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तैतिरिय उपनिषद :आत्मज्ञान का अमृत ग्रन्थ -ऋषि तितिरी की दिव्य वाणी

प्रस्तावना-भारतीय वैदिक परम्परा में उपनिषदों को वेदों का ज्ञानकाण्ड कहा जाता है |यदि वेद धर्म और कर्म का विधान हैं ,तो उपनिषद उस धर्म के मूल में स्थित आत्मा और ब्रम्ह के रहस्य को प्रकट करते हैं |इन्हीं प्रमुख उपनिषदों में तैतिरिय उपनिषद का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है |वह कृष्ण यजुर्वेद के तैतिरिय आरण्यक का भाग है और इस में आत्मज्ञान को अत्यंत सरल,वैज्ञानिक और अनुभूतिगम्य शैली में समझाया गया है |इस उपनिषद का सम्बन्ध ऋषि तितिरी से है ,जिन के नाम पर ही इस का नामकरण हुआ |यह केवल दार्शनिक ग्रन्थ नहीं,बल्कि जीवन जीने कि कला का शास्त्र है |

ऋषि तितिरी कौन थे ?

तैतिरिय उपनिषद की पृष्ठभूमि को समझने के लिया ऋषि तितिरी कि कथा जानना आवश्यक है | पौराणिक आख्यान के अनुसार महार्षि वैशम्पायन याज्ञवल्क्य के गुरु थे | एक बार किसी कारणवश गुरु वैशम्पायन ने क्रोधित हो कर अपने शिष्य याज्ञवल्क्य से कहा कि तुम ने जो वेद ज्ञान मुझ से प्राप्त किया है ,उसे वापिस कर दो | याज्ञवल्क्य ने योगबल से समस्त यजुर्वेद का वमन कर दिया |गुरु के अन्य शिष्यों ने तितिरी पक्षी का रूप धारण कर के उस वमित ज्ञान को चुग लिया और उसे धारण किया तितिरी रूप में ग्रहण किया गया ,यह ज्ञान ही तैतिरिय कहलाया और इस के द्रष्टा ऋषि तितिरी कहलाये |

दूसरी कथा के अनुसार तितिरी शब्द का अर्थ ही वह पक्षी है जो छोटे छोटे दानों को भी चुन चुन कर सार ग्रहण कर लेता है |इसी प्रकार ऋषि तितिरी ने वेदरुपी सागर से आत्मज्ञान रुपी सार को चुन कर लोक कल्याण के लिए इस उपनिषद के रूप में प्रस्तुत किया | उन का दृष्टिकोण समन्वयवादी था | वे जानते थे कि मनुष्य केवल तर्क से नहीं ,अपितु तप,अनुभव और आनन्द से ब्रह्म को जान सकता है |

वैदिक साहित्य में स्थान और संरचना

तैतिरिय उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद कि तैतिरिय शाखा से सम्बन्धित है |यह तैतिरिय आरण्यक के सातवें,आठवें,और नौवें प्रपाठक में स्थित है |इस में तीन अध्याय हैं जिन्हें वल्ली कहा जाता है | पहली वल्ली का नाम शिक्षावल्ली है |इस में बारह अनुवाक हैं |दूसरी वल्ली ब्रम्हानन्द वल्ली या ब्रम्ह वल्ली है ,जिस में नौ अनुवाक हैं |तीसरी वल्ली भृगु वल्ली है ,जिस में दस अनुवाक हैं | इस प्रकार कुल इकतीस अनुवाको में यह उपनिषद आत्मा से परमात्मा कि यात्रा को पूर्ण करता है |

इस का शांति पाठ है -शं नो वरूण:,शं नो भवत्वर्यमा ,शं न इन्द्रो बृहस्पती:,शं नो विष्णु रू रू क्रम: |नमो ब्रम्हने \ नमस्ते वायो |त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि |यह शांति पाठ ही बताता है कि यह उपनिषद केवल निवृति का नहीं ,बल्कि प्रकृति की शक्तियों के साथ सामंजस्य से आत्मा को देखने का ग्रन्थ है |

१-शिक्षा वल्ली- जीवन कि नीव में आत्मज्ञान –

अक्सर लोग समझते हैं कि उपनिषद केवल सन्यासियों के लिए हैं | शिक्षावल्ली इस भ्रम को तोड़ता है यह शिक्षा का वेदान्त है | इस में वर्ण,स्वर ,मात्रा ,बल,साम और सन्तान ,इन अंगों सहित वैदिक शिक्षा का वर्णन है ,साथ ही जीवन मूल्यों का उपदेश भी है | इस में प्रसिद्ध उपदेश आता है जो आज भी हर भारतीय के घर में गूंजता है -सत्यं वद,धर्म चर ,स्वाध्यायान्मा प्रमद:,मातृदेवो भव ,पितृदेवो भव,आचार्य देवो भव,अतिथि देवो भव | अर्थात सत्य बोलो,धर्म का आचरण करो,स्वाध्याय में प्रमाद मत करो ,माता को देवता समान मानो ,पिता को देवता समान मानो ,आचार्य को देवता समान मानो और अतिथि को देवता समान मानो |

यह उपदेश बताता है कि आत्मज्ञान शून्य से नहीं होता |जिस व्यक्ति का ब्यबहार सत्य और धर्म पर टिका है ,जिस के हृदय में माता-पिता और गुरु के प्रति कृतज्ञता नही है ,वह आत्मा के सूक्ष्म तल तक नहीं पहुंच सकता |आत्मज्ञान कि पहली सीढ़ी सदाचार है |शिक्षा वल्ली में यह भी कहा गया है – श्रद्धया देयम,ह्रिया देयम,भिया देयम,संविदा देयम |दान श्रदधा से दो ,लज्जा से दो ,मय से दो,विवेक से दो | यह सामाजिक नैतिकता ही आत्म शुद्धि का मार्ग है |

२-ब्रम्हानन्द वल्ली – पंचकोश और आत्मज्ञान का विज्ञान

तैतिरिय उपनिषद का हृदय है ब्रम्हानन्द वल्ली |यही पर आत्मज्ञान का वैज्ञानिक विश्लेष्ण सिद्धांत के रूप में आता है |उपनिषद कहता है कि मनुष्य का आस्तित्व केवल यह दिखने वाला शरीर नहीं है |यह पांच कोशों से बना है ,जैसे तलवार म्यानों में बंद हो :-

१-अन्नमय कोष : यह हमारा स्थूल शरीर है जो अन्न से बनता है और अन्न से ही पोषित होता है |उपनिषद कहता है -अन्नाध्द्येव खल्विमानि भूतानि जायेन्ते |अन्न से ही सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं |अधिकाँश लोग अपने को केवल यही शरीर मान लेते हैं ,यही दुःख का कारण बनता है |

२- प्राणमय कोष -शरीर के भीतर प्राणों का समूह जो श्वास,रक्त संचार और उर्जा का संचालन करता है | यह अन्नमय से सूक्ष्म है और उसे धारण करता है |

३- मनोमय कोष – मन,संकल्प,विकल्प,भावनाएं ,इच्छ्यें | यह प्राण से भी सूक्ष्म है |प्राय: मन को ही आत्मा समझ लेते हैं |

४- विज्ञान कोष -यहाँ विज्ञान का अर्थ है बुद्धि,विवेक,निर्णय शक्ति | यह जानने वाला तत्व है कि क्या करना चाहये क्या नहीं ,यह मन से भी सूक्ष्म है |

५- आनन्दमय कोष – यह गहरी सुषुप्ति में अनुभव होने वाला आनन्द है ,जहां द्वैत मिट जाता है ,परन्तु उपनिषद कहता है कि यह भी आत्मा नहीं है,यह भी एक कोष ही है,एक आवरण है |

इन पांच कोशों के पार जो साक्षी है ,जो इन सब को जानता है ,पर इन में से कोई नहीं है,वही आत्मा है,वही ब्रम्ह है |इस आत्मा के बारे में उपनिषद कहता है -सत्यं ज्ञानमन्नतं ब्रह्म| ब्रह्म सत्य स्वरूप है ,ज्ञान स्वरूप है और अनंत है | जी व्यक्ति इस ब्रम्ह को हृदय गुफा में जान लेता है वह सारे भोगों को एक साथ प्राप्त कर लेता है |

ब्रम्हानन्द वल्ली में आनन्द की मीमांसा भी अद्भुत है |मनुष्य का जो सामान्य आनन्द है ,उस से सौ गुना अधिक मनुष्य ,गन्धर्वों का आनन्द है ,उस से सौ गुना अधिक देव गन्धर्वों का,उस से सौ गुना अधिक पितरों का,और ऐसे क्रम से आगे बढ़ते हुए ब्रम्ह का आनन्द अनंत गुना बताया गया है |इस का तात्पर्य है कि हम जिस सुख को बाहर खोज रहे हैं ,उस का अनंत स्त्रोत हमारे भीतर ही है |आत्मज्ञान ही परम आनन्द है |

३-भृगु वल्ली -तप से आत्मज्ञान कि खोज –

तीसरी वल्ली भृगु वल्ली आत्म ज्ञान की प्रयोगशाला है | इस में वरूण के पुत्र भृगु कि कथा है |भृगु अपने पिता वरूण के पास जा कर कहते हैं -अधीहि भगवो ब्रम्होति| भगवन ,मुझे ब्रम्ह का उपदेश दीजिये | वरूण कहते हैं -यतो वा इमानि भूतानि जायेन्ते ,येन जातानि जीवन्ति , यत्प्रयन्त्यमिसंविशन्ति ,तद्विजिज्ञासत्स्व,तद ब्रम्होति |जिस से सब प्राणी उत्पन्न होते हैं ,उत्पन्न हो कर जिस के द्वारा जीते हैं और अंत में जिस में लीन हो जाते हैं ,उसे जानने की इच्छा करो,वही ब्रम्ह है |

पिता ने पुत्र को कोई सिद्धांत नहीं दिया,केवल कसौटी दी और कहा तप करो |भृगु ने तप किया और सोचा अन्न ही ब्रम्ह है,क्यों कि अन्न से ही सब उत्पन्न होते हैं |वे पिता के पास गए ,पिता ने कहा फिर तप करो |भृगु ने और तप किया तो समझा प्राण ही ब्रम्ह है ,फिर विज्ञान को ब्रम्ह समझा और अंत में गहन तप के बाद जाना कि आनन्द ही ब्रम्ह है |

आनन्दो ब्रम्होती व्यजानात |आनन्दाद्धयेत खल्विमानि भूतानि जायन्ते ,आनन्देन जातानि जीवन्ति ,आंनद प्रयन्त्यमि संविशन्तीति |

यह कथा आत्मज्ञान की पद्धति सिखाती है |ब्रम्ह पुस्तकों से नहीं,केवल सुनने से नहीं ,बल्कि निरंतर तप,मनन,और अनुभव से जाना जाता है |तप का अर्थ है एकाग्र साधना ,इन्द्रियों को भीतर कि और मोड़ना |

आत्मज्ञान का सार और अभय

तैतिरिय उपनिषद का अंतिम संदेश है अभय | जब साधक आत्मा को जान लेता है तो वह कहता है |मैं ही अन्न हूँ ,मैं ही अन्न हूँ ,मैं ही अन्न खाने वाला हूँ |अर्थात अब द्वैत समाप्त हो गया ,|खाने वाला और खाया जाने वाला दोनों एक ही ब्रम्ह है |

आत्मा को जानने वाला किसी से डरता नहीं |’अभय प्रतिष्ठां विन्दते ‘ |वह अभय प्रतिष्ठा को प्राप्त करता है |आज मनुष्य भय,चिंता और अवसाद से ग्रस्त है क्यों कि वह अपने को केवल अन्नमय कोष मानता है |नौकरी गई,शरीर बीमार हुआ .तो लगता है मैं ही समाप्त हो गया |उपनिषद कहता है तुम शरीर नहीं हो ,तुम प्राण नहीं हो ,मन नहीं हो ,बुद्धि भी नहीं हो |तुम इन सब के साक्षी हो ,तुम आनन्द स्वरूप आत्मा हो |इस ज्ञान से ही सच्ची निर्भयता आती है |

आधुनिक जीवन में प्रासंगिकता –

वेबसाइट पर प्रकाशित करने का उद्देश्य केवल प्राचीन ग्रन्थ का परिचय नहीं ,बल्कि उसे आज के पाठक से जोड़ना भी है |आजकल मानसिक तनाव ,अनिंद्र और अर्थ हीनता बढ़ रही है ,पंच कोष का सिद्धांत एक सम्पूर्ण स्वास्थ्य मोडल देता है ,केवल अन्नमय कोश यानी शारीरिक स्वास्थ्य पर्याप्त नहीं |प्राणमय के लिए प्राणायाम ,मनोमय के लिए ध्यान और साकारात्मक चिन्तन ,विज्ञानमय के लिए विवेक और सत्संग ,आनन्दमय के लिए निष्काम कर्म और भक्ति आवश्यक है | यह एक इंटीग्रेटेड लाइफ स्टाइल है |

लेखक-मदन लाल शर्मा

वेबसाइट- http://thegodweknow.com – आगे एक और उपनिषद से आत्मज्ञान/चिन्तन देखते रहिये |

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