एक परमात्मा
समस्त चराचर जगत में एक आत्मा ,परमात्मा या एक भगवान को देखने बाला धर्म ही वास्तविक धर्म है | वस्तुतः एक आत्मा या भगवान् के अतिरिक्त नाम रूप की सता ही कहाँ है ? बस देखना सीख लीजिये |नाम रूप को सता देकर आप उस को कभी नहीं देख पायेंगे ,जिस को देखना आप का परम धर्म है | आप पुत्र को देख रहे हैं ,पत्नी को देख रहे हैं ,मनुष्य तथा पशु को देख रहे हैं परन्तु उन सब में उन में स्थित आत्मा को नहीं देखते | इसी से पागल की तरह ठोकरें खाते इधर उधर भटकते फिर रहे हैं |
स्थूल,सूक्ष्म और कारण शरीर रुपी पोशाक उतार दीजिए ,जागृत ,स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं को त्याग दीजिए ,फिर सारे जगत में सर्वत्र सदा परमात्मा के दर्शन होने लगेंगे | यही आप का सच्चा धर्म है | आप निसंक हैं अर्थात आप की शंका का समाधान हो गया -इन शरीरों तथा अवस्थाओं के साथ आप का वस्तुतः कोई सम्बन्ध नहीं है | आप हमेशा हैं अर्थात नित्य हैं -न कर्ता हैं ,न भोक्ता हैं ,न जन्म लेने वाले हैं ,न मरने वाले | यह सब तो जड हैं ,आप चेतन हैं | सभी चेतन हैं | एक चेतन परमात्मा के अतिरिक्त अन्य कुछ है ही नहीं | आप की आँखों पर नाम रूप का पर्दा पड़ा है | इसी कारण रस्सी में सांप दिखाई दे रहा है |
सत शास्त्रों का चश्मा लगा कर देखिये अर्थात शास्त्रों को पढिये ,सर्वत्र एक परमात्मा ही दिखाई देंगे | सारे संसार में एक परमात्मा ही भरे हैं | उन्हीं को देखिये ,वही आप का स्वरूप है और यह स्वदर्शन ही धर्म है | सारे साधनों का यही एकमात्र फल है | मानव मात्र से प्रेम कीजिये वह भी तो तुम ही हो | फिर अपना पराया कौन है ?
