श्रीमद्भागवत स्कन्ध:द्वितीय: प्रथमोSध्याय :
विषय -ध्यान के योग्य परमेश्वर का स्वरूप
राजा परीक्षित ने श्री शुकदेव जी से पूछा था कि मरने वाले आदमी को क्या करना चाहिए ? शुकदेव जी ने दूसरे स्कन्ध के पहले अध्याय में बताया कि मनुष्य का असली काम है ईश्वर का ध्यान करना ,लेकिन ध्यान किस का करे ,कैसा है वह ईश्वर ?यही इस अध्याय का सार है |
तस्माद भारत सर्वात्मा भगवानीश्वरो हरि: |
श्रोतव्य:कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्चे च्छ्ताभयम ||
इसलिए परीक्षित संसार में जिन्हें अपना अत्यंत घनिष्ठ सम्बन्धी कहा जाता है ,वे शरीर,पुत्र स्त्री आदि कुछ नहीं है ,असत है ,परन्तु जीव उन के मोह में ऐसा पागल सा हो जाता है कि रात दिन उन को मृत्यु का ग्रास होते देख कर भी चेतता नहीं |,जो अभय पदको प्राप्त करना चाहता है ,उसे तो सर्वात्मा,, सर्वशक्तिमान भगवान, ईश्वर और हरि श्रीकृष्ण की ही लीलाओं का श्रवण ,कीर्तन और स्मरण करना चाहिए |
व्याख्या -शुकदेव जी कहते हैं कि डर से मुक्त होना है तो एक ही उपाय है – ईश्वर को सुनो,गाओ और याद करो |यही ईश्वर के चार नाम दिए हैं ,हर नाम का मतलव समझो|
१, सर्वात्मा – वो सब के अन्दर रहने वाली आत्मा है | तुम में भी,मुझ में भी, पेड पौधों में भी | इसलिए किसी से नफरत मत करो |
2. भगवान – जिस के पास ६ गुण पूरे हों ज्ञान,शक्ति,बल,ऐश्वर्य,वीर्य और तेज |
3. ईश्वर -जो सब को काबू में रखता है ,सूर्य का समय पर निकलता है ,हवा चलती है ,यह सब उस का नियम है |
४. हरि – जो दुःख हर लेता है | मन से याद करो तो चिंता अपने आप मिट जाती है |
ध्यान कैसे करें -परीक्षित,आसन,श्वास,आसक्ति और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर के फिर बुद्धि द्वारा मन को भगवान के स्थूल रूप में लगाना चाहिए |
विशेषस्तस्य देहोSयं स्थविष्ठश्च स्थवीयसाम | यत्रेदं दृश्यते विश्वं भूतं भव्यं भवच्च सत ||अर्थात सम्पूर्ण विश्व जो दिख पड़ता है ,वही भगवान का स्थूल से स्थूल विराट शरीर है जल,अग्नि,वायु,आकाश ,अहंकार,पुरुष और प्रकृति -इन सात आवरणों से घीरे हुए इस ब्रह्मांड शरीर में जो विराट पुरुष भगवान हैं उन्हीं को धारण करके उन्हीं का आश्रय लेना चाहिए | उन का ध्यान इस प्रकार करना चाहिए –
तत्वज्ञ पुरुष उन का वर्णन इस प्रकार करते हैं – पाताल विराट पुरुष के तलवे हैं,उन की एडियाँ और पंजे रसातल हैं ,एडी के उपर की गांठें महातल हैं ,| भगवान के दोनों घुटने सुतल हैं,जांघें वितल और अतल हैं,पेडू भूतल है और उन के नाभिरूप सरोवर को ही आकाश कहते हैं | आदि पुरुष परमात्मा की छाती को स्वर्ग लोक ,गले को मह्लोक,मुख को जनलोक और ललाट को तपोलोक कहते हैं | उन के सहस्त्र सिरवाले भगवान् का मस्तक समूह ही सत्यलोक है | सूर्य,, चाँद तारे उन की आँखें हैं ,दोनों पलकें रात और दिन हैं ,| तालू जल है और जीभ रस है | वेदों को भगवान का ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं और यम को दाढ़ें| सब प्रकार के स्नेह दांत हैं और उन की जग मोहिनी माया को ही उन की मुस्कान कहते हैं |लज्जा उन का ऊपर का होंठ और लोभ नीचे का होंठ है | धर्म स्तन और अधर्म पीठ है |प्रजापति उन की मूत्रेन्दिय है ,मित्रा वरुण अंडकोष हैं और बड़े बड़े पर्वत उन की हड्डियाँ हैं|,नाड़ियाँ नदियाँ हैं,वृक्ष रोम हैं ,वायु स्वास है,काल उन की चाल है और गुणों का चक्कर चलते रहना ही उन का कर्म है || बादल उन के केश हैं ,संध्या उन अनन्त का वस्त्र है ,मूल प्रकृति को ही उन का हृदय बताया है और सब विकारों का खजाना उन का मन चंद्रमा कहा गया है | महतत्व को उन का चित कहते हैं ,रूद्र उन के अहंकार कहे गये हैं | सभी जानवर,पशु पक्षी उन के नख हैं | स्वायम्भुव मनु उन की बुद्धि है और मनु की संताने मनुष्य उन के निवास स्थान हैं | ब्राह्मण उन के मुख,क्षत्रिय उन की भुजाएं,वैश्य टांगें और शूद्र उन के चरण हैं | नाना प्रकार के जो यज्ञ जो किये जाते है ,वे उन के कर्म हैं | परीक्षित भगवान के स्थूल शरीर का यही विराट स्वरूप है |
मतलब यह पूरा संसार ही भगवान का शरीर है ,इस प्रकार का भाव बनाओ जो भी दिखे वह उसी का अंग है |
आज की सीख -(१) समय मत गंवाओ -श्लोक ४ में कहा गया है कि आदमी सोने ,खेलने,घर गृहस्थी में १०० साल गंवा देता है | इसलिए रोज 10 मिनट ही सही भगवान का ध्यान करो उस का नाम लो | (2)डर भगाओ – नौकरी, बिमारी और मौत का डर हो तो हरि नाम जपो,वो दुःख हरने वाला है | (3) सब में ईश्वर देखो – किसी से लड़ाई करने से पहले सोचो कि उस के अन्दर भी वही सर्वात्मा बैठा है |
निष्कर्ष -श्रीभागवत के दूसरे स्कन्ध के प्रथम अध्याय हमें यही सिखाता है कि ईश्वर दूर नहीं है ,सुनने,गाने और याद करने से मिल जाता है और यह सारा जगत ही उस का रूप है |इसलिए डरो मत,बस उस का ध्यान करो|
लेखक-मदन लाल शर्मा
वेबसाइट- thegodweknow ,com/.in
