अष्टावक्र गीता -जहाँ त्याग भी छूट जाए,वहीं से शुरू होता है सुख
श्लोक-अकिंचन भव स्वास्थ्यं कौपिन्त्वेSपि दुर्लभं | त्यागादाने विहायास्माद -हमासे यथासुखम ||१||
सामान्य अर्थ -अकिंचन होने से जो स्वरूप में स्थित होने का जो सुख मिलता है,वह केवल लंगोटी पहनने वाले सन्यासी को भी दुर्लभ है | इसलिए त्याग और ग्रहण दोनों प्रवृतियों को छोड़ कर मैं यथा सुख,अपने आनंद में स्थित हूँ |
विवेचना-
यह श्लोक वैराग्य बाहरी और भीतरी वैराग्य का भेद खोलता है ,अकिंचन का अर्थ गरीब होना नहीं ,इस का अर्थ है -मन में अकिंचन भी मेरापन न होना |कौपिनत्व बाहरी त्याग का प्रतीक है ,सब कुछ छोड़ कर लंगोटी में रहना ,पर अष्टावक्र कहते हैं ,बाहर से सब छोड़ने पर भी भीतर सूक्ष्म अहंकार बच जाता है कि ‘मैं त्यागी हूँ’ तब भी स्व-स्वास्थ्य अर्थात स: में स्थित होना नहीं होता |स्वासथ्य का अर्थ ही है-स्व में स्थित होना |
त्याग और आदान् दोनों मन की क्रियाए है |त्याग में कहता है मैंने छोड़ा,आदान में कहता है मैंने लिया |दोनों में कर्ता बचा रहता है |ज्ञानी इन दोनों को छोड़ देता है |वह न पकड़ता है न फेंकता है ,केवल साक्षी रहता है |जनक राजा हो कर भी यही कह रहे हैं -महल में रहते हुए भी मैं अकिंचन हूँ ,क्यों कि वस्तु बधन नहीं है वस्तु में ममता बंधन है |जब त्याग का उहापोह गिर जाता है तब जो बचता है वही यथासुखम है,सहज सुख है |
उदाहरण-एक सन्यासी हिमालय की गुफा में रहता है ,उस के पास केवल दो लंगोटीयां हैं | वह दिन भर चिंता करता है कि एक सूख रही है ,दूसरी को कहीं चूहा न काट दे या कोई ले न जाए |बाहर से अकिंचन ,भीतर से हर समय रक्षा में उलझा | उसी गाँव में एक दूकानदार था ,दुकान,परिवार सब था ,पर भाव ऐसा कि सब परमात्मा का दिया है ,मेरा कुछ नहीं |ग्राहक आया तो सेवा ,नहीं आया चिंता नहीं ,लाभ हुआ तो ठीक हानि हुई तो ठीक | एक दिन सन्यासी ने कहा -तू तो बंधा है |दुकानदार हंसा बंधन आँख में नहीं ,दृष्टि में है |आप लंगोटी की रक्षा में बंधे हैं ,मैं दूकान के बीच भी मुक्त हूँ,क्यों कि पकड़ नहीं है |
यही अष्टावक्र का अकिंचनभव है |असली त्याग वस्तु का नहीं ,वस्तु पर मेरेपन का है | जब वह मेरापन गया तो कौपीन वाला भी परेशान और गृहस्थ भी स्वस्थ हो सकता है |
श्लोक – कुत्रापि खेद:कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते| मन:कुत्रापि तत्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थित: सुखम ||2||
सामान्य अर्थ – कहीं शरीर को खेद होता है ,कहीं जिह्वा वाणी दुखी होती है ,कहीं मन दुखी होता है | इन तीनों में साक्षी भाव से छोड़ कर मैं अपने परम पुरुषार्थ ,आत्म स्वरूप में स्थित हो कर सुख पूर्वक रहता हूँ |
विवेचना –
यह श्लोक दुःख के तीन तल बताता है | पहला कायस्थ खेद – शरीर का दुःख ,बुढापा,थकान ,रोग | दूसरा जिह्वा का खेद -वाणी का दुःख ,निंदा स्तुति ,अधिक बोलना ,कडवा बोलना या दुसरे के शब्दों से आहत होना | तीसरा मन का खेद- चिंता ,भय,कामना ,पश्चाताप | सामान्य मनुष्य इन तीनों को अपना मान लेता है और कहता है मैं दुखी हूँ |
jजनक कहते हैं -तत्यकत्वा इन को छोड़ कर ,छोड़ने का अर्थ दवाना नही ,बल्कि जानना कि ये कहीं कही होते हैं ,मुझ चेतना में नहीं होते |शरीर कहीं थकता है ,मैं नहीं थकता |जिह्वा कहीं दुखी होती है ,मैं नहीं | मन कहीं उलझता है ,मैं नहीं|पुरुषार्थ का अर्थ यहाँ संसारी पुरुषार्थ ,धन पद नहीं है |परम पुरुषार्थ है -पुरुष अर्थात शुद्ध चेतना में स्थित होना |जब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है ,तो शरीर ,वाणी,मन अपना काम करते रहते हैं और ज्ञानी यथासुख में रहता है |
उदाहरण- एक किसान बुजुर्ग के घुटनों में दर्द था |वह सुबह खेत में जाता ,दोपहर तक शरीर कहता बस करो |वह रूक जाता,पर मन कह्ता अभी और करना है ,लोग क्या कहेंगे ,फसल सूख जायेगी जिह्वा से वह बच्चों पर गुस्सा निकाल देता,रात भर तीन दुःख इकट्ठे| उस के पड़ोसी को भी वही दर्द था ,पर उस ने अभ्यास किया जब घुटने दुखते तो वह देखता ,अच्छा काय को खेद हो रहा है ,मैं जान रहा हूँ |जब मन घवराता कि फसल का क्या होगा तो कहता ,देखो मन कुत्रापि खिन्न है |जब जिह्वा शिकायत करने को आती तो चुप रह जाता || उस ने पाया की दर्द है पर दुखी होने वाला कोई नहीं |शरीर अपना धर्म निभा रहा है मन अपना वह स्वयं इन तीनों का प्रकाशक है |इसी विवेक से वह खेत में भी प्रसन्न रहा |यही पुरुषार्थ स्थित होना है,दर्द के बीच भी अपने साक्षी सुख में टिके रहना |
श्लोक – कृतं किमपि नैव स्याद इति संचिन्त्य तत्वत: | यदा यत्कर्तुमायाति तत कृत्वासे यथासुखम ||3||
सामान्य अर्थ – तत्व से यह निश्चय करके कि वास्तव में मेरे द्वारा कुछ भी किया ही नहीं गया ,जो कुछ करने का अवसर सामने आ जाता है ,उसे सहज भाव से करके मैं यथासुख -अपने स्वरूप के सुख में स्थित रहता हूँ |
विवेचना-
यह श्लोक कर्तापन के अध्यास को काटता है |जनक कहते हैं ज्ञानी जान लेता है कि करना शरीर,मन,बुद्धि का धर्म है ,मेरा नहीं ,मैं तो केवल साक्षी ,अक्रिय आत्मा हूँ |जब तक मैं,मैं कर रहा हूँ ,मानता हूँ ,तब तक बोझ,चिंता और फल की आशा रहती है |
तत्व चिन्तन का अर्थ है -बौद्धिक नहीं ,आस्तित्वगत निश्चय ,जैसे आकाश में बादल आते जाते हैं ,पर आकाश कुछ नहीं करता ,वैसे ही जीवन में कर्तव्य आते हैं | ज्ञानी उन का निषेद्ध नहीं करता ,न उन में आसक्त होता है |यह अकर्मण्यता नहीं है ‘यदा यत्कर्तुमायाति तत कृत्वा ‘ जो सामने आया ,कर दिया ,योजना,प्रदर्शन,भविष्य की चिंता से मुक्त हो कर | यही सहज कर्मयोग है | गीता का नैष्कर्म्य यहीं पूर्ण होता है ,कर्म हो रहा है पर कर्ता नहीं बचा | इसलिए वह थकता नहीं ,बंधता नहीं ‘यथासुखम आसे ‘ -यह सुख बाहर से नहीं ,कर्ता भाव के गिरने से उपजता है |
उदाहरण- एक बजुर्ग किसान को देखिये ,सुबह खेत जाना है तो चला गया ,पानी देना है तो दे दिया ,मेहमान आ गए तो रोटी खिला दी,वह हर काम पूरा करता है पर मन में हिसाब नहीं रखता कि मैंने कितना बड़ा त्याग किया ,काम खत्म,बात खत्म | वही एक नोकरीपेशा युवक दिन भर मन में लड़ता है ,मुझे यह करना पड़ा ,मैंने यह नहीं किया ,कल क्या करूंगा |कर्म उतना ही है ,पर कर्ताभाव के कारण बोझ दुगना है |
जनक की दृष्टि किसान जैसी है|मान लीजिये आप को अचानक पड़ोसी के अस्पताल जाने के लिए गाडी चलानी पड़ी ,अज्ञानी सोचेगा -मेरा समय बर्बाद हुआ ,पुन्य मिलेगा या नहीं | ज्ञानी तत्वत: जानता है -शरीर ने गाडी चलाई ,करूणा से चलाई ,मैं साक्षी रहा | काम हो गया तो वह फिर अपने सुख में लौट आता है |न पछतावा ,न अहंकार | यही यथासुखम जीना है – जो आया,कर दिया और फिर मुक्त |
श्लोक – कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्ध-भावा देहस्थयोगिन: | संयोगायोगविरहादह -मासे यथासुखम ||४||
सामान्य अर्थ – कर्म करने का आग्रह और कर्म न करने का आग्रह-यह दोनों भाव देह में स्थित योगियों के होते हैं | मैं संयोग और वियोग दोनों से रहित हो कर यथासुख स्थित हूँ | |
विवेचना-
यह श्लोक पिछले श्लोक से भी गहरा है | साधारण योगी अभी भी देह में स्थित है -अर्थ मैं देह हूँ ,यह भाव सूक्ष्म रूप में बचा है ,इसलिए उसे दो तरह के बंधन होते हैं | कभी वह सोचता है -मुझे बहुत कर्म करना चाहिए ,सेवा करनी चाहिए -यह कर्म निर्बन्ध है ,कभी वह सोचता है -मुझे कुछ नहीं करना,सब छोड़ कर बैठना है -यह नैष्कर्म्य निर्बन्ध है | दोनों ही आग्रह हैं,दोनों ही बंधन हैं |
ज्ञानी के लिए न कर्म में आग्रह है ,न अकर्म में | वह संयोग से भी नही चिपकता -कि मुझे लोगों से ,साधना से ,फल से जुड़ना ही है और वियोग से भी नहीं-कि मुझे सब छोड़ना ही है|संयोगायोगविरहात -यह अत्यंत सूक्ष्म अवस्था है | जहाँ जुड़ने-छूटने का उहापोह ही गिर गया ,वैसे पवन कहीं ठहरती नहीं ,फिर भी सब जगह है | ज्ञानी का चित कहीं आग्रह नहीं करता ,इसलिए थकता नहीं,क्यों कि आग्रह ही थकाता है | आग्रह गया तो सहज विश्राम आया,और वही यथा सुख है |
उदाहरण – दो साधकों को देखिये |एक सोचता है -मैं पांच घंटे पूजा करूंगा ,व्रत करूंगा,तभी मुक्ति मिलेगी |यह कर्म निबन्ध है ,दूसरा सोचता है -मैं कुछ नहीं करूंगा,आंख बंद करके पड़ा रहूँगा ,यही त्याग है |यह नैष्कर्म्य निर्बन्ध है | दोनों देह अभिमान में हैं-एक करने वाला मैं ,दूसरा न करने वाला मैं | एक तीसरा व्यक्ति है -एक दादी जो घर में रहती है ,पोता रोया तो गोद में ले लिया -यह संयोग | पोता स्कूल चला गया तो अपना भजन करने लगी -यह वियोग ,पर न गोद लेने में जिद है कि मुझे ही लेना है ,न छोड़ने में दुःख कि चला गया ,वह दोनों में सहज है |
जीवन भी ऐसा ही है|आफिस का काम आया तो पूरी कुशलता से कर दिया ,काम खत्म हुआ तो लैपटॉप बंद करके आकाश देखने लगा | न काम से चिपकान,न काम से भागना |जहाँ आग्रह नहीं वहीं शांति है |जनक कहते हैं -मैं इसी संयोग वियोग के आग्रह से मुक्त हो कर अपने स्वरूप के सुख में हूँ |
श्लोक- अर्थानर्थौ न में स्थित्या गत्या न शयनेनवा | तिष्ठन गच्छन स्वपन तस्मादहमासे यथासुखम ||५||
सामान्य अर्थ – मुझे बैठने से ,चलने से या सोने से कोई लाभ या हानि नहीं होती |इसलिए मैं बैठता,चलता और सोता हुआ जैसे सुखपूर्वक हूँ,वैसे ही रहता हूँ |
विवेचना-
जनक कहते हैं कि अब मुझे बैठने,चलने या सोने से कोई अर्थ और अनर्थ नहीं होता इसलिए मैं जैसे सुखपूर्वक से हूँ ,वैसे ही बैठता,चलता और सोता हूँ |इस श्लोक में ज्ञानी की सहज अवस्था का वर्णन है | अज्ञानी व्यक्ति हर क्रिया को लाभ और हानी की तुला पर तोलता है | वह सोचता है कि बैठने से क्या मिलेगा ,चलने से क्या बिगड़ेगा ,सोने से समय व्यर्थ होगा या नहीं ,इसी चिंता से उस का मन कभी स्थिर नहीं रहता |ज्ञानी इस बंधन से मुक्त हो जाता है उसे यह ज्ञान हो जाता है कि आत्मा शरीर की क्रिया से अलग है ,शरीर बैठे,चले या सोये ,आत्मा में कोई भी परिवर्तन नहीं आता | अर्थ और अनर्थ शरीर और मन के स्तर पर होते हैं |आत्मा के स्तर पर नहीं ,इसलिए ज्ञानी किसी विशेष आसन ,किसी विशेष गति या किसी विशेष नियम का गुलाम नहीं रहता |
वह क्रिया को कर्तव्य समझ कर नहीं ,बल्कि सहजता से करता है | जब बैठना उचित लगता है बैठ जाता है और जब चलना आवश्यक लगता है तो चल देता है ,जब नींद आती है तो सो जाता है |इस में कोई अपराध भाव नहीं है ,कोई दिखावा नहीं ,कोई आग्रह नहीं ,यही यथा सुखम है,अर्थात जैसा सुख कर हो वैसा जीवन |यह आलस्य नहीं है यह स्वतन्त्रता है कर्म से भागना नहीं ,कर्म में आसक्ति का त्याग है |
उदाहरण – एक बृद्ध किसांन की देखिये जो जीवन भर खेत में काम करता रहा ,युवावस्था में वह हर समय हिसाब लगाता था कि बैठने से काम रूक जाएगा ,चलने से समय बर्बाद होगा ,सोने से फसल का नुक्सान होगा | वह थक कर भी बैठ नहीं पाता था ,मन में अपराध भाव रहता था | अब बुढ़ापे में उसे समझ आया कि शरीर की अपनी सीमा है |अब वह धुप में थकने पर पीपल के नीचे सहज बैठ जाता है ,खेत की मेड पर धीरे धीरे चलता है ,दोपहर में थोडा सो लेता है ,उसे अब बैठने पर हानि का डर नहीं ,चलने पर लाभ का मोह नहीं ,सोने पर समय नष्ट की चिंता नहीं |गाव के लोग क्या कहते हैं कि वह आलसी हो गया है ,पर वह जानता है कि वह मुक्त हो गया है |उस के मन में कोई खिंचाव नहीं है |जैसे नदी अपने मार्ग में कभी ठहरती है,कभी बहती है ,कभी शांत हो जाती है | वैसे ही वह भी जीवन की गति के साथ सहज हो गया है | यही इस श्लोक का जीवंत उदाहरण है |ज्ञानी व्यक्ति की तरह वह क्रिया को बोझ नहीं मानता ,बल्कि जीवन को जैसा है वैसा स्वीकार करता है | बैठना ,चलना और सोना अब उस के लिए साधन नहीं ,सहज जीवन है और यही उस की सच्ची शांति है |
श्लोक-स्वपतो नास्ति में हानि:सिद्धिर्यत्नवतो न वा | नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम ||६||
सामान्य अर्थ -सोने वाले मुझ को कोई हानि नहीं होती और यत्न करने वाले मुझको कोई सिद्धि नहीं मिलती | इसलिए नाश और उल्लास को छोड़ कर मैं यथासुख रहता हूँ |
विवेचना-
इस श्लोक में जनक जी कहते हैं कि सोने वाले मुझे कोई हानि नहीं होती और यत्न करने वाले मुझे कोई सिद्धि नहीं मिलती ,इसलिए नाश और उल्लास को छोड़ कर मैं यथासुख में रहता हूँ |सामान्य मनुष्य दो भयों में जीता है कि यदि मैं यत्न नहीं करूंगा तो पिछड़ जाऊँगा ,मेरा नुक्सान हो जाएगा | दूसरा भय है कि यदि मैं रूक गया तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा |इसी कारण न वह सो पाता है ,न विश्राम कर पाता है | वह हर समय कुछ पाने की दौड़ में रहता है |ज्ञानी इस दौड़ को समझ जाता है ,उसे अनुभव हो जाता है कि आत्मा को न सोने से हानि होती है ,न यत्न से कोई नई सिद्धि मिली है |सिद्धि और हानि मन और शरीर के खेल हैं |आत्मा सदा पूर्ण है | इसलिए नाश से वह दुखी नहीं होता और प्राप्ति से उछलता नहीं | नाश और उल्लास दोनों ही मन की तरंगें हैं |जब मनुष्य इन तरंगों के पीछे भागता है तो वह कभी शांत नहीं रहता | जनक कहते हैं कि मैंने इन दोनों को छोड़ दिया है |छोड़ने का अर्थ कर्म छोड़ना नहीं ,बल्कि कर्म के फल से चिपकना छोड़ना है |यत्न करना हो तो करता हूँ ,विश्राम करना हो तो करता हूँ ,पर दोनों में मैं समान रहता हूँ |यही समता ही सुख है |
उदाहरण-एक व्यापारी को देखिये जो वर्षों तक दिन रात परिश्रम करता था उसे लगता था कि एक दिन दुकान बंद की तो ग्राहक टूट जायेगे और हानि हो जायेगी | यदि कोई बड़ा सौदा मिल जाता वह उल्लास में रात भर सो नहीं पाता था और यदि सौदा हाथ से निकल जाता तो नाश कि चिंता में खाना भी नहीं खाता था | उस का मन सदा झूले कि तरह उपर निचे होता रहता था | एक बार उसे बिमारी के कारण महीने भर विस्तर पर रहना पड़ा ,पहले तो वह बहुत घवराया, पर धीरे धीरे उसे समझ आया कि दुकान उस के बिना भी चल रही है ,संसार रूक नहीं गया |उसे यह बोध हुआ कि सोने से ,रूकने से कोई वास्तविक हानि नहीं होती और दौड़ने से कोई स्थायी सिद्धि नहीं मिलती | तब से वह समय पर दुकान खोलता है ,समय पर बंद करता है | रात को निश्चिंत सोता है ,लाभ हो तो शांत रहता है ,हानि हो तो शांत रहता है | लोग कहते हैं कि अब वह अब पहले जैसा नहीं रहा ,पर वह जानता है कि अब वह नाश और उल्लास के बंधन से मुक्त हो कर यथासुख जी रहा है |यही सच्ची सफलता है ,जहाँ मन लाभ हानि से उपर उठ कर शांति में स्थिर रहता है और जीवन सहज हो जाता है |
श्लोक- सुखादिरूपा नियमं भावेध्वालोक्य भूरिश: |शुभाशुभे विहायास्मादह -मासे यथासुखम ||७||
सामान्य अर्थ – सुख आदि रूप वाले भावों में बार बार नियम को देख कर शुभ और अशुभ को छोड़ कर मैं यथासुख रहता हूँ |
विवेचना-
इस श्लोक में जनक कहते हैं कि सुख आदि वाले रूपों वाले भावों में बार बार नियम को देख कर और शुभ और अशुभ को छोड़ कर मैं यथासुख रहता हूँ | मनुष्य के मन में सुख,दुःख ,राग ,द्वेष,भय,क्रोध आदि भाव आते रहते हैं | अज्ञानी व्यक्ति इन भावों को ही सत्य मान लेता है | वह सुख को पकड़ना चाहता है और दुःख से भागना चाहता है |वह शुभ को अच्छा और अशुभ को बुरा कह कर जीवन को दो भागों में बाँट देता है | इसी बंटबारे में वह उलझ जाता है ज्ञानी बार बार देखता है कि यह सभी भाव नियम से आते हैं ,और नियम से जाते हैं | सुख आता है तो जाता भी है ,दुःख आता है तो जाता भी है कोई भाव स्थायी नहीं है |
यह नियम सब के जीवन में समान रूप से चलता है |इस सत्य को बार बार देखने से वैराग्य उत्पन्न होता है तब ज्ञानी शुभ और अशुभ कि चिंता छोड़ देता है|शुभ का अर्थ पाप का भय नहीं है ,दोनों ही मन के नधन हैं | जब मनुष्य यह जान लेता है कि भाव बदलते रहते हैं पर देखने वाला आत्मा नहीं बदलता ,तब वह मुक्त हो जाता है |वह भावों को रोकता नहीं ,उन्हें द्बाता नहीं ,केवल साक्षी हो कर देखता है |यही यथासुख अवस्था है जहाँ सुख दुःख कि लहरों के बीच भी भीतर शांति बनी रहती है |
उदाहरण – एक माँ को देखिये जिस के दो बेटे हैं | एक बेटा परीक्षा में सफल हो कर घर लौटता है ,तो घर में शुभ का वातावरण बन जाता है ,मिठाई बंटती है ,सब हंसते हैं दुसरे दिन दुसरे बेटे कि नौकरी छूट जाती है ,तो वही घर अशुभ कि चिंता से भर जाता है ,सब उदास हो जाते हैं | पहले वह माँ इन दोनों भावों में पूरी तरह बह जाती थी |सुख में अत्यंत प्रसन्न हो जाती थी और दुःख में टूट जाती थीं ,धीरे धीरे जीवन के अनुभवों से उसे समझ आया कि सुख और दुःख का आना जाना एक नियम है ,जैसे दिन के बाद रात और रात के बाद दिन आता है ,वैसे ही जीवन में शुभ और अशुभ आते जाते रहते हैं |
यह देख कर उस ने शुभ को पकड़ना और अशुभ से डरना छोड़ दिया |वह बेटे कि सफलता पर प्रसन्न होती है ,पर अहंकार नहीं करती |बेटे कि असफलता पर वह दुखी होती है पर टूटती नहीं | वह दोनों स्थितियों में संतुलन रख कर घर को सम्भालती है |यही भावों के नियम को देख कर शुभ अशुभ से मुक्त हो कर यथासुख रहना है जैसे इस श्लोक में कहा गया है |उस के इस संतुलन से पूरा परिवार भी शांत और स्थिर रहने लगा है ,और घर में पहले से अधिक प्रेम और समझ बढ़ गई है |
इति अष्टावक्र गीता त्रयोदश प्रकरण
लेखक-मदन लाल शर्मा
वेबसाइट- http:/thegodweknow.com
