श्रीमद्भागवत -द्वितीय: स्कन्ध:द्वितीय अध्याय :

विषय-योग साधना से भगवान् के स्थूल और सूक्ष्म रूप का चिन्तन – पहले अध्याय में शुकदेव जी ने बताया कि ईश्वर का ध्यान करो |अब राजा परीक्षित पूछते हैं कि ध्यान कैसे करें ,मन तो भागता है |दूसरे अध्याय में शुकदेव जी ध्यान की पूरी बिधि बताते हैं |

एतदेव सर्वेषां वेदानां परमं मतम | ध्यातीत,सच्चिदानन्द विष्णुं सर्वेश्वरम ||

सभी वेदों का सब से बड़ा मत है कि सच्चिदानन्द स्वरूप ,सब ईश्वरों के ईश्वर ,विष्णु का ध्यान करना चाहिए | अपने हृदय में नित्य विराजमान ,स्वत: सिद्ध आत्मस्वरूप ,परम प्रियतम ,परम सत्य जो अनन्त भगवान हैं बड़े प्रेम और आनन्द से पक्का निश्चय करके उन्हीं का भजन करें | भगवान् विष्णु का ध्यान करने से जन्म और मृत्यु के चक्कर में डालने वाले अज्ञान का नाश हो जाता है |

व्याख्या -शुकदेव जी कहते हैं कि ध्यान का सब से उंचा तरीका है विष्णु का ध्यान ,विष्णु यानी जो हर जगह व्यापक है |

ध्यान कैसे करें –

१. स्थूल रूप से शुरू करें -पहले भगवान के विराट रूप को देखो ,जैसे पहले अध्याय में बताया है |पहाड़,हड्डी,नदी,नाडी,सूर्य ,आंखें आदि |इस में मन टिक जाता है |

2. फिर सूक्ष्म रूप पर जाओ -जब मन लगने लगे तो चार भुजाओं में शंख,चक्र,गदा,पद्म धारण किये हुए , नारायण का ध्यान करो ,जिन्होंने पीले वस्त्र धारण किये हैं और जिन का श्याम रंग है |

3. अंत में निराकार में जाओ -जब यह रूप भी मन में बस जाये तो तेज,आनन्द,शांति का अनुभव होगा | यही सच्चिदानन्द है |

साधक को चाहिए कि वह अपने शरीर के भीतर हृदयाकाश में विराजमान भगवान के स्वरूप की धारणा करे |वह ऐसा ध्यान करे कि भगवान की चारों भुजाओं में शंख,चक्र,गदा और पद्म हैं | उन का मुख मण्डल पर प्रसन्नता झलक रही है ,कमल के समान विशाल नेत्र हैं ,वे पीला वस्त्र धारण किये हैं |भुजाओं में स्वर्ण और रत्नों से जडित बाजूबंद शोभायमान हो रहा है |सिर पर मुकुट और कानों में कुण्डल हैं जिन में बहुमूल्य रत्न जगमगा रहे हैं |गले में कौस्तुभ मणि लटक रही है | वे कमर में करधनी,उँगलियों में बहुमूल्य अंगूठी,चरणों में नूपुर और हाथों में कंगन आदि आभुषन धारण किये हुए हैं | उन का मुख कमल मंद मंद मुस्कान से खिल रहा है | जब तक मन इस धारणा के द्वारा स्थिर न हो जाये,तब तक बार बार इन चिन्तन स्वरूप भगवान को देखते रहने की चेष्टा करनी चाहिए | जैसे जैसे बुद्धि शुद्ध होती जायेगी ,वैसे वैसे चित स्थिर होता जाएगा ,जब एक अंग का ध्यान ठीक ठीक होने लगे ,तब उसे छोड़ कर दूसरे अंग का ध्यान करना चाहिए | ये भगवान दृश्य नहीं,द्रष्टा हैं | सगुण ,निर्गुण -सब कुछ इन्हीं का स्वरूप है | जब तक इन में अनन्य प्रेममय भक्तियोग न हो जाय ,तब तक साधक को नित्य नैमितिक कर्मों के बाद एकाग्रता से भगवान के उपर्युक्त स्थूल रूप का ही चिन्तन करना चाहिए |

योग धारणा की बिधि —

१. आसन -सुखासन में बैठ कर प्राणों को जीत कर मन से इन्द्रियों का संयम करें |

2. प्राणायाम- तदनन्तर अपनी निर्मल बुद्धि से मन को नियमित कर के मन के साथ बुद्धि को क्षेत्रज्ञ और क्षेत्रज्ञ को अंतरात्मा में लीन कर दें |फिर अन्तरात्मा को परमात्मा में लीन कर के धीर पुरुष उस पर शांतिमय अवस्था में स्थित हो जाये |

3. प्रत्याहार – इस अवस्था में सत्वगुण,रजोगुण और तमोगुण तीनो ही मिट जाते हैं ,अहंकार ,महतत्व और प्रकृति का भी वहां आस्तित्व नहीं है |योगी लोग यह नहीं,यह नहीं -इस प्रकार परमात्मा से भिन्न पदार्थों का त्याग करते हैं और शरीर तथा उस के सम्बन्धी पदार्थों में आत्म बुद्धि का त्याग करके हृदय के अन्दर भगवान के पूज्य स्वरूप का ध्यान करते हैं |वही विष्णु का परम पद है |

४. धारणा – भगवान का चरणों से ध्यान शुरू करो पहले पैर,फिर घुटने,फिर नाभि, ऐसे उपर बढो |

५. ध्यान – एक जगह मन टिक जाए तो वही ध्यान है |

६..समाधि -जब ध्याता और भगवान एक हो जाएँ तो समाधि लग गई |

तस्मात सर्वात्मना राजन हरि: सर्वत्र सर्वदा | श्रौत्वय: कीर्तित्वयश्च स्मर्तव्यो भगवान्न्रिणाम || अर्थ- इसलिए हे राजन ,सब प्रकार से हर जगह हर समय मनुष्यों को भगवान हरि का ही श्रवण,कीर्तन और स्मरण करना चाहिए |

आज के लिए सीख –

१. मोबाइल से ध्यान हटाओ दिन में ५ मिनट आँख बंद करके सिर्फ सांस को देखो |फिर भगवान का कोई एक रूप सोचो |

2. चरणों से शुरू करो ,पूरा रूप न सोच पाओ तो सिर्फ भगवान के चरण कमल सोचो ,वही बहुत है |

3. डर मत मानों – शुकदेव जी कहते हैं कि अन्त समय में भी अगर भगवान याद आ जाएँ तो काम बन जाता है |इसलिए अभी से आदत डालो |

निष्कर्ष – दूसरा अध्याय हमे ध्यान का विज्ञान सिखाता है स्थूल से सूक्ष्म की तरफ चलो |संसार को भगवान का रूप देखो ,फिर भगवान के साकार रूप को देखो ,फिर आनन्द में डूव जाओ |यही वेदों का मत है |संसार चक्र में पड़े हुए मनष्य के लिए ,जिस साधन के द्वारा उसे भगवान श्रीकृष्ण की प्रेममयी भक्ति प्राप्त हो जाए ,उस के अतिरिक्त और कोई भी कल्याणकारी मार्ग नहीं है |भगवान ब्रह्मा ने एकाग्र चित से सारे वेदों का तीन बार अनुशीलन करके अपनी बुद्धि से यही निश्चय किया कि जिस से सर्वात्मा भगवान श्रीकृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम प्राप्त हो ,वही सर्वश्रेष्ठ धर्म है |समस्त प्राणियों में उन के आत्मा रूप से भगवान श्रीकृष्ण ही लक्षित होते हैं ,क्यों कि यह बुद्धि आदि दृश्य पदार्थ उन का अनुमान कराने वाले लक्षण हैं ,वे इन सब के साक्षी एकमात्र द्रष्टा हैं | इसलिए मनुष्य को चाहिए कि सभी परिस्थितियों में अपनी पूरी शक्ति से भगवान श्री हरि: का ही श्रवण कीर्तन और स्मरण करना चाहिए |

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट -thegodweknow.com

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