दिति का गर्भ धारण तथा दैत्य उत्पति
तृतीय स्कन्ध के तेहरवें अध्याय में वराह अवतार की कथा के बाद विदुर जी के मन में एक शंका उत्पन्न हुई | उन्होंने मैत्रेय ऋषि से पूछा “-हे ब्रह्मन ,जब सृष्टि के आदि में सब जीव सत्वगुण में स्थित थे,तो दिति के गर्भ से दो भयानक दैत्य पुत्रों की उत्पति कैसे हुई ,जिन के कारण स्वयं भगवान को अवतार लेना पड़ा ?”
इस प्रश्न के उतर में मैत्रेय ऋषि ने जो कथा सुनाई वही तृतीय स्कन्ध के चतुर्दश अध्याय की दिव्य कथा है |
दिति की काम याचना –
एक दिन सांयकाल का समय था ,मह्रिषी कश्यप जी शाम की संध्या के लिए अग्निहोत्र कर रहे थे | उसी समय दक्ष प्रजापति की पुत्री और कश्यप ऋषि की पत्नी दिति काम से पीड़ित हो कर अपने पति के पास आई |दिति ने कहा-हे ब्रम्हर्षे ,कामदेव मुझे पीड़ित कर रहा है ,जैसे हाथी हथिनी को रौंदता है वैसे ही यह काम मेरे हृदय को मथ रहा है | हे आर्य पुत्र आप मेरे पति हैं ,आप मेरी इच्छा पूर्ण कीजिये |मेरी सौतों-अदिति आदि को तो आपने पुत्रवती बना दिया,पर मुझे अभी तक आप ने सन्तान सुख नहीं दिया |
मह्रिषी कश्यप ने दिति को समझाया -हे कल्याणी तुम्हारा कहना सत्य है ,पर यह समय रति के योग्य नहीं है |देखो,यह अत्यंत घौर संध्या का समय है |इसी समय भूतभावन शंकर अपने भूत प्रेत गणों के साथ बैल पर सवार हो कर विचरण करते हैं|इस समय को राक्षस ,पिशाच और भूतों का समय कहा जाता है |
हे भद्रे ,तुम थोडा धैर्य रखो,इस निन्दित समय को टाल दो | यदि इस समय में तुम गर्भ धारण करोगी तो तुम्हारी कोख से ऐसे दो अमंगलकारी पुत्र जन्म लेंगे जो लोकों को पीड़ा देंगे ,ब्राह्मणों से द्वेष करेंगे और जगत के लिए अभिशाप बनेंगे |
परन्तु कामातुर दिति ने पति की हित् भरी बात नहीं मानी |उस ने लज्जा को त्याग कर कश्यप ऋषि का वस्त्र पकड़ लिया | तब कश्यप जी ने लोक मर्यादा का विचार कर ,एकांत में अपनी पत्नी की कामना पूर्ण की | संभोग के पश्चात कश्यप जी ने जल से स्नान कर प्राणायाम द्वारा गायत्री मन्त्र का जाप किया |
दिति को पश्चाताप और कश्यप का भविष्य कथन –
संभोग के बाद दिति को अपनी भूल का आभास हुआ |उसे भय हुआ कि उस ने संध्या काल में निषिद्ध समय में महादेव जी का अपमान किया है | वह कांपती हुई कश्यप जी के चरणों में गिर पड़ी और वोली-हे ब्रम्हन-मैंने अपराध किया है ,मैंने काम के वश में हो कर भगवान रूद्र का अपराध किया है |हे प्रभो ,मुझे क्षमा करें,मेरे गर्भ की रक्षा करें|मुझे डर है कि भगवान शंकर मेरे इस अपराध के कारण मेरे पुत्रों को नष्ट न कर दें |
कश्यप जी ने कहा -तुम ने निन्दित काल में जो कर्म किया है,उस से तुम्हारा चित दूषित हो गया था | तुम्हारे गर्भ से दो बड़े ही अधम ,क्रूर और जगत को भयभीत करने वाले पुत्र उत्पन्न होंगे | वे बार बार देवताओं को सतायेंगे ,ब्राह्मणों और गौओं को कष्ट देंगे ,साधुजनों का वध करेंगे |उन के अत्याचारों से जब सारा संसार त्राहि त्राहि करेगा ,तब जगत के पालनहार भगवान विष्णु अवतार लेकर उन का वध करेंगे |
यह सुन कर दिति को थोडा दुःख तो हुआ ,पर जब उस ने सुना की उस के पुत्रों का वध स्वयं भगवान के हाथों होगा,तो उसे संतोष हुआ |उस ने कहा-यही मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मेरे पुत्रों क भगवान के हाथों मोक्ष मिलेगा |
तब कश्यप ने कहा – तुम्हें पश्चाताप है और तुम ने भगवान शिव से क्षमा याचना की है,इसलिए तुम्हारा एक पौत्र ऐसा होगा जो अत्यंत यशस्वी ,भगवान का परम भक्त होगा | वह बालक भक्तों में अग्रगण्य होगा और उस का यश तीनों लोकों में फैलेगा | वह भगवान की भक्ति के प्रताप से अपने दैत्य कुल को भी पवित्र कर देगा |
सौ वर्ष तक गर्भ धारण –
दिति ने सौ वर्ष तक उस तेजस्वी गर्भ को धारण किया | उस गर्भ के तेज से सूर्य का प्रकाश भी फीका पड़ने लगा | देवता गण भयभीत हो गये और ब्रह्मा जी के पास गये |ब्रह्मा जी ने कहा – यह कश्यप जी के तेज और दिति के गर्भ का पभाव है |यह सृष्टि के नियम के विरूद्ध है | समय आने पर भगवान ही इस का निवारण करेंगे |
सौ वर्ष पूरे होने पर दिति के गर्भ से दो जुड़वां बालकों का जन्म हुआ |जन्म लेते ही वे इतने विशाल और भयानक थे कि पृथ्वी कांपने लगी ,पर्वत हिलने लगे,आकाश में उल्कापात होने लगा और दसों दिशाओं में घौर अन्धकार छा गया | उन में से जो पहले जन्मा वह हिरण्यकशिपू और दूसरा हिरण्याक्ष कहलाया |
इस कथा का आध्यात्मिक संदेश –
इस अध्याय में केवल दैत्यों के जन्म की कथा नहीं है ,अपितु एक गहरा जीवन संदेश है –
१. काल और मर्यादा का महत्व – शास्त्रों में संध्या काल को साधना ,जप और ईश्वर चिन्तन के लिए बताया गया है |भोग के लिए नहीं ,मर्यादा का उल्लंघन करने से ही आसुरी प्रवृति जन्म लेती है |
2. संग और चित का प्रभाव – जैसे दिति के मन में कामवासना और निषिद्ध समय का संग था ,वैसे ही सन्तान उत्पन्न हुई |जैसा हमारा मन और कर्म होता है ,वैसा ही फल हमें प्राप्त होता है |
3. पश्चाताप में शक्ति – दिति ने अपराध के तुरंत बाद पश्चाताप किया और शिव से क्षमा मांगी |उसी पश्चाताप के फलस्वरूप उस के वंश में प्रहलाद जैसा परम भक्त उत्पन्न हुआ| इसलिए शास्त्र कहता है -पाप् करने से बड़ा पाप,पाप करके पश्चाताप न करना है |
इस प्रकार तृतीय स्कन्ध के चतुर्दश अध्याय हमें सिखाता है कि मनुष्य को काम ,क्रोध और मर्यादा हीन आचरण से बचना चाहिए और हर समय ईश्वर का स्मरण करना चाहिए |
इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां तृतीय -स्कन्धे दितिकश्यप संवादे चतुर्दशोSध्याय:||१४||
लेखक-मदन लाल शर्मा
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