नारद -एक परिचय

भारत के ज्ञान और विज्ञान को जानने वाले महऋषि नारद जी का हमारे पुराणों में बार बार उल्लेख मिलता है | वे राजा हरिश्चंद्र के पुरोहित थे ,और उन्हें अश्वमेध यग्य करने की सलाह इन्होंने ही दी थी | महाभारत में नारद को वेद और उपनिषदों का जानने वाला ,इतिहास -पुराणों के विशेषज्ञ ,न्याय और धर्म के तत्व को जानने वाला,शिक्षा ,व्याकरण ,आयुर्वेदादि के आचार्यों में श्रेष्ठ ,प्रभावशाली वक्ता,संगीत-विशारद -षाडगुन्य प्रयोग में निपुण और शास्त्रों में प्रवीण बताया गया है | नारद जी चाहें जहाँ भ्रमण करने वाले ऋषि थे | इसलिए उन का आवागमन तीनों लोकों में रहता था |

ऋषि नारद ने उपनिषद युग की समस्त विद्याओं का अध्ययन किया था | वे शास्त्रों के प्रकाण्ड पंडित थे | उन्होंने ऋग्वेद,यजुर्वेद,सामवेद और अथर्ववेद एवं पांचवे वेद इतिहास पुराण ,पित्र्य-शुश्रूषाविज्ञान ,राशि (गणित) उत्पात विज्ञान,निधि शास्त्र अर्थात अर्थशास्त्र ,भौतिकी,रसायन तथा प्राणी शास्त्र ,निरुक्त ,,तर्क शास्त्र,नीति शास्त्र ,ज्योतिष ,बिष ज्ञान,ललित कला इन सब विद्याओं का अध्ययन किया था |नारद ही एक मात्र ऐसे ऋषि थे जिन्होंने इतने विविध प्रकार के ग्रन्थों का अध्ययन किया था | उन का ज्ञान बहुआयामी था | वे शास्त्रवेता तो हो गये परन्तु आत्म वेता नहीं थे | शास्त्रों को जानना और आत्म ज्ञान को प्राप्त करना अलग अलग है |मन्त्र वेता से नारद आत्म वेता बनना चाहते थे | क्यों कि आत्म वेता ही मन के परितापरुपी शोक को पार कर सकता है | मन ही बंधन और मोक्ष का कारण है |आत्म वेता के लिए कोई शोक और मोह शेष नहीं रहता | नारद भी आत्म ज्ञानी न होने के कारण सदैव अकृतार्थ बुद्धि से शोकमग्न रहते थे | वे महर्षि सनत्कुमार से निवेदन करते हैं कि मुझ मन्त्र वेता को आत्म वेता बना दीजिए | आत्मज्ञान रुपी नौका से मुझे शोकसागर के पार पहुंचा दीजिए | जो आत्मा को जान जाता है वह दुखसागर को तर जाता है |नारद भी शोक सागर में डूब रहे थे | वे भी भवसागर से जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होना चाहते हैं | क्यों कि शास्त्र ज्ञान तो नाम मात्र है | यथार्थ ज्ञान आत्मज्ञान है | आत्मज्ञान ही मानव मुक्ति का साधन है, शास्त्र ज्ञान नहीं |

शास्त्र ज्ञान ही नाम् ज्ञान है |आत्मवित होने के लिए नाम ज्ञान तो सीढ़ी का प्रथम हिस्सा है ,मनुष्य को नाम तक नहीं रुकना चाहिए | नारद विनम्र प्रकृति के व्यक्ति थे ,आत्मज्ञान के क्षेत्र में सनत्कुमार नारद के गुरु थे | उन्होंने उन्हें आत्मवित बनाया | दार्शनिक परंपरा में ज्ञान काण्ड ,कर्मकांड तथा नामरूप वेद्बिद्या से आत्मबिद्या को श्रेष्ठ बताया गया है | मऋषि सनत्कुमार आत्म बिद्या के प्रतीक हैं तो नारद वेद्बिद्या के | नारद संहिता में शिष्य के आचरण के बिषय में उन के बिचार महत्वपूर्ण ही नहीं उल्लेखनीय हैं | विद्यार्थी-ज्ञानार्थी को हमेशा गुरु का निम्नवर्ती होना चाहिए |नारद सनत्कुमार संवाद में उन्होंने स्वयं यही चरितार्थ किया है |

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