भगवान परशुराम जीवन परिचय

रेणुऋषि की कन्या रेणुका से जमदग्नि ने उस का पाणीग्रहण किया |रेणुका के गर्भ से जमदग्नि ऋषि के वसुमान आदि कई पुत्र हुए| उन में सब से छोटे परशुराम थे |विष्णु के अवतार और शिव भगत थे उन्हें शिव से विशेष परशु प्राप्त हुआ था ,उन का नाम राम था किन्तु शंकर द्वारा प्रदत अमोघ परशु को सदैव धारण किये रहते थे ,जिस के कारण यह परशुराम कहलाये जाते थे | यह भृगुवंशीय ब्राह्मण के कुल में पैदा हुए थे उन का वर्ण क्षत्रिय था इसलिए वर्ण के अनुरूप उन्होंने शस्त्र धारण किया था | (व्यक्ति चाहे किसी भी जाति में जन्म ले उस के कर्म वर्ण के अनुसार ही होते हैं,यह कहना कि जातियें ब्राह्मणों ने बनाई गलत है जन्म लेते ही वर्ण निश्चित हो जाता है ) |

कहते हैं कि परशुराम जी ने हैहयवंश का अंत करने के लिए स्वयं भगवान ने ही परशुराम के रूप में अंशावतार ग्रहण किया था |उस समय यह क्षत्रिय लोग बड़े दुष्ट ,रजोगुणी और विशेष कर तमोगुणी हो गये थे |यही कारण था कि वह पृथ्वी पर भार हो गये थे और इसी के फलस्वरूप भगवान परशुराम ने उन का नाश कर के पृथ्वी का भार उतार दिया |

उन दिनों हैहयवंश अधिपति अर्जुन था ,वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था |उस ने अनेकों प्रकार की सेवा-शुश्रूषा करके भगवान नारायण के अंशावतार दतात्रेयजीको प्रसन्न कर लिया और उन से एक हजार भुजाएं तथा कोई भी शत्रु युद्ध में पराजित न कर सके -यह वरदान प्राप्त कर लिया | साथ ही इन्द्रियों का अबाध बल ,अतुल सम्पति ,वीरता,कीर्ति और शारीरिक बल भी उस ने उन की कृपा से प्राप्त कर लिये थे | उसे सभी सिद्धियाँ प्राप्त थी |

एक दिन सहस्त्रबाहु अर्जुन शिकार खेलने के लिए घोर जंगल में निकल गया |देववश वह जमदग्नि के आश्रम में पहुच गया |परम तपस्वी जमदग्नि के पास कामधेनु रहती थी | उस के प्रताप से उन्होंने उस की सेना के साथ हैह्यपति का खूब स्वागत सत्कार किया | वीर हैह्यपति ने देखा कि जमदग्नि मुनि का एश्वर्य तो मुझ से भी बड़ा है ,इसलिए उस ने उन के स्वागत सत्कार को कोई आदर न दे कर कामधेनु को ही लेना चाहा | उस ने अभिमान वश जमदग्नि से मांगे बिना ही अपने सेवकों को आज्ञा दी कि कामधेनु छिन कर ले चलो | वे कामधेनु को ले कर माहिश्मतीपुरी चले गये |

जब वे सब चले गये तब परशुराम जी आश्रम पर आये और उस की दुष्टता का वृतान्त सुन कर क्रोध से तिलमिला उठे ,वे अपना फरशा और तीर तरकश एवं धनुष ले कर बड़े वेग से उस के पीछे दौड़े ,सहस्त्रबाहु अर्जुन अभी अपने नगर में प्रवेश कर ही रहा था कि उस ने देखा परशुराम जी बड़े वेग से उसी की तरफ आ रहे हैं | उस समय परशुराम जी का रूप देखते ही बनता था | वे हाथ में धनुष बाण और फरशा लिये हुए थे ,शरीर पर काला चर्म धारण किये हुए थे और उन की जटाएं सूर्य की किरणों के समान चमक रही थी | उन को देखते ही सहस्त्रबाहु अर्जुन ने सत्रह अक्षौहिणी सेना भेजी जो की भिन्न भिन्न प्रकार के शस्त्रों से लैस थी ,भगवान परशुराम जी ने बात ही बात में अकेले ही उस सारी सेना को नष्ट कर दिया | परशुराम जी की गति मन और वायु के समान थी | जहाँ जहाँ वे अपने फरशे का प्रहार करते ,वहां वहां सारथि और वाहनों के साथ बड़े बड़े वीरों की लाशें गिरती जा रहीं थी | हैह्यपति अर्जुन ने जब देखा कि मेरी सेना के सैनिक भगवान परशुरामजी के फरशे और बाणों के प्रहार से गिरते जा रहे हैं तब उसे बड़ा क्रोध आया और वह स्वयं परशुराम जी से लड़ने आ गया | उस ने आते ही अपनी हजार भुजाओं से पांच सौ धनुषों पर बाण चढाये और परशुरामजी पर छोड़े | भयंकर युद्ध हुआ परन्तु परसुराम जी तो समस्त शस्त्रधारियों के शिरोमणि थे उन्होंने अपने एक धनुष से ही छोड़े गये बाणों से ही सब को काट दिया | साथ ही अपने फरशे से उस की हजार भुजाओं को भी काट कर सिर धड से अलग कर दिया |पिता के मर जाने पर उस के दस हजार लड़के डर कर भाग गये|

परशुरामजी कामधेनु को बछड़े को साथ ले कर आश्रम में आ गए और उसे पिता जी को सौप दिया तथा माहिष्मती में जो कुछ हुआ था पिता जी को बता दिया |सब सुन कर जमदग्नि मुनि ने कहा परशुराम तुम ने राजा को मार कर बहुत बड़ा पाप किया है बेटा हम लोग ब्राह्मण हैं ,क्षमा के प्रभाव से ही हम लोग संसार में पूजनीय हुए हैं |ब्राह्मणों की शोभा क्षमा के द्वारा ही सूर्य के प्रभा के समान चमक उठती है | सर्व शक्तिमान विष्णु भी क्षमावानों पर ही जल्दी प्रसन्न होते हैं | बेटा ,सार्वभौम राजा का वध ब्राह्मण की हत्या से भी बढ़ कर है | जाओ ,भगवान् का स्मरण करते हुए तीर्थों का सेवन कर के अपने पापों को मिटा डालो |अपने पिता की यह शिक्षा भगवान परशुराम ने जो आज्ञा कह कर स्वीकार की |

एक वर्ष तीर्थयात्रा कर के परशुराम जी आश्रम पर लौट आये | उधर सहस्त्रबाहु अर्जुन के जो लडके परशुराम जी से हार कर भाग गये थे ,उन्हें अपने पिता के वध की याद निरन्तर बनी रहती थी | कहीं एक क्षण के लिए भी उन्हें चैन नहीं मिलता था | एक दिन की बात है ,परशुराम जी अपने भाइयों के साथ आश्रम से बाहर वन की और गये हुए थे | यह अवसर पा कर वैर साधने के लिये सहस्त्रबाहु के लडके वहां आ पहुंचे |उस समय महर्षि जमदग्नि अग्निशाला में बैठे हुए थे और अपनी समस्त वृतियों से पवित्रकीर्ति भगवान के ही चिन्तन में ही मग्न थे उन्हें बाहर की कोई सुध न थी | उस समय उन पापियों ने जमदग्नि ऋषि को मार डाला | उन्होंने पहले से ही ऐसा पापपूर्ण निश्चय कर रखा था| परशुराम जी की माता रेणुका बड़ी दीनता से उन से प्रार्थना करती रही लेकिन उन सबों ने एक न सुनी,वे बलपूर्वक महऋषि जमदग्नि का सिर काट कर ले गये | सती रेणुका दुःख और शौक से आतुर हो गयी | वे अपने हाथों अपनी छाती और सिर पीट पीट कर जोर जोर से रोने लगी -परशुराम बेटा परशुराम शीघ्र आओ | परशुराम जी ने माता का यह करुण क्रन्दन दूर से ही सुन लिया वे बड़ी शीघ्रता से आश्रम पर आये और वहां पर देखा कि पिता जी मार डाले गए हैं |उस समय उन को बड़ा दुःख हुआ ,साथ ही क्रोध,असहिष्णुता,मानसिक पीड़ा और शोक के वेग से वे मोहित हो गए | उन्होंने पिता का शरीर तो भाइयों को सौंप दिया और स्वयं हाथ में फरसा उठा कर क्षत्रियों का संहार करने का निश्चय कर लिया |

परशुराम जी ने महिष्मती नगरी में जाकर सहस्त्रबाहु अर्जुन के पुत्रों के सिरों से नगर के बीचों बीच एक बड़ा पर्वत खड़ा कर दिया | परशुराम जी देखा कि वर्तमान क्षत्रिय अत्याचारी हो गए हैं उन्होंने अपने पिता के वध को निमित बना कर इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रिय बिहीन कर दिया | परशुराम जी ने अपने पिता का सिर ला कर धड से जोड़ दिया और यज्ञों द्वारा सर्वदेवमय आत्मस्वरूप भगवान का यग्य किया | यज्ञों में उन्होंने सारी पृथ्वी कश्यप आदि ऋषिओं को दान कर दी | इस के बाद यज्ञांत स्नान कर के वे समस्त पापों से मुक्त हो गए | कमललोचन जमदग्नि नन्दन भगवान परशुराम जी आगामी मन्वन्तर में सप्तऋषियों के मण्डल में रह कर वेदों का विस्तार करेंगे | वे आज भी किसी को किसी प्रकार का दंड न देते हुए शांत चित से महेंद्र पर्वत पर निवास करते हैं |इति

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