स्वायम्भुव मनु की कन्याओं के वंश का वर्णन
प्रस्तावना – श्रीमद्भागवत महापुराण के चतुर्थ स्कन्ध को अत्यंत पवित्र माना जाता है ,क्यों कि इसी स्कन्ध से भक्त ध्रुव की कथा .पृथु चरित्र और भगवान शिव के परम भक्त प्रचेताओं की कथा आरम्भ होती है | चतुर्थ स्कन्ध का आरम्भ सृष्टि के प्रथम सम्राट स्वायम्भुव मनु के वंश विस्तार की दिव्य कथा से होता है ,तृतीय स्कन्ध के अंत में जहाँ भगवान् कपिल ने अपनी माता देवहूति को सांख्य योग का उपदेश दे कर मोक्ष प्रदान किया ,वहीं से चतुर्थ स्कन्ध में सृष्टि की लौकिक लीला का विस्तार प्रारम्भ होता है |
मह्रिषी मैत्रेय जी विदुर से कहते हैं -हे विदुर ,ब्रह्मा जी के मानस पुत्र स्वायम्भुव मनु ने अपनी पत्नी शतरूपा के साथ बहुत काल तक पृथ्वी पर शासन किया | उन के दो पुत्र हुए -प्रियव्रत और उतानपाद और तीन कन्याएं हुईं ,आकूति,देवहूति और प्रसूति | मनु महाराज ने अपनी कन्याओं का विवाह योग्य वर देख कर धर्मपूर्वक किया |
सब से बड़ी पुत्री आकूति का विवाह ,मनु ने महा विद्वान और ब्रह्मा के ही पुत्र रूची प्रजापति के साथ किया | वे बड़े ज्ञानी थे ,वे संसार से विरक्त रहना चाहते थे परन्तु मनु के आग्रह पर गृहस्थ स्वीकार किया | आकूति के संयोग से साक्षात पर ब्रह्म परमात्मा ने यज्ञ नाम से अवतार ग्रहण किया | वे स्वयं यज्ञ पुरुष थे | इसी यज्ञ अवतार ने स्वायम्भुव मन्वन्तर की रक्षा की | यज्ञ की पत्नी दक्षिणा थी जो स्वयं भगवान भक्ति की साकार मूर्ती थी | दक्षिणा के गर्भ से यज्ञ को बारह पुत्रों की प्राप्ति हुई जिन के नाम तोष,प्रतोष,संतोष, भद्र ,शान्ति,इडस्पती,इध्यम ,कवि, विभु,स्वह ,सुदेव और रोचन थे ,जिन्हें तुषित नामक देवता कहा गया | यज्ञ ही स्वायम्भुव मन्वन्तर के इंद्र बने और उन्होंने असुरों का संहार कर धर्म की स्थापना की | यह कथा हमें सीखती है कि जब धर्मात्मा शासक अपनी कन्या सात्विक वर को देता है ,तो स्वयं भगवान उन के घर अवतार लेते हैं |
दूसरी पुत्री देवहूति का विवाह मह्रिषी कर्दम से हुआ ,जिन की कथा हम तृतीय स्कन्ध में विस्तार से सुन चुके हैं | उन्हीं के गर्भ से भगवान विष्णु ने कपिल मुनि के रूप में अवतार लिया | भगवान कपिल ने अपनी माता देवहूति को आत्म् ज्ञान और भक्ति योग का उपदेश देकर उन्हें मुक्त किया | तथा सांख्य शास्त्र के प्रकाश से संसार को प्रकाशित किया |
तीसरी पुत्री प्रसूति का विवाह सृष्टि के महान प्रजापति दक्ष के साथ हुआ | सब से छोटी पुत्री प्रसूती परम रूपवती और गुणवान थी| दक्ष प्रजापति बड़े ही कुशल प्रजापति थे ,उन्हें प्रजाओं की सृष्टि बढाने का कार्य सौंपा गया था |प्रसूति और दक्ष के संयोग से सोलह सुन्दर और गुणवती कन्याओं का जन्म हुआ |मैत्रेय जी कहते हैं इन सोलह में से तेरह कन्याओं का विवाह धर्मराज के साथ हुआ | इन के नाम श्रद्धा,मैत्री,दया,शान्ति,तुष्टि,पुष्टि,क्रिया,उन्नति,बुद्धि,मेधा,तितिक्षा,ह्री और मूर्ती | ये तेरह ही धर्म की पत्नियां बनी और धर्म की शक्ति को बढाने वाली सिद्ध हुईं |
धर्म ने श्रद्धा को काम,मैत्री को प्रसाद,दया को अभय ,शांति को सुख,तुष्टि को मोद,पुष्टि को सभ्य,क्रिया को दर्प ,उन्नति से अर्थ,बुद्धि से मेधावी,मेधा से स्मृति, तितिक्षा से क्षेम,ह्री से प्रश्रय और मूर्ती से साक्षात भगवान नर नारायण के रूप में अवतार लिया |
नर नारायण की कथा आत्यन्त पवित्र है ,ये दोनों साक्षात भगवान के अंशावतार थे | इन्होंने बद्रीनाथाश्रम में जा कर घोर तपस्या की ,आज भी बद्रीनाथ में नर नारायण तपस्या कर रहे है | इंद्र को डर हुआ कि ये मेरे इन्द्रासन को न ले लें इसलिए इंद्र ने कामदेव,बसंत और अप्सराओं को उन की तपस्या भंग करने के लिए भेजा | भगवान नारायण ने उन की माया को जान लिया और अपनी जंघा से एक परम सुन्दरी अप्सरा उर्वशी को प्रकट किया | उसे देख कर कामदेव अप्सराये सब लज्जित हो गई और क्षमा मांग स्वर्ग को लौट गईं | आज भी बद्रीनाथ धाम में नर नारायण तपस्या में लीन हैं , और संसार के कल्याण के लिए तप कर रहे हैं ,उन का तप ही इस कलियुग में धर्म को धारण किये हुए है |
धर्म की इन तेरह पत्नियों के पुत्रों से ही ससार में सारे शुभ गुण का प्रादुर्भाव हुआ ,जब मनुष्य में श्रद्धा आती है तो काम यानी भगवत प्राप्ति की इच्छा प्रबल होती है ,जब मैत्री आती है तो प्रसन्नता आती है ,इस प्रकार यह पूरा वंशावली वर्णन केवल नाम गिनना नहीं ,बल्कि मानव मनोविज्ञान और आध्यात्मिक उन्नति का कर्म है |
दक्ष की शेष तीन कन्याएं में से सब से छोटी स्वाहा का विवाह अग्नि देव के साथ हुआ | स्वाहा के गर्भ से अग्नि के तीन पुत्र हुए-पावक,पवमानऔर शुची | ये तीनों ही अग्नि के स्वरूप हैं ,जो यज्ञ में आहुती को देवताओं तक पहुंचाते हैं | इसलिए आज भी यज्ञ में स्वाहा कह कर ही आहुति दी जाती है ,बिना स्वाहा के देवता हवि ग्रहण नहीं करते |
दूसरी कन्या स्वधा का विवाह पितरों के साथ हुआ ,स्वधा से पितरों को दो कन्याये प्राप्त हुईं- वयुना और धारिणी | दोनों ही पितरों की मानसी कन्याये थीं जो श्राद्ध कर्म को पवित्र बनाती हैं ,इसलिए श्राद्ध में स्वधा शब्द का उच्चारण किया जाता है |
तीसरी कन्या सती ,जो सोलह कन्याओं में सब से तेजस्वी और दक्ष की प्राणप्रिय थी ,उस का विवाह दक्ष ने भगवान शिव के साथ किया था |सती साक्षात जगदम्बा का स्वरूप थी ,उन्होंने अपने पिता के यज्ञ में अपने पति शिव का अपमान होते देख योगाग्नि से अपने शरीर का परित्याग कर दिया था और फिर हिमालय की पुत्री पार्वती के रूप में जन्म लेकर पुन: शिव को प्राप्त किया ,सती कथा से यह शिक्षा मिलती है कि जहाँ भगवान या भक्त का अपमान हो वहां रहना उचित नहीं |
मैत्रेय जी आगे कहते है कि स्वायम्भुव के दो पुत्रों में से उतानपाद का चरित्र अत्यंत पावन है क्यों कि उन्हीं के कुल में बालक ध्रुव जैसा महान भगवद भक्त उत्पन्न हुआ | जिस की कथा आने वाले अध्यायों में विस्तार से कही जायेगी |मनु के दुसरे पुत्र प्रियव्रत ने तो सम्पूर्ण पृथ्वी को सात द्वीपों में विभाजित कर धर्मपूर्वक शासन किया और अंत में वैराग्य धारण कर भगवान की शरण ली |
इस अध्याय का सार यही है कि स्वायम्भुव मनु का वंश केवल लौकिक वंश नहीं ,बल्कि धर्म,ज्ञान ,तप,यज्ञ और भक्ति का वंश है | उन के घर साक्षात यज्ञ ,कपिल,दतात्रेय और नर नारायण जैसे अवतारों ने जन्म लिया |इस का कारण मनु और सतरूपा की अखंड भक्ति और धर्म निष्ठां थी |मनु महाराज ने अपनी संतानों को केवल राज्य ही नहीं दिया अपितु उन्हें धर्म से जोड़ा | उन्होंने अपनी कन्याओं के लिए ऐसे वर चुने जो तपस्वी,ज्ञानी,ब्रह्मनिष्ठ थे ,न कि केवल ऐश्वर्यवान | यही आदर्श पद्धति आज के समाज के लिए भी प्रेरणा है |
भागवतकार कहते हैं कि जो मनुष्य स्वायम्भुव मनु के इस पवित्र वंश की कथा को श्रद्धा से पढ़ता या सुनता है उस के घर में धर्म की वृद्धि होती ही |उस की सन्तान संस्कारवान होती है,और उसे भगवान विष्णु की भक्ति प्राप्त होती है |यह कथा सृष्टि के आरम्भ की कथा है |,जो ह्में बताती है कि हमारी उत्पति संयोग से नहीं बल्कि एक महान दैवीय योजना से हुई है |
इस अध्याय से हमें क्या शिक्षा मिलती है :-
चतुर्थ स्कन्ध के प्रथम अध्याय का मुख्य उद्देश्य केवल वंशावली वर्णन नहीं ,बल्कि यह बताना है कि सृष्टि का मूल धर्म क्या है |
१ -कर्तव्य परायणता -मनु ने राजा होते हुए भी अपने पुत्रों को राज्य दे कर स्वयं वन में तपस्या करने चले गए और अपनी कन्याओं को योग्य वर ढूंढे | यह एक आदर्श पिता और राजा का कर्तव्य है |
2- यज्ञावतार का संदेश-भगवान स्वयं यज्ञ के रूप में आते हैं ,इस का अर्थ है कि मनुष्य निष्काम भाव से यज्ञ कर्म और कर्तव्य करे तो भगवान स्वयं उस की रक्षा करते हैं |
3- स्त्री शक्ति का महत्व -इस अध्याय से स्पष्ट होता है कि सृष्टि के विस्तार में माँ की शक्ति ही आधार है |आकूति से यज्ञ ,देवहूति से कपिल जैसे अवतार और प्रसूति से सती जैसी आदर्श नारी का जन्म होता है |
४- अहंकार का विनाश – दक्ष जैसे महान प्रजापति ने भी अहंकार के कारण शिव का अपमान किया और उन की पुत्री सती को खोना पड़ा | यह सिखाता है कि ज्ञान और पद के साथ विनम्रता अत्यंत आवश्यक है |
इस प्रकार मैत्रेय जी ने विदुर जी को मनु की कन्याओं के वंश का वर्णन सुनाया,जिस के सुनने मात्र से मनुष्य के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और वह भगवान की लीला को समझने के योग्य बनता है |
इति श्रीमद्भागवते महापुराण पारमहंस्यां संहितायां चतुर्थस्कन्धे विदुरमैत्रेय संवादे प्रथमोSध्याय:|| १||
लेखक- मदन लाल शर्मा
वेबसाइट -http://thegodweknow.com अगले अध्याय में भगवान शिव और दक्ष प्रजापति का मनोमालिन्य की कथा |
