वर्ण व्यवस्था ईश्वर रचित ?

यत्पिंडे तत्ब्रम्हांडे” जैसा शरीर है वैसा ही ब्रम्हांड है |हजारों वर्ष पहले भारतीय मनीषियों ने गहन अध्ययन कर के यह निष्कर्ष निकाला था कि प्रत्येक वस्तु की रचना का मूलाधार सूक्ष्म परमाणु है तथा असंख्य परमाणुओं से मिल कर वना यह शरीर का आकार आकाशीय सौर जगत से न केवल मिलता जुलता है बल्कि आकाश के ग्रह नक्षत्रों का मानव शरीर पर सूक्ष्म सौर जगत से सम्बन्ध भी रहता है और वे उस की गतिविधिओं पर लगातार प्रभाव भी डालते रहते है | यही कारण है कि आकाशीय ग्रहों की स्थिति के अनुसार पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्य के जीवन में हमेशा भिन्न भिन्न प्रकार के परिवर्तन आते रहते हैं |

जिस समय मनुष्य पृथ्वी पर जन्म लेता है उस समय आकाश मण्डल में विभिन्न ग्रहों की जो स्थिति होती है उस का प्रभाव बालक के जीवन को प्रभावित करता रहता है जन्मकुंडली बालक के जन्म समय में ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति की ही परिचायक है |अगर उस का गहन अध्ययन किया जाए तो मनुष्य के जीवन में क्षण क्षण में घटने वाली घटनाओं का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है |

वर्ण व्यवस्था ईश्वर प्रदत है ,मनुष्य जब जन्म लेता है उस समय कौन सा ग्रह कौन से भाव में स्थित है बालक की राशी क्या है, राशिनुसार उस का वर्ण निश्चित हो जाता है | राशियों में गुणों की प्रवृति जन्मजात होती है ,मनुष्य उसी के अनुरूप अपने जीवन में व्यवसाय चुनता है उसी के अनुरूप कार्य करता है ,वह चाहे किसी भी आधुनिक जाति में जन्मा हो | इस के अतिरिक्त उस की राशी के आगे पीछे वाली राशियें भी उस के व्यवसाय में और व्यवहार में समयानुसार वदलाव लाती रहती हैं |

मानव जीवन पर पड़ने वाले आकाशीय ग्रहों की गतिविधियों के प्रभाव का महर्षि भृगु ने विश्लेषण करके राशियों के स्बभाव के अनुसार, जिन राशियों का स्वभाव एक जैसा है उन्हें चार वर्णों में बिभाजित किया है |राशियें 12 हैं जो इस प्रकार है ,मेष,वृष,मिथुन ,कर्क ,सिंह,कन्या,तुला,वृश्चिक ,धनु,मकर,कुम्भ और मीन |जिस में कर्क,वृश्चिक और मीन -ब्राह्मण वर्ण ,इन का स्वभाव शांतिप्रिय,आत्मसयंम ,पवित्रता ,इमानदारी ,बुद्धि के मालिक और ज्ञानवान होते हैं |गीता के अनुसार शमदम,करुणा,प्रेमशील स्वभाव ,चरित्रवान जैसे गुणों के स्वामी होते हैं |

मेष,सिंह और धनु -क्षत्रिय वर्ण ,इन का स्वभाव और गुण ,शौर्य,सचरित्र ,शूरवीर और बहादुर होते हैं,न्याय और धर्म के लिए लड़ते हैं,अपनी ज़िमेवारियों को पूरा करने केलिए तत्पर रहते हैं ,साहस नेतृत्व और निष्ठां के साथ आत्म बलिदान के लिए तैयार रहते हैं | वृष,कन्या और मकर -वैश्य वर्ण ,यह का स्वभाव वैश्य चेतना वाले व्यक्ति में पाया जाने वाला एक स्वभाविक गुण है | उन में निरन्तर यही बिचार रहता है कि मुझे इस से क्या फायदा होगा या हानी होगी ,इस से इन्हें अपने सामाजिक दायरे और समाज में आर्थिक नियन्त्रण रखने की गुंजायश मिलती है व्याज से अपनी जीविका चलाते हैं |व्यापार आदि करते हैं | पशु पालना खेती करना भी वैश्य की प्रवृति है |

मिथुन,तुला और कुम्भ -शुद्र वर्ण ,इन का स्वाभाविक गुण जीविकोपार्जन के लिए दूसरों पर निर्भर रहते हैं ,इन का स्वभाव नवीन वस्तुओं का अविष्कार करना विचारशील धार्मिक और शांत है | उष्ण स्वभाव शिथिल शरीर व्यसनी होते हैं |

मनु स्मृति में इन्हीं चार वर्णों के स्वभावानुसार कार्यों का विभाजन किया गया है ,प्रथम अध्याय श्लोक ८८,८९,९०,९१ में क्रमशः ब्राह्मण, का कार्य पढना-पढाना,यग्य करना-यग्य कराना,दान देना-दान लेना यह छ: कर्म ब्राह्मणों के बनाये | प्रजा की रक्षा करना ,दान देना ,यग्य करना,वेद पढना,विषय जो गाना,,नाचना है उन में मन न लगायें यह क्षत्रियों के कार्य हैं |पशुओं की रक्षा करना ,दान देना ,यग्य करना ,वेद पढना,जल में नाव में ,जहाजों से और स्थल में भार ढोना,व्यापार करना,व्याज लेना,और खेती करना यह वैश्य के कार्य बताये गये हैं | शुद्र को एक ही काम बताया गया है वह कि ,द्वेषरहित होकर इन तीनों वर्णों की सेवा करे |

इसी प्राचीन वर्ण व्यवस्था में ही जातियों के बीज निहित थे |यही वर्ण व्यवस्था कालान्तर में जाति और उपजातियों में विभाजित हो गई | जातियों का रूप जो आज हम देखते हैं प्रारम्भ में ऐसा नहीं था लोग वर्ण के अनुसार अर्थात स्वभाव के अनुसार ही कार्य करते थे ,जाति बंधन नहीं था | लक्ष्मण जोशी और अविनाश चन्द्र ने अपने ग्रन्थों में इस बात के अनेक प्रमाण दिए हैं कि वेदों के प्रारम्भ में सभी प्रकार के वर्णों से उपर उठ कर लोग ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लेते थे और वर्णों की बात करें तो आज भी ऐसा हो रहा है | मनु ने हर वर्ण के लिए वताए गए धंधों को अटल बनाने का काम किया |पिता जिस वर्ण का होता था उस की संतानें भिन्न भिन्न वर्ण की होती हुई भी पिता के वर्ण का ही काम करने लग पड़ीं और यहीं से जाति प्रथा की शुरुआत हुई | उस की संताने स्वाभावानुसार काम करने के बाद भी पिता के ही वर्ण की ही मानी जाती हैं और यहीं जाति की उत्पति का कारण बना | प्रारम्भिक काल में अन्तर्वणीय आवागमन बहुत आसान था विश्वमित्र क्षत्रिय थे लेकिन कर्म के कारण उस समय के सर्वोच्च अलंकार ब्रम्ह ऋषि बने ,वाल्मीकि जन्म से शुद्र थे लेकिन साधना और तप के बल से महऋषि बने इस के विपरीत परशुराम ,द्रोणाचार्य जैसे उच्च ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के बाबजूद क्षत्रियोचित गुण अपना लिए थे |

जातियों की उत्पति एडरसन और पार्कर के अनुसार जाति सामाजिक वर्ग संगठन का वह चरम रूप है जिस की स्थिति पदानुक्रम में व्यक्तियों की स्थिति वंश और जन्म पर आधारित होती है | हिन्दू शास्त्रों के मत से जाति का मूल वर्णों में है | इस प्रकार मानव सृष्टि के प्रारम्भ से ही चार वर्णों की उत्पति मानी गई है |प्रत्येक व्यबस्था और कार्य के पीछे सम्बन्ध होता है | जाति शब्द जन से बना है जिस का अर्थ जन्म लेना ,इसलिए जाति का सम्बन्ध जन्म से है |वर्णों को ही जाती के नाम से जाना जाने लगा | ब्राह्मण को ब्राह्मण जाति,क्षत्रिय को क्षत्रिय जाति,वैश्य को वैश्य जाति और शुद्र को शुद्र जाति से जाना जाने लगा | वर्ण बिभाजन का आधार व्यक्ति के गुण और कर्म हैं जब की जाति की सदस्यता व्यक्ति को केवल अपने जन्म और वंशानुक्रम से प्राप्त होती है } प्राचीन वर्ण व्यवस्था में ही जातियों के जन्म के बीज निहित थे | मनु स्मृति में जातियों तथा उन के व्यवसायों का वर्णन है |सभी जातियों में वर्ण होते हैं और उन के व्यवसाय भी वर्णों के अनुसार ही होते हैं भले ही उन की जाति कोई भी हो, उन के स्वभाविक गुण वर्णों के अनुसार ही होते हैं |

प्रतिलोम(नीच वर्ण के पुरुष और उच्च वर्ण की स्त्री के बीच शारीरिक सम्बन्धों )तथा अनुलोम (उच्च वर्ण के पुरुष और नीच वर्ण की स्त्री के सम्बन्धों ) सम्बन्धों के कारण बहुत वर्णशंकर जातियां पैदा हुई जिन का वर्णन मनु स्मृति के दसम अध्याय में किया गया है तथा उन के व्यवसायों का वर्णन भी किया गया है | क्षत्रिय से ब्राह्मण कन्या के बिवाह से उत्पन्न संतान सूत कहलाती है और सूत पुरुष और ब्राह्मण कन्या की संतान मझाडा कहलाती है जो बांस का काम करता है | क्षत्रिय कन्या और सूत पुरुष से उत्पन्न संतान चमार कहलाती है | जो चमड़े का काम करते हैं | क्षत्रिय पुरुष से ब्राह्मण कन्या की अवैध संतान रथकार होती है वे शुद्र वृति के होते हैं तथा सवारियें ढोने वाले होते हैं,इन्हें शास्त्र धर्म वर्जित है | वैश्य और ब्राह्मण स्त्री के समागम से उत्पन्न सन्तान मागध और वैदेह कहलाती है उस का काम बन्दीजनों की सेवा करना है | ब्राह्मणी और शुद्र के समागम से उत्पन्न संतान चाण्डाल होती है जिस का कार्य मलमूत्र की सफाई करना है उन का दोपहर के बाद गाँव में प्रवेश वर्जित होता है | चाण्डाल और वैश्य कन्या से उत्पन्न संतान श्वपाक कहलाती है इन की जीविका का प्रमुख साधन कुत्ते पालना और उन का मांस खाना है | वैश्य पुरुष और क्षत्रिय कन्या से उत्पन्न संतान आयोगव कहलाती है इन का काम वस्त्र बनाना ,कताई करना और कांसे की वस्तुएं बनाना है| आयोगव पुरुष और ब्राह्मण कन्या के समागम से उत्पन्न संतानें ताम्बे की वस्तुएं बना कर जीविका चलाते हैं |आयोगव पुरुष और क्षत्रिय कन्या से उत्पन्न संतानें सनिक कहलाती हैं | वैश्य पुरुष और क्षत्रिय कन्या की अवैध संतान पुलिन्द कहलाती है यह कसाई का पेशा करते हैं | क्षत्रिय पुरुष और शुद्र कन्या से उत्पन्न अवैध संतान पुल्कस कहलाती है यह अपनी जीविका सूरा बना कर और उसे बेच कर चलाते हैं इस के अतिरिक्त मधु का दोहन और बिक्री भी करते हैं |पुल्कस से वैश्य कन्या से उत्पन्न संतान धोबी कहलाती है जो कपड़े धोने का काम करते हैं | क्षत्रिय कन्या और शुद्र की अवैध संतान रंगरेज कहलाती है जो कपड़ा रंगने का काम करते हैं |रंगरेज पुरुष और वैश्य स्त्री के समागम से उत्पन्न संतान नट कहलाती है | वैश्य स्त्री और शुद्र के समागम से उत्पन्न संतान ग्वाला कहलाती है जो अपनी जीविका पशु पाल कर और दूध बेच कर चलाते हैं |वैदेह से ब्राह्मणी से पैदा होने वाली सन्तान चमड़े का काम करने वाली होती है ,वैदेहिक पुरुष और क्षत्रिय कन्या से उत्पन्न दर्जी तथा रसोइया कहलाती है | वैश्य और शुद्र के अवैध समागम से उत्पन्न तेली कहलाती है ,इन की जीविका तेल निकालने और उस की बिक्री से चलती है |

ब्राह्मण द्वारा विधिवत बिवाह कर लाई गई क्षत्रिय कन्या से जो संतान उत्पन्न होती है वह अनुलोम द्विज कहलाती है वह व्यक्ति अथर्वेवेद की विधि से नित्य नैमितिक क्रिया करता है तथा राजा की आज्ञा से अश्व,रथ और हाथी पर चलता है सेनापति या वैद्य बन सकता है |क्षत्रिय कन्या और ब्राह्मण पुरुष के समागम से उत्पन्न अवैध संतान मिषक कहलाती है | वह वैद्य ,अष्टांग आयुर्वेद ,ज्योतिष,गणित के क्षेत्र में पांरगत हो सकती है | किसी ब्राह्मण पुरुष से विधिपूर्वक बिवाही गई वैश्य कन्या से उत्पन्न संतान को अम्बष्ट कहते हैं | वह खेती, लकड़ी, शस्त्र और ध्वज निर्माण कर के अपनी जीविका चलाते हैं | ब्राह्मण से वैश्या से उत्पन्न अवैध संतान कुम्हार या नाइ होती है | नाई को कायस्थ भी कहा जाता है इस में काक की चंचलता ,यमराज की क्रूरता और कारीगरी का मिश्रण होता है |ब्राह्मण पुरुष से विधिपूर्वक व्याही गई शुद्र कन्या से उत्पन्न संतान को पारशव कहा जाता है | इसे भद्र पुरषों के आश्रय में रहना चाहिए लेकिन ब्राह्मण और शुद्र कन्या से चोरी छिपे जो संतान होती हैं वह निषाद कहलाती हैं | वह वन में पशुओं को मार कर उन की बिक्री से अपनी जीविका चलाते हैं |विधिवत व्याही गई वैश्य कन्या से क्षत्रिय पुरुष द्वारा उत्पन्न सन्तान को वैश्य वृति से जीने का अधिकार दिया गया है ,लेकिन अवैध संताने मणिकार कहलाती हैं इन का काम मोतियों को बांधना है |

उपरोक्त सभी व्यवसाय जो जगत में जन्म लेता हैं चाहे वह वर्णशंकर हो या दुसरे वर्ण का हो उसी के अनुरूप कार्य करता है ,व्यवसाय किसी ब्राह्मण या किसी द्वारा किसी पर थोपे नहीं गए, स्वंम अर्जित हैं | जातियें भिन्न भिन्न हो सकती हैं लेकिन वर्ण चार ही हैं जो सभी जातियों में पाए जाते हैं और व्यक्ति उसी के अनुरूप कार्य करता है |वर्ण ईश्वर रचित हैं और यह स्वंम सिद्ध है | इस में कोई देश की सीमा नहीं है कोई धर्म की दीवार नहीं है |

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