एकादशोSध्याय -प्रथम:स्कन्ध:(श्रीमद्भागवत)

द्वारका में श्रीकृष्ण का राजोचित स्वागत -श्रीकृष्ण ने अपने आनर्त देश में पहुंच कर वहां के लोगों की विरह वेदना दूर करते हुए अपना पांचजन्य शंख बजाया | शंख की वह ध्वनी संसार के भय को भयभीत करने वाली है |उसे सुन कर सारी प्रजा अपने स्वामी श्रीकृष्ण के दर्शन की लालसा से नगर के बाहर निकल आयी | श्रीकृष्ण आत्माराम हैं वे अपने आत्म लाभ से ही सदा सर्वदा पूर्णकाम हैं ,फिर भी जैसे लोग बड़े आदर से भगवान सूर्य को भी दीप दान करते हैं ,वैसे ही अनेक प्रकार की भेंटें से प्रजा ने श्री कृष्ण का स्वागत किया | सब के मुख मण्डल ख़ुशी से खिल उठे ,वे भगवान श्रीकृष्ण की वैसे ही स्तुति करने लगे जैसे एक बच्चा अपने पिता के आने पर तोतली बाणी में बातें करता है |

भगवान श्रीकृष्ण ने बन्धु बांधवों ,नागरिकों और सेवकों से उन की योग्यता के अनुसार अलग अलग मिल कर सब का सम्मान किया | किसी को सिर झुका कर प्रणाम किया ,किसी को बाणी से अभिवादन किया ,किसी को हृदय लगाया ,किसी से हाथ मिलाया और किसी को प्रेमभरी दृष्टि से देखा | जिस की जो इच्छा थी उसे वही वरदान दिया |

भगवान सब से पहले अपने माता पिता के महल में गए वहां उन्होंने बड़े आनंद से देवकी और सातों माताओं के चरणों में सिर नवा कर प्रणाम किया | वहां से विदा ले कर वे अपनी सोलह हजार रानियों के महल में गए |अपने प्राणनाथ भगवान श्रीकृष्ण को आया देख कर उन के हृदय में बड़ा आनन्द हुआ |

जैसे वायु बांसों के घर्षण से दावानल पैदा करके उन्हें जला देती है वैसे ही पृथ्वी के भार भूत और शक्तिशाली राजाओं में परस्पर फूट डाल कर बिना शस्त्र ग्रहण किये ही भगवान ने उन्हें कई अक्षोहिनी सेना सहित एक दूसरे से मरवा डाला | साक्षात परमेश्वर ही अपनी लीला से इस संसार में अवतीर्ण हुए थे | यही तो भगवान की महता है कि वे प्रकृति में स्थित होकर भी उस के गुणों से कभी लिप्त नहीं होते ,जैसे भगवान की शरणागत बुद्धि अपने में रहनेवाले प्राकृत गुणों से लिप्त नहीं होती | वे मूढ़ स्त्रियां भी श्रीकृष्ण को अपना एकांत सेवी ,स्त्रीपरायण भक्त ही समझ बैठीं थीं ,क्यों कि वे अपने स्वामी के एश्वर्य को नहीं जानती थीं -ठीक वैसे ही जैसे अहंकार की वृतियां ईश्वर को अपने धर्म से युक्त मानती हैं |

इति-एकादशोSध्याय प्रथम स्कन्ध

द्वादशोSध्याय -प्रथम:स्कन्ध:- परीक्षित जन्म -अश्वत्थामा ने जो अत्यंत तेजस्वी ब्रह्मास्त्र चलाया था ,उस से उतरा का गर्भ नष्ट हो गया था,परन्तु भगवान ने उसे पुन: जीवित कर दिया | धर्मराज युधिष्ठर अपनी प्रजा को प्रसन्न रखते हुए पिताके समान उस का पालन करने लगे | उन के पास अतुल्य सम्पति थी ,उन की रानियाँ और उन के भाई उन के अनुकूल थे | सारी पृथ्वी उन की थी | वे जम्बू द्वीप के स्वामी थे और उन की कीर्ति स्वर्गलोक तक फैली थी ||

उतरा के गर्भ में स्थित बीर शिशु परीक्षित जब अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र के तेज से जलने लगा ,तब उस ने देखा कि उस की आँखों के सामने एक ज्योतिर्मय पुरुष है | उस का स्वरूप बहुत ही निर्मल है ,अत्यंत सुन्दर श्याम शरीर है | बिजली के समान चमकता हुआ पीताम्बर धारण किये हुए हैं सिर पर सोने का मुकुट झिलमिला रहा है | उस निर्विकार पुरुष की बड़ी ही सुन्दर लम्बी लम्बी चार भुजाएं हैं कानों में सोने के सुन्दर कुण्डल हैं ,आँखों में लालिमा है | उस पुरुष को अपने समीप देख कर वह गर्भस्थ शिशु सोचने लगा कि यह कौन है | इस प्रकार उस दस मास के शिशु के सामने ही धर्म रक्षक भगवान श्रीकृष्ण के तेज को शांत करके वहीं अंतर्ध्यान हो गये थे | पुत्र के जन्म का समाचार सुन कर धर्मराज युधिष्ठर मन में बहुत प्रसन्न हुए | उन्होंने धौम्य ,कृपाचार्य आदि ब्राह्मणों से मंगल वाचन और जातकर्म संस्कार करवाए | महाराज युधिष्ठर दान के योग्य समय को जानते थे | उन्होंने नाल काटने के पहले ही ब्राह्मनों को सुबर्ण,गौएँ ,पृथ्वी,गाँव ,उतम जाति के हाथी घोड़े और उतम अन्न का दान दिया | ब्राह्मणों ने युधिष्ठर से कहा पुरुवंश शिरोमणि -काल की गति से यह पवित्र पुरुवंश मिटना ही चाहता था लेकिन तुम लोगों पर कृपा करके भगवान विष्णु ने इस बालक की रक्षा कर दी | इसलिए इस का नाम विष्णुरात होगा | यह बालक संसार में बड़ा यशस्वी ,भगवान का परम भक्त और महापुरुष होगा |

ज्योतिष शास्त्र के बिशेषज्ञ ब्राह्मण राजा युधिष्ठर को इस प्रकार बालक के जन्मलग्न फल बता कर और भेंट पूजा लेकर अपने अपने घर चले गये | वही यह बालक संसार में परीक्षत के नाम से प्रसिद्ध हुआ ,क्यों की वह बालक गर्भ में जिस पुरुष का दर्शन पा चुका था ,उस का स्मरण करता हुआ लोगों में उसी की परीक्षा करता रहता था कि देखें इन में से कौन -सा वह है | राजकुमार अपने गुरुजनों के लालन -पालन से क्रमश:प्रतिदिन बढ़ता हुआ शीघ्र ही सयाना हो गया |

इसी समय अपने स्वजनों के वध का प्रायश्चित करने के लिए राजा युधिष्ठर ने अश्वमेध यग्य के द्वारा भगवान की आराधना करने का विचार किया लेकिन धन की कमी के कारण बड़ी चिंता में पड़ गए | भगवान श्रीकृष्ण की प्रेरणा से उन के भाई उतर दिशा में राजा मरुत और ब्राह्मणों द्वारा छोड़ा हुआ धन ले आये | उस से यग्य की सामग्री एकत्र करके महाराज युधिष्ठर ने तीन अश्वमेध यज्ञों के द्वारा भगवान् की पूजा की | इस के बाद भाइयों सहित राजा युधिष्ठर और द्रोपदी से अनुमति लेकर भगवान श्रीकृष्ण ने द्वारका के लिए प्रस्थान किया |

इति -द्वादशोSध्याय (प्रथम:स्कन्ध:)

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