प्रथम:स्कन्ध:-षष्ठोSध्याय (श्रीमद्भागवत)
नारद जी के पूर्वचरित्र का शेष भाग – व्यास जी की जिज्ञासा नारद जी की शेष आयु कैसे व्यतीत हुई और मृत्यु के समय उन्होंने किस बिधि से अपने शरीर का परित्याग किया | काल तो सभी वस्तुओं को नष्ट कर देता है उस ने नारद जी की पूर्व कल्प की स्मृति कैसे नष्ट नहीं की |
नारद जी को ज्ञानोपदेश करने वाले महात्मागण जब चले गए ,तब उन्होंने इस प्रकार अपना जीवन व्यतीत किया उस समय उन की अवस्था बहुत छोटी थी ,वे अपनी मा के इकलोते बेटे थे एक तो वह स्त्री थी ,दूसरे मूढ़ और दासी थी उस के सिबा उन का कोई सहारा नहीं था |उस ने नारद के स्नेहपाश में अपने आप को जकड़ रखा था ,वह नारद की योगक्षेप की चिंता करती थी ,लेकिन पराधीन होने के कारण कुछ नहीं कर पाती थीं | जैसे कठपुतली नचाने वाले की इच्छा के अनुसार ही नाचती है वैसे ही यह सारा संसार ईश्वर के अधीन है | वह भी अपनी माँ के स्नेह बंधन में बन्ध कर उस ब्राह्मण बस्ती में ही रहे | एक दिन जब माँ गौ दुहने घर से बाहर गई तो रास्ते में सांप ने डंस लिया |सांप का कोई दोष नहीं था काल की प्रेरणा थी |नारद जी ने समझा की यह भी भगवान का ही अनुग्रह है ,उस के बाद वह उतर की और चले गए |
उस मार्ग में उन्हें अनेकों धन धान्य से परिपूर्ण कई देश ,नगर,गाँव ,,नदी,पर्वत ,धातुओं से युक्त विचित्र पर्वत दिखाई दिए | वे अकेले ही इतने लम्बे मार्ग में जहाँ वन,वृक्ष,जलाशय,गहन जंगल थे आगे बढ़ते गये | चलते चलते उन का शरीर थक गया ,उन्हें बड़े जोर की प्यास लगी ,भूखे भी थे ,वहां उन्हें एक नदी मिली ,उस के जल कुण्ड में स्नान ,जलपान और आचमन किया ,इस से उन की थकावट मिट गई | वन में वट वृक्ष के नीचे आसन लगा कर बैठ गए और हृदय में रहने वाले परमात्मा के स्वरूप का मन ही मन ध्यान करने लगे | भक्ति भाव से वशीकृत भगवान के चरणकमलों का ध्यान करते ही भगवत प्राप्ति की लालसा से नेत्रों से आंसू छलछला आये और हृदय में धीरे धीरे भगवान प्रकट हो गए | उस समय प्रेमभाव के अत्यंत उद्रेक से उन का रोम रोम पुलकित हो उठा | हृदय अत्यंत शांत और शीतल हो गया | उस समय आनन्द की बाढ़ में वे ऐसे डूब गए कि उन्हें अपना और ध्येय वस्तु का कोई भी भान न रहा | भगवान् का वह अनिर्वचनीय रूप समस्त शोकों का नाश करने वाला और मन के लिए अत्यंत लुभावना था | सहसा उसे न देख वे बहुत ही बिकल हो गए और अनमना सा हो कर आसन से उठ खड़े हुए |
उन्होंने उस स्वरूप का दर्शन फिर करना चाहा ,किन्तु मन को हृदय में समाहित करके बार बार दर्शन की चेष्टा करने पर भी वह उसे नहीं देख सका |वह अतृप्त के समान आतुर हो उठा | इस प्रकार निर्जन वन में प्रयत्न करते देख स्वयं भगवान ने ,जो बाणी के विषय नहीं हैं बड़ी गम्भीर और मधुर वाणी से उन के शोक को शांत करते हुए उन से कहा – खेद है कि इस जन्म में तुम मेरा दर्शन नहीं कर सकोगे | जिन की वासनाएं पूर्णतया शांत नहीं हो गई हैं ,उन अधकचरे योगियों को मेरा दर्शन अत्यंत दुर्लभ है | निष्पाप बालक ,तुम्हारे मन में मुझे प्राप्त करने की लालसा जाग्रत करने के लिए ही मैंने एक बार तुम्हें अपने रूप की झलक दिखाई है | मुझे प्राप्त करने की आकांक्षा से युक्त साधक धीरे धीरे हृदय की सम्पूर्ण वासनाओं को भलीभांति त्याग कर देता है | अल्पकालीन संत सेवा से ही तुम्हारी चितवृति मुझ में स्थिर हो गई है | अब तुम इस प्राकृत मलिन शरीर को छोड़ कर मेरे पार्षद हो जाओगे | समस्त सृष्टि का प्रलय हो जाने पर भी मेरी कृपा से तुम्हें मेरी स्मृति बनी रहेगी | आकाश के समान अव्यक्त सर्व शक्तिमान महान परमात्मा इतना कह कर चुप हो गए | उन की इस कृपा का अनुभव करके उन्होंने उन श्रेष्ठों से भी श्रेष्ठतर भगवान को सिर झुका कर प्रणाम किया | तभी से वह लज्जा संकोच छोड़ कर भगवान के अत्यंत रहस्यमय और मंगलमय मधुर नामों और लीलाओं का कीर्तन और स्मरण करने लगा | स्पृहा और मदमत्सर उन के हृदय से पहले ही निवृत हो चुके थे ,अब वे आनन्द से काल की प्रतीक्षा करता हुआ पृथ्वी पर विचरने लगा |
इस प्रकार भगवान की कृपा से नारद जी का हृदय सुद्ध हो गया ,आसक्ति मिट गयी और वह श्रीकृष्ण परायण हो गए | कुछ समय बाद ,ऐसे एकाएक बिजली कौंध जाती है ,वैसे ही अपने समय पर नारद जी की मृत्यु हो गयी | उन्हें शुद्ध भगवत्पार्षद शरीर प्राप्त होने का अवसर आने पर प्रारब्धकर्म समाप्त हो जाने के कारण पाचभौतिक शरीर नष्ट हो गया | कल्प के अंत में जिस समय भगवान नारायण प्रलय कालीन समुद्र के जल में शयन करते हैं ,उस समय उन के हृदय में शयन करने की इच्छा से इस सारी सृष्टि को समेत कर ब्रह्मा जी जब प्रवेश करने लगे ,तब उन के श्वास के साथ नारद जी भी उन के हृदय में प्रवेश कर गए | एक सहस्त्र चतुर्युगी बीत जाने पर जब ब्रह्मा जगे और उन्होंने सृष्टि करने की इच्छा की ,तब उन की इन्द्रियों से मरीचि आदि ऋषियों के साथ नारद जी भी प्रकट हो गए | तभी से वे भगवान की कृपा से वैकुण्ठ आदि में और तीनो लोकों में बाहर और भीतर बिना रोकटोक विचरण किया करता है | नारद जी के जीवन में भगवद भजन अखंडरूप से चलता रहता है वे उन की लीलाओं का गान करते हुए सारे संसार में विचरते रहते हैं | जब वे उन की लीलाओं का गान करने लगते हैं ,तब वे प्रभु ,जिन के चरण कमल समस्त तीर्थों के उद्गमस्थान हैं और जिन का यशोगान उन्हें बहुत ही प्रिय है ,बुलाये हुए की तरह उन के हृदय में आ कर दर्शन दे देते हैं | जिन लोगों का चित निरन्नतर बिषय भोगों की कामना से आतुर हो रहा है ,उन के लिए भगवान लीलाओं का कीर्तन संसार सागर से पार जाने का जहाज है ,यह उन का अपना अनुभव है | काम और लोभ की चोट से बार बार घायल हुआ हृदय श्री कृष्ण सेवा जैसी प्रत्यक्ष शान्ति का अनुभव करता है ,यम नियम आदि योग मार्गों से वैसी शान्ति नहीं मिल सकती |
इति -प्रथमस्कन्धे ६ध्याय
