तो फिर लोट कर वहीँ आ जाएगा | ऐसी दशा में हम श्रीकृष्ण के प्रेम से अपने मन को हटा कर भुलावे में नहीं पड़ना चाहतीं | ये उद्धव तो मुर्ख है जो हम जैसी कृष्ण के प्रेम में पड़ी हुई गोपियों को योग साधना सिखा रहा है | हमें तो भूली हुई कहते हैं सोचो क्या हम भूली हुई हैं ? उद्धव अँधा हो गया है अर्थात हमारी और से आप ने आँखें बंद कर ली हैं ,उद्धव आप तो ज्ञान के गर्व से अंधे हो आप को असली मार्ग कैसे सूझ सकता है ,कभी आप शास्त्रों का प्रमाण देते हो कभी वेदों के अनुसार ज्ञान की बातें समझाते हो लेकिन हम पूछती हैं ब्रह्म तो अंतहीन है उस का पिता कौन है ,और माता कौन है ?तो बताइए यशोदा ने ऊखल से किस को बाँधा था यदि उस के नेत्र मुख नहीं तो माखन दहीं चुरा कर कौन खाता था |यशोदा ने किस को गोदी में खिलाया था ? किस ने अपनी बाल लीला करते हुए तोतले शब्द बोले थे ? हे उद्धव ,ये बातें उसे ठीक लग सकती हैं जिसे नेत्रों से कुछ दिखाई नहीं देता हो | हे उद्धव सच बताना आप ही बताइए कि योग के नियम अच्छे हैं या प्रेम के ,दोनों में कौन श्रेष्ठ है | योग साधना तो उस को करनी चाहिए जिसे अनेक योगिक कष्ट सहन करने के बाद भी ब्रह्म की प्राप्ति संभव नहीं है | हे उद्धव सच सच बताना भला योग की साधना श्रेष्ठ है या प्रेम का मार्ग ,प्रेम से प्रेम होता है और प्रेम से इस संसार से पार जाया जा सकता है अर्थात यदि आप सामान्य किसी से प्रेम करोगे तो उस के प्रेम की प्राप्ति कर सकोगे और यदि यही प्रेम ईश्वर से होगा तो संसार सागर से पार हो जाओगे | संसार प्रेम के बंधन में ही बंधा हुआ है |प्रेम द्वारा ही सुंदर जीवन्मुक्ति की प्राप्ति हो सकती है | अर्थात प्रेम करने की वास्तविकता यह है कि उस के द्वारा श्रीकृष्ण की प्राप्ति का प्रयत्न हो |

गोपियों की बातें सुन कर उद्धव जी अपनी योग साधना की बैटन को भूल गये | वे श्रीकृष्ण के गुण गाते हुए ब्रज के कुंजों में आनंद से मस्त हुए घूमने लगे ,क्षण मात्र में ही वे गोपियों के पैर पकड़ लेते और कहते कि तुम्हारा प्रेम धन्य है ,कभी वे दौड़ कर पेड़ों से लिपट जाते | इस तरह उद्धव जी प्रेम से छक कर अपनी सुध-बुध खो बैठे | वे कहने लगे कि ब्रज की गोपियाँ धन्य हैं ,यहाँ के गोप धन्य हैं और वे वन में विचरने वाली गौएँ भी यहाँ की धन्य हैं |यह ब्रज की भूमि भी धन्य है जहाँ श्रीकृष्ण जी ने बिहार किया था ,यहाँ पर घूम फिर कर आनन्द किया था ,मैं ब्रज की युवतियों को ज्ञान मार्ग उपदेश देने के लिए आया था परन्तु मुझे स्वयं यहाँ आ कर उपदेश प्राप्त हुआ ;प्रेम मार्ग का उपदेश, मैंने गोपियों से सीखा है | उपदेसन आयो हुतो मोंहि भयो उपदेस |

उधो जदुपति पे गय,हो,किए गोप को बेस ||

भूल्यो,जदुपति नाम,कहत गोपाल गोसाईं |

एक बार ब्रज जाहू देहु गोपिन दिखराई ||

गोकुल को सुख छांडी के कहाँ बसे हो आय |

कृपावंत हरी जानी के ,हो,ऊधो पकरो पाय ||

देखत ब्रज को प्रेम नेम जझु नाहिन भावे |

उमड़ यो नयननि नीर बात कछु कहत न आवै ||

सूर स्याम भूतल गिरे ,रहे नयन जल छाय |

पौछि पीतपट सौं कह्यो ,आए जोग सीखाय ? ||

इस के पश्चात उद्धव जी श्रीकृष्ण के पास गये | वे ब्रज से प्रेम की शिक्षा ले कर आये थे वे गोप का भेष बना कर उन से मिले और पहले जो जदुपति सम्बोधन से पुकारते थे उस का त्याग कर के जिस सम्बोधन से गोपियें श्रीकृष्ण को पुकारती थी उसी सम्बोधन को अपनाया | परिणाम स्वरूप उन्होंने गोपाल और गुसाईं कहा | हे गोपाल आप एक बार ब्रज को जाओ और गोपियों को अपने दर्शन दे आओ | आप गोकुल के सुख को छोड़ कर कहाँ आ बसे हो | उद्धव जी जानते थे कि श्रीकृष्ण कृपा करने वाले हैं अत: वे अपने अपराध से लज्जित हुए ओर उन के चरणों में गिर पड़े अर्थात उन्हें ज्ञान का गर्व था और प्रेम को तुच्छ समझते थे | वे श्रीकृष्ण से कहने लगे कि योग साधना की बातें अच्छी नहीं लगती | उन के नेत्रों से अश्रु वह रहे थे और गदगद कंठ होने से वचन नहीं निकल रहे थे | सूरदास जी कहते हैं कि इस अवस्था को प्राप्त हुए उद्धव जी श्रीकृष्ण जी के सामने पृथ्वी पर गिर पड़े | नेत्रों से अश्रु धारा बह रही थी | श्रीकृष्ण जी ने अपने पीतपट से उन के आंसुओं को पौंछा और उन से कहा कि गोपियों को योग मार्ग की साधना सिखा आये ?

इति |

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